अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशायनमः
कात्यायनस्मृतिप्रारम्भः
अथातो गोभिलोक्तानामन्येषांचैवकर्मणाम् ।
अस्पष्टानांविधिंसम्य-ग्दर्शयिष्येप्रदीपवत् ॥ १ ॥
त्रिवृदूर्ध्ववृतंकार्यं तंतुत्रयमधोवृतम् ।
त्रिवृतंचोपवीतं स्यात्तस्यैको ग्रन्थिरिष्यते ॥ २ ॥
पृष्ठवंशेचनाभ्यांच धृतंयद्विन्दतेकटीम् ।
तद्धार्यमुपवीतं स्यान्नातिलंबंनचोच्छ्रितम् ॥ ३ ॥
सदोपवीतिनाभाव्यं सदावद्धशिखेनच ।
विशिखोऽनुपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥ ४ ॥
त्रिःप्राश्यापोद्विरुन्मृज्य मुखमेतान्युपस्पृशेत् ।
आस्यनासक्षिकर्णांश्च नाभिवक्षःशिरोंसकान् ॥ ५ ॥
संहताभिस्त्र्यंगुलिभि-रास्यमेवमुपस्पृशेत् ।
अंगुष्ठेनप्रदेशिन्या घ्राणंचैवमुपस्पृशेत् ॥ ६ ॥
अंगुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुःश्रोत्रंपुनःपुनः ।
इसके अनंतर गोभिल ऋषि के कहे तथा अन्य ऋषियों के कल्पोक्त कर्मों की विधि दीपक के समान भली प्रकार दिखाते हैं ॥ १ ॥ त्रिवृत् तीन तार एक सूत के ऊपर को वटे और फिर वे तीनों त्रिवृत् [ तिगुने ] नीचे को वटे ऐसा त्रिवृत् उपवीत ( जनेऊ ) होता है उसकी एक ग्रन्थि ( गांठ ) कही है ॥ २ ॥ पीठ की हड्डी और नाभि पर से धारण किया जो कटि तक आजाय उस जनेऊ को धारे किन्तु न बहुत लंबा हो और न बहुत छोटा ॥ ३ ॥
सदैव जनेऊ पहने और शिखा में गांठ सदैव लगाये जिस के शिखा में गांठ और जनेऊ नहीं वह जो काम करता है वह न किये के समान है ॥ ४ ॥
सब कर्मों में प्रथम तीन बार जल पीके दो बार मुख पूंछ कर मुख नासिका नेत्र कान नाभि हृदय शिर और कंधे इन का स्पर्श करे ॥ ५ ॥
मिली हुई बीच की तीन अंगुलियों से मुख का, अंगूठा और प्रदेशिनी ( कानी ) से घ्राण नासिका का स्पर्श करे ॥ ६ ॥ अंगूठा और अनामिका अंगुली