भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥

कनिष्ठांगुष्ठयोर्नाभिं हृदयन्तुतलेनवै ॥७॥
सर्वाभिस्तुशिरःपश्चा-द्वाहूचाग्रेणसंस्पृशेत् ।
यत्रोपदिश्यतेकर्म कर्तुरंगंनतूच्यते ॥८॥
दक्षिणस्तत्रविज्ञेयः कर्मणांपारगःकरः ।
यत्रदिङ्नियमोनस्या-ज्जपहोमादिकर्म्मसु ॥९॥
तिस्रस्तत्रदिशःप्रोक्ता ऐन्द्रीसौम्यापराजिताः ।
तिष्ठन्नासीनःप्रह्वोवा नियमोयत्रनेदृशः ॥१०॥
तदासीनेनकर्त्तव्यं नप्रह्वेणनतिष्ठता ।
गौरीपद्माशचीमेधा सावित्रीविजयाजया ॥११॥
देवसेनास्वधास्वाहा मातरोलोकमातरः ।
धृतिःपुष्टिस्तथातुष्टि-रात्मदेवतयासह ॥१२॥
गणेशेनाधिकाह्येता वृद्धौपूज्याश्चतुर्दश ।
कर्म्मादिषुतुसर्वेषु मातरःसगणाधिपाः ॥१३॥


से नेत्र और कानों का स्पर्श करे पहिले दहिने फिर बाँयें का कनिष्ठा (छिंगुनी) और अंगूठे से नाभि का, और हाथ तल से हृदय का स्पर्श करे ॥७॥
पीछे सब अंगुलियों से शिर का और हाथ के अग्रभाग से भुजाओं का स्पर्श करे । जहां शास्त्र में कर्म करना कहा हो और करने वाले का कोई अंग [अवयव] न कहा हो कि इस अंग से करे ॥८॥ तो वहां दहिना हाथ जो कर्मों को पूर्ण करता है जानना । जहां जप होम आदि कर्मों में दिशा का नियम न हो ॥९॥ तो वहां तीन दिशा कहीं जानो पूर्व, उत्तर, ईशान । जहां शास्त्र में यह नियम नहीं किया कि अमुक कर्म को खड़ा होके वा बैठ कर अथवा झुका हुआ करे ॥१०॥ उस कर्म को बैठकर करना चाहिये किन्तु खड़ा होकर वा झुक कर न करे । गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया जया॥११॥
देवसेना, स्वधा, स्वाहा, धृति, पुष्टि, तुष्टि, और आत्म देवता ॥१२॥ गणेश है अधिक जिन में ऐसी ये सब लोगों की माता चौदह मातृ का कहाती हैं वृद्धि श्राद्ध (नांदीमुख जो पुत्र जनमादि के समय किया जाता है) में इन १४ माताओं का पूजन करे अर्थात् गणेश जी सहित इन मातृकाओं का सब कर्मों की आदि में ॥१३॥