अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३
भाषार्थसहिता ॥
हरितायज्ञियादर्भाः पीतकापाकयज्ञियाः ।
समूलाःपितृदैवत्याः कल्माषावैश्वदेविकाः ॥२॥
हरिताश्चैसपिञ्जल्याः शुष्काः स्निग्धाःसमाहिताः ।
रत्निमात्रप्रमाणेेन पितृतीर्थेनसंस्तृताः ॥३॥
पिण्डार्थंयेस्मृतादर्भास्तर्पणार्थंतथैवच ।
धृतैःकृतेचविण्मूत्रे त्यागस्तेषांविधीयते ॥४॥
दक्षिणांपातयेज्जानुं देवान्परिचरन्सदा ।
पातयेदितरंजानुं पितॄन्परिचरन्नपि ॥५॥
निपातोन्हिसव्यस्य जानुनोविद्यतेक्वचित् ।
सदापरिचरेद्भक्त्यापितॄनप्यत्रदेववत् ॥६॥
पितृभ्यइतिदत्तेषूपवेश्यकुशेषुतान् ।
गोत्रनामभिरामंत्रीय पितॄनर्घ्यंप्रदापयेत् ॥७॥
नात्रापसव्यकरणं नपित्र्यंतीर्थमिष्यते ।
यज्ञ के दाभ हरे और पाकयज्ञ नाम वैश्वदेवादि के पीले पितृ देवताओं के लिये जड़ सहित—और विश्वे देवताओं के लिये चित कबरे रंग के ॥२॥ पितृ श्राद्ध में हरे कुश हों वा सूखे हों पर वे अन्तर्गर्भित (जिन के भीतर से न निकाले हों) ऐसे चिकने बराबर करके रक्खे हाथ भर लम्बे लेकर पितृ तीर्थ से पितृब्राह्मणों के बैठने को बिछावे ॥३॥ पिंड और तर्पण के लिये भी पूर्वोक्त प्रकार के दाभ बिछाने चाहिये । यदि दाभों को हाथ में लिये हुए मल मूत्र त्याग करे तो उन कुशाओं को त्याग देवे ॥४॥ देवताओं की पूजा करता हुआ मनुष्य दहिने गोड़ेको और पितरों को पूजता हुआ बायें गोड़े को नवावे ॥५॥ बायें गोड़े का नवाना इस नान्दीमुख श्राद्ध में कहीं भी नहीं कहा है किन्तु दहिने गोड़े को नवा कर पितरों का देवताओं के समान पूजन करे ॥ ६ ॥ पितृभ्य इदं कुशासनंस्वधा-इस मन्त्र से बिछाये कुशाओं पर उन पितृ ब्राह्म-णों को बैठा कर और नाम और गोत्र से बुलाकर पितरों को अर्घ देवे ॥७॥ श्राद्धां के पूरण आदि कर्म देवतीर्थ से ही करे इस से इस आभ्युदयिक श्राद्ध