अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ ५
पात्राणांपूरणादीनि दैवेनैवहिकारयेत् ॥ ८ ॥ ज्येष्ठोत्तरकरान्युग्मान्कराग्राग्रपवित्रकान् । कृत्वाघ्यंसं प्रदातव्यं नैकैकस्यात्रदीयते ॥ ९ ॥ अनन्तर्गर्भिणंसाग्रं कौशंद्विदलमेवच । प्रादेशमात्रंविज्ञेयं पवित्रं यत्रकुत्रचित् ॥ १० ॥ एतदेवहिपिंजल्या लक्षणंसमुदाहृतम् । आज्यस्योत्पवनार्थं-तदप्येतावदेवतु॥ ११ ॥ एतत्प्रमाणमेवैके-कौशीमेवार्द्रमंजरीम् । शुष्कांवाशीर्णकुसुमां पिंजलींपरिचक्षते ॥ १२ ॥ पित्र्यंमंत्रानुद्रवणआत्मालंभेऽधमेक्षणे । अधोवायुसमुत्सर्गे प्रहासेऽनृतभाषणे ॥ १३ ॥ मार्जारमूषकस्पर्शे आक्रुष्टेक्रोधसंभवे ।
से अपसव्य करना और पितृतीर्थ से काम लेना इष्ट नहीं है ॥ ८ ॥ दहिना हाथ है आगे जिन के ऐसे दोनों हाथ और हाथों के आगे पवित्र कुश करके पितरों को एक साथ अर्घ्य देवे किन्तु पृथक् २ पितरों के नाम से अर्घ्य नहीं देवे ॥ ९ ॥ जिस कुश के भीतर अन्य कुश न हो और जिस का अग्रभाग बना हो ऐसा दो कुश का बना हुआ प्रादेशमात्र (बित्ता) भर का पवित्र सभी कर्मों में जानना चाहिये यह पवित्र की परिभाषा है ॥१०॥ यही सगर्भ कुशा का लक्षण कहा है और घी के पवित्र करनेका कुशा भी इतना ही बड़ा होता है ॥११॥ और कितनेक ऋषि इतने ही प्रमाण की हरेकुश की पवित्री कहते हैं। गीली हो अथवा सूखी परन्तु फल उस के गिरगये हों उस को पिंजली कहते हैं ॥१२॥ पितरों सम्बन्धी मन्त्रों का उच्चारण करने पर, हृदय स्पर्श करने पश्चात्, किसो नीच के देख लेने पर, अधोवायु निकल जाने पर, हंसी आजाने पर, झूठ बोलने पर, ॥ १३ ॥ बिलाव मूषा इन के छू लेने पर, गाली देने वा अपशब्द बोलने पर और क्रोध आजाने पर इन सब निमित्तों में कर्म करता हुआ