अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६ भाषार्थसहिता ॥
निमित्तेष्वेषुसर्व्वत्र कर्म्मकुर्व्वन्नपःस्पृशेत् ॥ १४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ द्वितीयः खंडः ॥ २ ॥
अक्रियात्रिविधाप्रोक्ता विद्वद्भिःकर्म्मकारिणाम् ।
अक्रियाचपरोक्ताच तृतीयाचान्यथाक्रिया ॥ १ ॥
स्वशाखाश्रयमुत्सृज्य परशाखाश्रयंचयः ।
कर्त्तुमिच्छतिदुर्मेधा मोघंतत्तस्यचेष्टितम् ॥ २ ॥
यन्नाम्नातंस्वशाखायां परोक्तमविरोधिच ।
विद्वद्भिस्तदनुष्ठेय-मग्निहोत्रादिकर्म्मवन् ॥ ३ ॥
प्रवृत्तमन्यथाकुर्य्याद्यदिमोहात्कथंचन ।
यतस्तदन्यथाभूतं ततएवसमापयेत् ॥ ४ ॥
समाप्तेयदिजानीयान्मयैतदयथाकृतम् ।
तावदेवपुनःकुर्य्यान्नावृत्तिःसर्व्वकर्म्मणः ॥ ५ ॥
प्रधानस्यक्रियायत्र सांगंतत्क्रियतेपुनः ।
मनुष्य दहिने हाथ से जल का स्पर्श करे ॥१४॥ यह दूसरा खण्ड पूरा हुआ ॥
कर्म करने वालों का अकर्म (निन्दित कर्म) विद्वानों ने तीन प्रकारका कहा है ॥१॥ अक्रिया (कर्म को न करना) २ अपनी से भिन्न अन्य शाखा में कहे अनुसार कर्म करना ३ अन्यथा क्रिया जैसे चाहिये वैसे न करना विधान से विरुद्ध मन माना करे ॥१॥ जो कुबुद्धिपुरुष अपनी शाखा के कर्मों को छोड़ कर दूसरे की शाखा में कहे कर्म करने की इच्छा करता है वह उस का परिश्रम [करना] निष्फल है ॥२॥ जो कर्म वा कर्मांग अपनी शाखा में नहीं कहा और अपनी शाखा से विरुद्ध भी जो न हो समझदार मनुष्य दूसरी शाखा के कहे हुए उस कर्म को अग्निहोत्र के तुल्य स्वीकार करे ॥३॥ प्रारंभ किये कर्म को यदि किसी प्रकार अज्ञान से अन्यथा करे तो जहां से वह कर्म अन्यथा हुआ है वहां बीच में ही समाप्त करदे ॥४॥ यदि समाप्त होने पर यह प्रतीत हो कि मैंने यह काम अन्यथा किया तो जितना कर्म अन्यथा हुआ हो उतना ही फिर करदे—संपूर्ण कर्म को फिर न करे ॥५॥ जहां प्रधान (मुख्य) कर्म नहीं किया हो वा विपरीत किया हो तो वहां सब कर्म फिर से करना चाहिये—और उस कर्म का कोई अंग न किया हो तो ॥