भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

कात्यायनस्मृतिः ॥

तदंगस्याक्रियायांच नावृत्तिर्नैव तत्क्रिया ॥ ६ ॥
मधुमध्वितियस्तत्र त्रिजपोऽशितुमिच्छताम् ।
गायत्र्यनंतरंसोऽत्र मधुमन्त्रविवर्जितः ॥ ७ ॥
नचाश्नत्सुजपेदत्र कदाचित्पितृसंहिताम् ।
अन्यएवजपःकार्य्यः सोमसामादिकःशुभः ॥ ८ ॥
यस्तत्रप्रकरोऽन्नस्य तिलवद्यववत्तथा ।
उच्छिष्टसन्निधौसोऽत्र तृप्तेषुविपरीतकः ॥ ९ ॥
संपन्नमितितृप्ताःस्युः प्रश्नस्थानेविधीयते ॥
सुसंपन्नमितिप्रोक्ते शेषमन्नंनिवेदयेत् ॥ १० ॥
प्रागग्रेष्वथदर्भेषु आद्यमामंत्र्यपूर्ववत् ।
अपःक्षिपेन्मूलदेशेऽवनेनिक्ष्वेतिपात्रतः ॥ ११ ॥
द्वितीयंचतृतीयंच मध्यदेशाग्रदेशयोः ।
मातामहप्रभृतींस्त्रीनेतेषामेववामतः ॥ १२ ॥


वहां सब कर्म की आवृत्ति न करे किन्तु उस अंग को ही करे ॥ ६ ॥ मधु मधु मधु यह जो भोजन करने वालों का तीन बार जप है वह यहां (श्राद्ध में) गायत्री के पीछे मधुवाता इत्यादि मन्त्र के बिना ही करना चाहिये ॥ ७ ॥ पितृ ब्राह्मणों के भोजन करते समय श्राद्ध में पितृसंहिता न जपे किन्तु अन्य ही सोम देवता वाले मन्त्रों और सामवेद आदि का शुभ पाठ करे ॥ ८ ॥ तिल और जौ के समान जो अन्न का प्रकर (विकिर पिण्ड) है वह उच्छिष्ट के समीप देना और ब्राह्मणों के तृप्त होने पर विपरीत (जहां उच्छिष्ट न हो) जगह देना चाहिये ॥ ९ ॥ सम्पन्न (अच्छी तरह किया) तृप्त हुए यह तो यजमान प्रश्न (पूछने) के समय कहे- जब ब्राह्मण लोग [भले प्रकार तृप्त हुये] यह कहदें तब शेष अन्न को यजमान उन के सामने निवेदन करे और जैसी आज्ञा दें वैसा करे ॥ १० ॥ पूर्व को है अग्रभाग जिन का ऐसा कुशाओं पर आद्य (पिता) का पूर्व के समान आमंत्रण करके पात्र में से अवनेनिक्ष्व इस मन्त्र से कुशाओं की जड़ में जल डाले ॥ ११ ॥ पितामह को कुशा के मध्य में और प्रपितामह को कुशा के अग्रभाग में जल छोड़ मातामह (नाना) आदि तीनों को भी इन की बांई ओर जल दे ॥ १२ ॥