अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ भाषार्थसहिता ॥
सर्वस्मादन्नमुद्धृत्य व्यंजनैरुपसिच्यच । संयोज्ययवकर्कन्धूदधिभिः प्राङ्मुखस्ततः ॥ १३ ॥ अवनेजनवत्पिण्डान्दत्वा बिल्वप्रमाणकान् । तत्पात्रक्षालनेनाथ पुनरप्यवनेजयेत् ॥ १४ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ उत्तरोत्तरदानेन पिंडानामुत्तरोत्तरः । भवेदधरचाधराणा-मधरः श्राद्धकर्मणि ॥ १ ॥ तस्माच्छ्राद्धेषुसर्वेषुवृद्धिमत्स्वितरेषुच । मूलमध्याग्रदेशेषु ईषत्सक्तांश्चनिर्वपेत् ॥ २ ॥ गन्धादीन्निःक्षिपेत्तूष्णीं ततआचामयेद्द्विजान् । अन्यात्राप्येषएवस्याद्यवादिरहितोविधिः ॥ ३ ॥ दक्षिणाप्लवनेदेशे दक्षिणाभिमुखस्यच । दक्षिणाग्रेषुदर्भेषु एषोऽन्यत्रविधिःस्मृतः ॥ ४ ॥
सब अन्न में से भोजन का भाग निकाल कर और मट्ठा आदि सेचन करके तथा जौ, बेर दही मिलाकर-फिर पूर्वाभिमुख होकर ॥ १३ ॥ बेर के समान बड़े पिंडों को अवनेजन जहां २ दिया था वहां २ देकर अवनेजन के पात्र को धोकर प्रत्यवनेजन छोड़े ॥ १४ ॥
यह तीसरा खण्ड समाप्त हुआ ॥३॥
उत्तर २ क्रमशः पिंडों के देने से पिछला २ अधः (नीचे) होता है इस से श्राद्ध कर्म में निचले २ पिण्ड को नीची २ जगह में देना चाहिये ॥ १ ॥ तिससे वृद्धि के (आभ्युदयिक) श्राद्ध वा अन्य श्राद्धों में कुशा की जड़ मध्यभाग तथा अग्रभाग में कुछ लगे हुए पिंड देने चाहिये ॥ २ ॥ बिना मंत्र गंध आदि दे और फिर द्विजों को आचमन करावे अन्य श्राद्धों (पार्वणादि) में जौ को छोड़ अन्य यही विधि होता है ॥३॥ जो देश दक्षिण को नीचा हो उस में यजमान भी दक्षिणाभिमुख बैठे और दक्षिणाग्रही कुशों पर पिंड आदि देवे यह विधि अन्य पार्वणादि श्राद्धों में कही है ॥ ४ ॥ फिर यजमान