अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१० भाषाधर्मसंहिता ॥
येविदंतिनमुह्यन्ति श्राद्धकर्मसुतेक्वचित् ॥ ११ ॥ इदंशास्त्रंचगुह्यंच परिसंख्यानमेवच । वसिष्ठोक्तंचयोवेद सन्नाद्धंवेदनेतरः ॥ १२ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्थः खंडः ॥ ४ ॥ असकृद्यानिकर्माणि क्रियरन्कर्मकारिभिः । प्रतिप्रयोगनैताःस्युर्मातरःश्राद्धमेवच ॥ १ ॥ आधानेहोमयोश्चैव वैश्वदेवेतथैवच । बलिकर्म्मणिदर्शेच पौर्णमासेतथैवच ॥ २ ॥ नवयज्ञेचयज्ञज्ञा वदन्त्येवमनीषिणः । एकमेवभवेच्छ्राद्धमेतेषुनपृथक्पृथक् ॥ ३ ॥ नाष्टकासुभवेच्छ्राद्धं नान्नाद्धेश्राद्धमिष्यते । नसोष्यन्तीजातकर्म प्रोषितागतकर्मसु ॥ ४ ॥ विवाहादिःकर्म्मगणोयउक्तो गर्भाधानंशुश्रुमयरयचान्ते । विवाहादावेकमेवात्रकुर्यान्नाद्धंनादौकर्म्मणःकर्म्मणःस्यात् ५
ता को प्राप्त नहीं होते ॥११॥ इस धर्मशास्त्र को वेदान्त को और वशिष्ठ जी के कहे धर्म शास्त्र को जो जानता है वही श्राद्ध को जानता है अन्य नहीं॥१२॥ यह चौथा खण्ड पूर्ण हुआ ।
बारंबार जिन कर्मों को कर्म करने वाले करते हैं उन प्रत्येक कर्मों में ये षोडशमातृका और श्राद्ध ( नांदी मुख ) नहीं होते ॥ १ ॥ अग्नि स्थापन के आरम्भ में सायं प्रातः काल के अग्निहोत्रके आरम्भमें, चातुर्मास्य यज्ञोंके वैश्वदेव पर्व में, बलिदान में श्रौतदर्शष्टि तथा पौर्णमासेष्टि के आरम्भ में ॥ २ ॥ और नवाग्र्येष्टि के प्रारम्भ में यज्ञके जानने वाले विद्वान् याज्ञिक-लोग ऐसा कहते हैं कि इनमें से एक साथ सबन्ध होने वाले कामों में एकही श्राद्ध होता है पृथक २ नहीं ॥ ३ ॥ अष्टकाओं में और एक श्राद्ध के समय में दूसरा ( आभ्युदयिक ) श्राद्ध नहीं होता-परदेश में गई हुई सोष्यंती ( जिसके बालक हुआ हो ) उसके लौट आनेपर जातकर्मोंदि में नान्दी श्राद्ध न करे-॥ ४ ॥ विवाह आदि कर्म का जो समूह कहा है कि जिसके अन्त में वेद से गर्भाधान सुनते हैं उस विवाह के आदि में एकही नान्दी श्राद्ध होता है प्रति कर्म की आदिमें नहीं करे ॥ ५ ॥