अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ ११
प्रदोषेश्राद्धमेकंस्याद् गोनिष्क्रामप्रवेशयोः । तत्राङ्गेयुज्यतेकर्त्तुं प्रथमेपुष्टिकर्मणि ॥ ६ ॥ हलाभियोगादिषुतु षट्सुकुर्यात्पृथक्पृथक् । प्रतिप्रयोगमप्येषा मादावेकन्तुकारयेत् ॥ ७ ॥ बृहत्पत्रिक्षुद्रपशुस्वस्त्यर्थंपरिविष्यतोः । सूर्य्येन्द्वोःकर्मणोयेतु तयोःश्राद्धंनविद्यते ॥ ८ ॥ नदशाग्रन्थिकेश्चैव विषवह्वर्ककर्मणि । कृमिदष्टचिकित्सायां नैवशेषेषुविद्यते ॥ ९ ॥ गणशःक्रियमाणेषु मातृभ्यःपूजनंसकृत् । सकृदेवभवेच्छ्राद्ध-मादौनपृथगादिषु ॥ १० ॥ यत्रयत्रभवेच्छ्राद्धं तत्रतत्रचमातरः ।
रात में विवाह का मुहूर्त्त अथवा सायंप्रातः काल में सन्तान उत्पन्न हो तो यही एक नान्दीश्राद्ध सायंकाल प्रदोष के समय वा प्रातःकाल होता है यह यदि प्रातःकाल में करना पड़े तो गौओं के चरने को निकलने के समय और सायंकाल में करना हो तो गौओं के घर आने समय करे ॥ ६ ॥
हलका अभियोग ( प्रथम जोतना ) आदि गृह्यसूक्तोक्त ६ कर्मों में पृथक् २ श्राद्ध होता है इस से प्रत्येक कर्म के आदि में एक नान्दीश्राद्ध करावे ॥ ७ ॥
बड़े २ पक्षी और छोटे २ पशु इन के कल्याण के लिये किये कर्म में सूर्य और चन्द्रमा के परिवेष [ चारों ओर मण्डलाकार होने ] के समय में किये कर्म में नान्दीश्राद्ध न करे ॥ ८ ॥
दशाग्रन्थि कर्म में—विषवाले जीव के काटलेने पर जो कर्म होता है उस में कीड़े के काटलेने की चिकित्सा में और जो कर्म बाकी रहजाने वाले हों उन में नान्दी श्राद्ध नहीं है ॥ ९ ॥
समूह से [एक बार] किये कर्मों में षोडश मातृकाओं का पूजन और कर्म की आदि में एक बार श्राद्ध करे पृथक् २ कर्म की आदि में नहीं ॥ १० ॥
जहां २ नान्दी होता है वहां २-१६ मातृकाओं का पूजन भी अवश्य करे यहां तक मातृसूक्त