भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१२भाषार्थसहिता ॥

प्रासङ्गिकमिदंप्रोक्त-मतःप्रकृतमुच्यते ॥ १९ ॥

इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥

आधानकालायेप्रोक्तास्तथायेचाग्नियोनयः ।
तदाश्रयोग्निमादध्यादग्निमानग्रजोयदि ॥ १ ॥

दाराधिगमनाधाने यःकुर्यादग्रजाग्रिमः ।
परिवेत्तासविज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः ॥ २ ॥

परिवित्तिपरिवेत्तारौ नरकंगच्छतोध्रुवम् ।
अपचीर्णप्रायश्चित्तौ पादोनफलभागिनौ ॥ ३ ॥

देशान्तरस्थक्लीबैकवृषणानसहोदरान् ।
वेश्यासक्तपतितशूद्रतुल्यानिरोगिणः ॥ ४॥

जड़मूकान्धबधिरकुब्जवामनकुण्डकान् ।
अतिवृद्धानभार्यांश्च कृषिसक्तान्नृपस्यच ॥ ५ ॥


[ प्रसङ्ग में आया ] कहा अब प्रकृत ( जिस का प्रकरण था ) कहते हैं ॥ १९॥
यह पांचवां खंड पूरा हुआ ॥ ५ ॥

जो अग्नि के आधान के समय कहे हैं और जो अग्नि के कारण हैं उन्हीं में जेठा भाई अग्निहोत्र से युक्त हो तो छोटा अग्न्याधान पूर्वक अग्निहोत्र का ग्रहण करे ॥१॥

जो छोटा भाई बड़े भाई से पहिले विवाह और अग्न्याधान करता है वह परिवेत्ता और जेठा भाई परिवित्ति कहाता है ॥२॥

परिवित्ति और परिवेत्ता दोनों निश्चय नरक में जाते हैं यदि वे दोनों प्रायश्चित्त करलें तो पादोन [तीन भाग] फल के भागी होते हैं॥३॥

यदि जेठा भाई परदेश में हो वा नपुंसक हो वा जिस के एक ही अंडकोश हो वा अपना सहोदर [ सगा ] भाई न हो वा वेश्यागामी हो वा पतित हो वा शूद्र के समान हो-वा अत्यन्त रोगी हो ॥४॥

जड़ महाअज्ञानी हो वा गूंगा हो वा अंधा हो वा बहरा कुबड़ा हो खिलन्दिया बौना हो वा पिता के जीते ही जार से पैदा हुआ हो वा अत्यन्त बुड्ढा हो या जिस के स्त्री न हो वा जो राजा की खेती कराता हो ॥५॥