भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१६भाष्यसंहिता ॥

गोवालैःशणसंमिश्रैस्त्रिवृत्तममलं।तमकम् ।
व्यामप्रमांणं नेत्रंस्या-त्प्रमध्यस्तेनपावकः ॥ ७ ॥
मूर्द्धाक्षिकर्णवक्त्राणि कन्धराचापि पञ्चमी ।
अङ्गुष्ठमात्राण्येतानि द्व्यंगुष्ठंवक्षउच्यते ॥ ८ ॥
अंगुष्ठमात्रंहृदयं त्र्यंगुष्ठमुदरंस्मृतम् ।
एकांगुष्ठाकटिर्ज्ञेयाद्वौवलिद्वौंचगुह्यकम् ॥ ९ ॥
ऊरुजंघचपादौचचतुरुकैर्मथाक्रमम् ।
अरण्यवयवा ह्येते याज्ञिकैःपरिकीर्त्तिताः ॥ १० ॥
यत्तद्गुह्यमितिप्रोक्तं देवयोंनिस्तुसोच्यते ।
अस्यांयोजायतेवन्हिः सकल्याणकृदुच्यते ॥ ११ ॥
अन्येषुयेतुमथ्नन्ति तेरोगभयमाप्नुयुः ।
प्रथमेमन्थनेत्वेषा नियमोनोत्तरंपुनः ॥ १२ ॥


शण जिन में मिला हो ऐसे गौ के बालों से तिगुना ऐंठा हुआ निर्मल साढ़े तीन हाथ लम्बा नेत्र नामक रस्सी बनावे उस से अग्नि को मथे ॥ ७ ॥ शिर-नेत्र-कान-मुख-गला ये पांचों एक २ अंगूठे के प्रमाण कल्पना करे दो अंगूठे प्रमाण छाती ॥ ८ ॥ एक अंगूठा हृदय-तीन अंगूठे प्रमाण उदर हो-एक अंगूठे नाभि से निचला भाग [ पेंचन ] और दो अंगुष्ठ प्रमाण उपस्थेन्द्रिय ॥ ९ ॥ ऊरु [ घोंटने ऊपर का भाग ] जंघा [ घोंटने नीचेका भाग ] और पग ये तीनों क्रमसे चार तीन एक अंगुष्ठ भर कल्पना करे वहां २ चिह्नकर देखे ये सब यज्ञ कर्त्ताओंने अरणी के अवयव कहे हैं ॥ १० ॥ जो पूर्व गुह्यस्थल-उपस्थ कहा है उसे देव ( अग्नि ) की योनि [ कारण ] कहते हैं इसमें जो अग्नि उत्पन्न होता है वह कल्याण करने वाला कहा है बीच में गुह्यस्थल जानने के लिये अरणी के सब अंगोंकी कल्पना की गई है । अग्न्याधानके समय प्रथम अवश्य ही गुह्यस्थल में मन्थन कर अग्नि को निकाले ॥ ११ ॥ अन्य जगह जो अग्नि को मथते हैं वे रोग और भय को प्राप्त होते हैं । पहिले पहिल मथने में ही यह नियम है आगे अग्नि मथनेमें गुह्यस्थल का नियम नहीं है ॥ १२ ॥