अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ १५
तस्यप्राङ्मुखीशाखा चोदीचीयोर्द्धगापिवा ॥ १ ॥ अरणिरस्तन्मयीप्रोक्ता तन्मय्यैवोत्तरारणिः । सारवद्दारवञ्चात्र मोविलीचप्रशस्यते ॥ २ ॥ संसक्तमूलोयःशम्याः सशमीगर्भउच्यते । अलाभेत्वशमीगर्भादुद्धरेदविलम्बितः ॥ ३ ॥ चतुर्विंशतिरंगुष्ठदैर्घ्यंषडपि पार्थिवम् । चत्वारउच्छ्रयेमानमरण्योःपरिकीर्त्तितम् ॥ ४ ॥ अष्टाङ्गुलःप्रमन्थःस्याच्चात्रंस्याद्द्वादशाङ्गुलम् ॥ ओविलीद्वादशैवस्यादेतन्मंथनयंत्रकम् ॥ ५ ॥ अङ्गुष्ठाङ्गुलमानन्तु यत्रयत्रोपदिश्यते । तत्रतत्रबृहत्पर्वग्रंथिभिर्मिनुयात्सदा ॥ ६ ॥
होली शाखा है ॥ १ ॥ उस की नीचली और ऊपर की अधरारणी उत्तरा- रणी (जिस में बर्में को दबाकर बर्मा फेरते हैं) बनानी चाहिये और दृढ़ काठ का चात्र और ओविली [जो बर्में के नीचे ऊपर की छोटी २ लकड़ी होती हैं] श्रेष्ठ कहे हैं ॥ २ ॥ शमी-छोंकर की जड़ से जिस की जड़ मिलीहो उस पीपल को शमीगर्भ कहते हैं। यदि शमीगर्भ पीपल न मिले तो जो श- मीगर्भ नहीं उसी केवल पीपल से अरणी के लिये शीघ्र शाखा को काटलेवे ॥ ३ ॥ चौबीस अंगुष्ठ की लंबाई छः अंगुल की चौड़ाई चार अंगुल की मुटाई वा उंचाई का प्रमाण दोनों अरणियों का कहा है ॥ ४ ॥ आठ अंगुल का प्र- मंथ (उत्तरारणी का टुकड़ा जिस को अधरारणी में लगाकर मन्थन करतेहैं) होता है बारह अंगुल का चात्र (जिस लकड़ी में रस्सी लपेट कर खींचते हैं वह चात्र कहाता है) और ओविली (जिस लकड़ी को ऊपर से तिरछी र- खकर दोनों हाथ से दबाते वह ओविली कहाती है) होते हैं ये सब मिल कर अग्नि मथने का सामान है ॥ ५ ॥ जहां २ अंगूठे के अंगुल का प्रमाण कहा है वहां २ बीच की गांठ से सदैव नापै ॥ ६ ॥