भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१४ | भाषार्थसहिता ॥

मानकृद्यजमानःस्याद्विदुषामेषनिश्चयः ॥ ११ ॥
पुण्यवानादधीताग्निं सद्विद्वद्भिःप्रशस्यते ।
अनडुर्धुक्त्वमप्यस्य काम्यैस्तन्नीयतेशमम् ॥ १२ ॥
यस्यदत्ताभवेत्कन्या वाचासत्येनकेनचित् ।
सोऽन्त्यांसमिधमाधास्यन्नादधीतैवनान्यया ॥ १३ ॥
अनूढैवतु साकन्या पञ्चत्वंयदिगच्छति ।
नतथाव्रतलोपोऽस्य तेनैवान्यांसमुद्वहेत् ॥ १४ ॥
अथचेन्नलभेतन्यां याचमानोऽपिकन्यकाम् ।
तमग्निमात्मसात्कृत्वाक्षिप्रंस्यादुत्तराश्रमी ॥ १५ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षष्ठः खंडः ॥ ६ ॥
अश्वत्थोध्वःशमीगर्भः प्रशस्तोर्द्ध्वीसमुद्भवः ।


का यह निश्चय है कि माप का कर्त्ता यजमान होता है अर्थात् यजमान की अंगुलियों से माप करना चाहिये ॥ ११ ॥ धनवान् न होने पर भी धर्मात्मा पुण्य शील पुरुष अग्नि को विधि पूर्वक स्थापन करे क्योंकि धर्मात्मा की ही सब प्रशंसा करते हैं । और जो उस की निर्धनता है वह काम्य कर्मों के अनुष्ठान से शान्त हो कर धनी हो जाता है ॥ १२ ॥ यदि किसी ने सत्यवाणी से किसी को कन्या दी हो अर्थात् सगाई करदी हो वह वर यदि उस कन्या के जीवन पर्यन्त अग्निहोत्र करना चाहता हो तो उसी के साथ विवाह करके अवश्य अग्न्याधान करे किन्तु अन्य स्त्री के साथ अग्निहोत्र न लेवे ॥ १३ ॥ यदि वह कन्या बिना विवाही मरजाय तो तिस से इस पुरुष के व्रत (अग्निहोत्र लेने की प्रतिज्ञा) का नाश नहीं होता उसी अग्नि से दूसरी स्त्री को विवाह लेवे ॥ १४ ॥ यदि मांगने से भी अन्य कन्या न मिले तो विधिपूर्वक आत्मा में उस अग्नि का समारोप करके संन्यासी हो जावे ॥ १५ ॥

यह छठा खण्ड पूरा हुआ ॥६॥

शमीनाम वृक्षोंकर जिस में मिलकर जम गयी हो ऐसा शुद्ध भूमि में उत्पन्न जो पीपल है उस की जो पूर्व को वा उत्तर को अथवा ऊपर को गई