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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

कात्यायनस्मृतिः ॥ १५

तस्यप्राङ्मुखीशाखा चोदीचीयोर्द्धगापिवा ॥ १ ॥ अरणिरस्तन्मयीप्रोक्ता तन्मय्यैवोत्तरारणिः । सारवद्दारवञ्चात्र मोविलीचप्रशस्यते ॥ २ ॥ संसक्तमूलोयःशम्याः सशमीगर्भउच्यते । अलाभेत्वशमीगर्भादुद्धरेदविलम्बितः ॥ ३ ॥ चतुर्विंशतिरंगुष्ठदैर्घ्यंषडपि पार्थिवम् । चत्वारउच्छ्रयेमानमरण्योःपरिकीर्त्तितम् ॥ ४ ॥ अष्टाङ्गुलःप्रमन्थःस्याच्चात्रंस्याद्द्वादशाङ्गुलम् ॥ ओविलीद्वादशैवस्यादेतन्मंथनयंत्रकम् ॥ ५ ॥ अङ्गुष्ठाङ्गुलमानन्तु यत्रयत्रोपदिश्यते । तत्रतत्रबृहत्पर्वग्रंथिभिर्मिनुयात्सदा ॥ ६ ॥


होली शाखा है ॥ १ ॥ उस की नीचली और ऊपर की अधरारणी उत्तरा- रणी (जिस में बर्में को दबाकर बर्मा फेरते हैं) बनानी चाहिये और दृढ़ काठ का चात्र और ओविली [जो बर्में के नीचे ऊपर की छोटी २ लकड़ी होती हैं] श्रेष्ठ कहे हैं ॥ २ ॥ शमी-छोंकर की जड़ से जिस की जड़ मिलीहो उस पीपल को शमीगर्भ कहते हैं। यदि शमीगर्भ पीपल न मिले तो जो श- मीगर्भ नहीं उसी केवल पीपल से अरणी के लिये शीघ्र शाखा को काटलेवे ॥ ३ ॥ चौबीस अंगुष्ठ की लंबाई छः अंगुल की चौड़ाई चार अंगुल की मुटाई वा उंचाई का प्रमाण दोनों अरणियों का कहा है ॥ ४ ॥ आठ अंगुल का प्र- मंथ (उत्तरारणी का टुकड़ा जिस को अधरारणी में लगाकर मन्थन करतेहैं) होता है बारह अंगुल का चात्र (जिस लकड़ी में रस्सी लपेट कर खींचते हैं वह चात्र कहाता है) और ओविली (जिस लकड़ी को ऊपर से तिरछी र- खकर दोनों हाथ से दबाते वह ओविली कहाती है) होते हैं ये सब मिल कर अग्नि मथने का सामान है ॥ ५ ॥ जहां २ अंगूठे के अंगुल का प्रमाण कहा है वहां २ बीच की गांठ से सदैव नापै ॥ ६ ॥

१६भाष्यसंहिता ॥

गोवालैःशणसंमिश्रैस्त्रिवृत्तममलं।तमकम् ।
व्यामप्रमांणं नेत्रंस्या-त्प्रमध्यस्तेनपावकः ॥ ७ ॥
मूर्द्धाक्षिकर्णवक्त्राणि कन्धराचापि पञ्चमी ।
अङ्गुष्ठमात्राण्येतानि द्व्यंगुष्ठंवक्षउच्यते ॥ ८ ॥
अंगुष्ठमात्रंहृदयं त्र्यंगुष्ठमुदरंस्मृतम् ।
एकांगुष्ठाकटिर्ज्ञेयाद्वौवलिद्वौंचगुह्यकम् ॥ ९ ॥
ऊरुजंघचपादौचचतुरुकैर्मथाक्रमम् ।
अरण्यवयवा ह्येते याज्ञिकैःपरिकीर्त्तिताः ॥ १० ॥
यत्तद्गुह्यमितिप्रोक्तं देवयोंनिस्तुसोच्यते ।
अस्यांयोजायतेवन्हिः सकल्याणकृदुच्यते ॥ ११ ॥
अन्येषुयेतुमथ्नन्ति तेरोगभयमाप्नुयुः ।
प्रथमेमन्थनेत्वेषा नियमोनोत्तरंपुनः ॥ १२ ॥


शण जिन में मिला हो ऐसे गौ के बालों से तिगुना ऐंठा हुआ निर्मल साढ़े तीन हाथ लम्बा नेत्र नामक रस्सी बनावे उस से अग्नि को मथे ॥ ७ ॥ शिर-नेत्र-कान-मुख-गला ये पांचों एक २ अंगूठे के प्रमाण कल्पना करे दो अंगूठे प्रमाण छाती ॥ ८ ॥ एक अंगूठा हृदय-तीन अंगूठे प्रमाण उदर हो-एक अंगूठे नाभि से निचला भाग [ पेंचन ] और दो अंगुष्ठ प्रमाण उपस्थेन्द्रिय ॥ ९ ॥ ऊरु [ घोंटने ऊपर का भाग ] जंघा [ घोंटने नीचेका भाग ] और पग ये तीनों क्रमसे चार तीन एक अंगुष्ठ भर कल्पना करे वहां २ चिह्नकर देखे ये सब यज्ञ कर्त्ताओंने अरणी के अवयव कहे हैं ॥ १० ॥ जो पूर्व गुह्यस्थल-उपस्थ कहा है उसे देव ( अग्नि ) की योनि [ कारण ] कहते हैं इसमें जो अग्नि उत्पन्न होता है वह कल्याण करने वाला कहा है बीच में गुह्यस्थल जानने के लिये अरणी के सब अंगोंकी कल्पना की गई है । अग्न्याधानके समय प्रथम अवश्य ही गुह्यस्थल में मन्थन कर अग्नि को निकाले ॥ ११ ॥ अन्य जगह जो अग्नि को मथते हैं वे रोग और भय को प्राप्त होते हैं । पहिले पहिल मथने में ही यह नियम है आगे अग्नि मथनेमें गुह्यस्थल का नियम नहीं है ॥ १२ ॥

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१८ भाषार्थसहिता ॥

पूर्व्वमन्थन्त्यवस्थास्ताः प्राच्यग्नेःस्याद्यथाच्युतिः ॥४॥ नैकया विविनाकार्य्यमाधानंभार्य्ययाद्विजैः । अश्रुतंतद्विजानीयात्सर्व्वान्वाचारमन्तियत् ॥५॥ वर्णज्यैष्ठ्येनबह्वीभिः सवर्णाभिश्चजन्मतः । कार्य्यमग्निच्युतेराभिः साध्वीभिर्मन्थनंपुनः ॥६॥ नात्रशूद्रींप्रयुञ्जीत नद्रोहाद्द्वेषकारिणीम् । नचैवाव्रतस्थांनान्यपुंसाचसहसङ्गताम् ॥७॥ ततःशक्ततरापश्चादासामन्यतरापिवा । उपेतानांवान्यतमामन्थेद्ग्निंनिकामतः ॥८॥ जातस्यलक्षणंकृत्वा तंप्रणीयसमिध्यच । आधायसमिधंचैव ब्रह्माणंचोपवेशयेत् ॥९॥ ततःपूर्णाहुतिंहुत्वा सर्वमन्त्रसमन्विताम् । गांदद्याद्यज्ञवानन्ते ब्रह्मणेवाससीतथा ॥१०॥


मथे जिस से अरणी में से पूर्व दिशा में अग्नि निकल के गिरे ॥४॥ ब्राह्मणादि द्विज एक भी पत्नी न हो तो अग्नि का आधान न करे यदि करे तो उस को नहीं किया जाने, जिस से स्त्री सब मनुष्यों को वाणी से वश में करती हैं॥५॥ यदि बहुत स्त्री हों तो जो उत्तम वर्ण हो उस के साथ और यदि उत्तम वर्ण की ही बहुत हों तो जो अवस्था में बड़ी हो उसके साथ अग्नि का आधान करे यदि मथित अग्नि नष्ट होजाय तो सीधे स्वभाव वाली स्त्रियां फिर मन्थन करें ॥६॥ अग्नि के स्थापन में इन स्त्रियों को नियुक्त न करे-शूद्री, क्रोधिनी, लड़ाका, जो किसी नियम में स्थित न हो, और जिस ने अन्य पुरुष का संग किया हो ॥ ७ ॥ फिर उन दो प्रकार की सवर्णा असवर्णा स्त्रियों में जो अत्यन्त समर्थ बलवती हो अथवा एक वर्ण की प्राप्त हुई बहुत स्त्रियों में कोई अवस्था में छोटी भी हो तो वह इच्छापूर्वक अग्नि को मथे ॥८॥ पैदा हुए अग्नि के लक्षण प्रकाश कर अग्निशाला में लाके प्रज्वलित करके और समिधा ढांक की लकड़ी अग्नि में रख के अग्निकुण्ड से दक्षिण में विधिपूर्वक वरण करके ब्रह्मा को बैठावे ॥९॥ फिर पूर्णाहुति के सब मन्त्रों से पूर्णाहुति देकर अन्त में ब्रह्मा को दो वस्त्र और गौ दान देवे ॥१०॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ १९

होमपात्रमनादेशे द्रवद्रव्येषुस्रुवःस्मृतः ।
पाणिरेवेतरस्मिंस्तु स्रु चैवात्रातुहूयते ॥ ११ ॥
खादिरोवाथपालाशो द्विवितस्तिःस्रुवःस्मृतः ।
स्रुग्बाहुमात्राविज्ञेया वृत्तस्तुप्रग्रहस्तयोः ॥ १२ ॥
स्रुवाग्रेघ्राणवत्खातं द्व्यंगुष्ठपरिमंडलम् ।
जुह्वाःशराववत्खातं संनिर्वाहंषडंगुलम् ॥ १३ ॥
तेषांप्राक्शःकुशैःकार्यः संप्रमार्गेजुहूपता ।
प्रतापनञ्चलिप्तानां प्रक्षाल्योष्णेनवारिणा ॥ १४ ॥
प्राञ्चंप्राङ्मुदगग्नेरुदगग्रंसमीपतः ।
तत्तथासादयेद्द्रव्यं यद्यथाविनियुज्यते ॥ १५ ॥
आज्यद्रव्यमनादेशे जुहोतिषुविधीयते ।
मन्त्रस्यदेवतायाश्च प्रजापतिरितिस्थितः ॥१६॥


जहां गीले वस्तुका होम करना हो और कोई होमपात्र न कहा हो तो वहां स्रुवा को होम का पात्र समझना चाहिये अन्य सूखे साकल्य में हाथ से होम और यहां अग्निहोत्र में स्रुच् से ही होम होता है ॥११॥ खैर अथवा ढाक का दोबित्तस्त लंबा स्रुव कहा है और एक भुजानर लम्बी स्रुच् होती है इन दोनों का प्रग्रह [पकड़नेकी जगह] वृत्त [गोल] होती है ॥ १२ ॥ स्रुव के अग्रभाग में नासिका के समान दो गर्त होते दो अंगूठे की बराबर गहरे गोलाकार बनावे और जुहू (होमपात्र) के अग्रभाग में शराव (सरवा) के समान संनिर्वाह (पनाले के समान) छः अंगुल का गर्त करना चाहिये ॥१३॥ उनके पहिले भागमें कुशाग्रोंसे प्रमार्ज (अच्छी सफाई) हवन करना चाहता हुआ करें-यदि ये तीनों घी आदिसे लिपे होंतो उष्ण जलसे धोकर इनको तपाय ले ॥ १४ ॥ अग्नि से उत्तर में पूर्व को अग्नि के समीप ही उत्तर को अग्रभाग कर २ पात्रासादन कर्म करे जिस २ पात्रादिका जैसा २ आगे पीछे काम पड़े उन २ को वैसा २ क्रम से स्थापित करे ॥१५॥ सब होर्मों में जहां किसी होम के वस्तु का नाम नहीं कहा वहां गौ के घी को ही हव्य जानो जहां किसी मंत्र का देवता नहीं कहा वहां प्रजापति देवता समझो यही मर्यादा है ॥१६॥

२७ | भाषावेमसंहिता ॥

नांगुष्ठादधिकाग्राह्या समिथ्स्थूलतयाक्वचित् ।
नवियुक्तात्वचाचैव नसकीटानपाटिता ॥ १९ ॥

प्रादेशान्नाधिकानोना नतथास्याद्विशाखिका ।
नसपर्णाननिर्वर्या होमेषुचविजानता ॥ १८ ॥

प्रादेशद्वयमिध्मस्य प्रमाणंपरिकीर्तितम् ।
एवंविधाःस्युरेवेह समिधःसर्वकर्मसु ॥ १९ ॥

समिधोऽष्टादशेध्मस्य प्रवदन्तिमनीषिणः ।
दर्शचपौर्णमासेच क्रियास्वन्यासुविंशतिः ॥ २० ॥

समिधादिषुहोमेषु मंत्रदैवतवर्जिता ।
पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्च हीन्धनार्थंसमिद्भवेत् ॥ २१ ॥

इध्मोऽप्येंधार्थमाचार्यैर्हविराहुतिपुरस्कृतः ।
यत्रचास्यनिवृत्तिःस्यात्तत्स्पष्टीकरवाण्यहम् ॥ २२ ॥


जो अंगूठे से अधिक मोटी हो जिस के त्वचा (बक्कल) न हो जिस में कीड़े हों—और जो फटी हो ऐसी समिधा किसी होम में नहीं लेनी चाहिये ॥ १९ ॥

जो प्रादेश (अंगूठा और तर्जनी की लम्बाई प्रमाण) से अधिक लम्बी हो वा कम हो और जिसके शाखा (डाली) न हों—और जिसके पत्ते हों—और जो घूनी हो—ज्ञानवान् पुरुष होम में ऐसी समिधा न लेवे ॥ १८ ॥

दो एकप्रादेश होम में जलाने के इध्म का प्रमाण कहा है सब कर्मों में ऐसी ही समिधा होनी चाहिये ॥ १९ ॥

विद्वान् लोग दर्शपौर्णमास की इष्टियों में इध्मसञ्ज्ञक अठारह १८ समिधा कहते हैं जिन में पञ्चदश सामिधेनी की दो परिधि परिधान के अन्त में चढ़ाने की और एक अनुयाजों की ये १८ हुई और अन्य इष्टियों में सप्तदश सामिधेनी होने से बीश होती हैं ॥ २० ॥

जो होम समिधां से किये जाते हैं उन के पहिले अथवा पीछे ईंधन के लिये जो समिधा होती है उन का मंत्र और देवता कोई भी नहीं होता ॥ २१ ॥

एव (ईंधन) के लिये इध्म [अठारह समिध] को भी आचार्य कहते हैं कि वह तो पुरोडाशादि हव्य की आहुतियों में संनिहित है। और जिस कर्म में यह इध्म नहीं उस को हम स्पष्ट करेंगे ॥ २२ ॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ २१

अंगहोमसमित्तन्त्र सोपन्त्याख्येषुकर्म्मसु ।
येषांचैतदुपर्युक्तं तेषुतत्सदृशेषुच ॥ २३ ॥
अक्षभंगादिबिपदि जलहोमादिकर्म्मणि ।
सोमाहुतिषुसर्वासुनैतेष्विध्मोविधीयते ॥ २४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥
सूर्येऽन्तशैलमप्राप्ते षट्त्रिंशद्भिःसदांगुलैः ।
प्रादुष्करणमग्नीनां प्रातर्भासांचदर्शनात् ॥ १ ॥
हस्तादूर्ध्वंरविर्यावद् गिरिंहित्वानगच्छति ।
तावद्धोमविधिःपुण्यो नात्येत्युदितहोमिनाम् ॥ २ ॥
यावत्सम्यङ्नभाष्यंते नभस्यृक्षाणिसर्वतः ।
नचलौहित्यमापैति तावत्सायंचहूयते ॥ ३ ॥
रजोनीहारधूमाभ्रवृक्षाग्रान्तरितेरवौ ।


अंग होम ( बड़े यज्ञ में कर्नव्य छोटे यज्ञ में जो होता है ) समित्तन्त्र गर्भाधान आदि संस्कार—और जिन में पहिले कहा है उन में और उन के समान कर्म्म में ॥ २३ ॥ गाड़ी की धुरी टूट जाने आदि विपत्ति में जल के निमित्त जो होम तिस में और संपूर्ण सोम की आहुतियों में इध्म नहीं कहा है ॥ २४ ॥

यह आठवां खंड पूरा हुआ ॥८॥

जिस समय सूर्य्य अस्ताचल पर्वत से छत्तीस अंगुल ऊपर हों उस समय संध्या को और प्रातःकाल किरणों के दीखने पर अग्नियों को प्रज्वलित करे॥१॥ सूर्योदय हो जाने पर होम करने वालों का होमविधि तब तक भ्रष्ट नहीं होता जब तक उदयाचल से एक हाथ से ऊपर सूर्य न पहुंचे अर्थात् एक हाथ सूर्य्य के चढ़ने तक उदय काल ही रहता है यह विचार उदित होम करने वालों के लिये है ॥ २ ॥ जब तक सब आकाश में भले प्रकार नक्षत्र न दीखें और आकाश की लाली दूर न हो तब तक संध्या को होम कर सकता है ॥३॥ यदि धूली कोहरा धुआं-मेघ और वृक्ष-इन की

२२ भाषार्थसहिता ॥

संध्यामुद्दिश्यजुहुयाहु तमप्यनलुप्यते ॥ ४ ॥ नकुर्यात्क्षिप्तहोमेषु द्विजःपरिसमूहनम् । वैरूपाक्षंचनजपेत्प्रपदं चविवर्जयेत् ॥ ५ ॥ पर्युक्षणंचसर्वत्रकर्त्तव्यमुदितेन्विति । अंतेचवामदेव्यस्य गानंकुर्याहिचस्त्रिधा ॥ ६ ॥ अहोमकेष्वपिभवेद्यथोक्तं चंद्रदर्शनम् । वामदेव्यंगणेष्वन्ते वल्यन्तेवैश्वदेविके ॥ ७ ॥ यान्यधस्तरणान्तानि नतेपुस्तरणंभवेत् । एककार्यार्थसाध्यत्वात्परिधीनपिवर्जयेत् ॥ ८ ॥ बर्हिःपर्युक्षणंचैव वामदेव्यजपस्तथा । क्रत्वाहूतिषुसर्वासु त्रिकमेतन्नविद्यते ॥ ९ ॥ हविष्येषुयथा मुख्यास्तदनुव्रीहयः स्मृतः ।


झाड़ में होनेसेसूर्य न दीखेंतो सन्ध्या समय समझ कर जो होम करै उसका होम नष्ट नहीं होता ॥४॥ द्विज पुरुष शीघ्रता के होमों में परिसमूहन न करै-और विरूपाक्ष मंत्र न जपे प्रपद नामक कर्म भी छोड़ देवे ॥ ५ ॥ सब होमों की आदि में पर्युक्षण (ईशान कोण से प्रदक्षिण अग्नि कुंड के सब ओर जल सेचन करना) और अंत में वामदेव्य साम का तीन प्रकार से गान करे ॥६॥ जिन कर्मों में होम नहीं होता उन में चन्द्रमा का दर्शन जैसे होता है ऐसे सब गणों (कर्मों के समूहों) के अंत में और बलिदान के अन्त में वैश्वदेव के अंत में वामदेव्य साम का गान करना चाहिये ॥ ७ ॥ नीचे स्थल में बिछाये कुशों तक जिन कर्मों की समाप्ति होती है उन में अलग २ कुश नहीं बिछाने चाहिये और एक ही कार्य की सिद्धि के लिये होने से पृथक् २ बने अग्निकुण्डों में अलग २ परिधि नामक लकड़ी भी स्थापित न करे ॥ ८ ॥ बर्हिः [ चार मुट्ठी कुशों के बिछाने का विनियोग ] पर्युक्षण वामदेव्य साम का गान ये तीन कर्म यज्ञों की आहुतियों में नहीं होते ॥ ९ ॥ सब हविष्योँ में जो मुख्य धान वा जौ हैं वे न मिलें तो अन्य कोई अन्न ले लेवे परन्तु उड़द-कोदों-गेहूं

कात्यायनस्मृतिः ॥ २३

माषकोद्रवगौरादिसर्वालाभेऽपिवर्जयेत् ॥ १० ॥
पाण्याहुतिर्द्वादशपर्व्वपूरिका
कंसादिनाचेत्स्रुवमात्रपूरिका ।
दैवेनतीर्थेनचहूयतेहविः
स्वंगारिणिस्वर्चिषितच्चपावके ॥ ११ ॥

योऽनार्च्चिषिजुहोत्यग्नौ व्यंगारिणिचमानवः ।
मन्दाग्निररामयावी च दरिद्रश्चसजायते ॥ १२ ॥
तस्मात्समिद्धेहोतव्यं नासमिद्धेकदाचन ।
आरोग्यमिच्छतायुश्च श्रियमात्यंतिकींपराम् ॥१३॥
होतव्येचहुतेचैव पाणिशूर्पस्फ्यदारुभिः ।
नकुर्यादग्निधमनं कुर्याद्भाव्यजनादिना ॥ १४ ॥
मुखेनैकेधमन्त्यग्निंमुखाद्ध्ये षोऽध्यजायत ।


इन को सदा ही वर्ज दे और तिल आदि की आहुति दे देवे ॥१०॥ सूखे चांवल तिलादि से होम करने में हाथ से जो आहुति देनी हो तो इतने की देवे जिस से बारह पर्व्व ( अंगुल ) चारों अंगुलियों के भर जायं यदि पात्र से देतो स्रुवे को भरके दे और साकल्य को देवतीर्थ [ अंगुलियों के अग्रभाग में होता है ] से अंगारों वाले अच्छे प्रज्वलित अग्नि में आहुति देवे ॥ ११ ॥ जिस में ज्वाला और अंगार नहीं ऐसे अग्नि में जो मनुष्य होम करता है वह मंदाग्नि वाला रोगी और दरिद्री होता है ॥ १२ ॥ तिस से नीरोगता बड़ी अवस्था-और अत्यन्त श्रेष्ठ लक्ष्मी की इच्छा करने वाला पुरुष अच्छे जलते हुए अग्नि में होम करे-जो अग्नि न जलता हो उस में कभी नकरै ॥ १३ ॥ जिस अग्नि में होम करना हो या कर चुका हो उस को हाथ-सूप-स्फ्य [ खङ्ग के तुल्य बना ] तथा लकड़ी से न धोंके किन्तु वीजने आदि से ही जलावे ॥ १४ ॥ कोई आचार्य मुख से अग्नि को जलाना कहते हैं क्योंकि यह अग्नि मुख से ही पैदा हुआ है यदि कोई यह कहे कि अग्नि

२४ भाषार्थसहिता ॥

नाग्निंमुखेनेतिचयलौकिकेयोजयन्तितत् ॥ १५ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ नवमः खंडः ॥ ९ ॥

यथाहनितथाप्रातर्नित्यंस्नायादनातुरः । दन्तान्प्रक्षालयनद्यादौ गृहेचेत्तदमन्त्रवत् ॥ १ ॥ नारदाद्युक्तवृक्षांयदष्टाङ्गुलमपाटितम् । सत्वचंदन्तकाष्ठंस्यात्तदग्रेणप्रधावयेत् ॥ २ ॥ उत्थायनेत्रेप्रक्षाल्य शुचिर्भूत्वासमाहितः । परिजप्यचमन्त्रेण भक्षयेद्दन्तधावनम् ॥ ३ ॥ आयुर्बलंयशोवर्चः प्रजाःपशून्वसूनिच । ब्रह्मप्रज्ञांचमेधांच तन्नोधेहिवनस्पते ॥ ४ ॥ मासद्वयंश्रावणादिसर्वांनद्योरजस्वलाः । तासुस्नानंनकुर्वीत वर्जयित्वासमुद्रगाः ॥ ५ ॥


को मुख से न फूके ऐसा मनु ने कहा है तो वह मनु जी का कथन लौकिक (साधारण) अग्नि के लिये है ॥ १५ ॥

यह नवां खंड पूरा हुआ ॥ ९ ॥

नीरोग मनुष्य जैसे दिन में स्नान करे तैसे ही प्रातःकाल भी करे नदीआदि के समीप दातौन करके स्नान करे और घर में करे तो मन्त्रों के बिनाहीकरे ॥१॥ नारद आदि ऋषियों ने कहे जो वृक्ष उन की आठ अंगुल लम्बी बिना फटी और वक्कल सहित-दांतौन होनी चाहिये उस के अग्रभाग से दातों को अच्छी तरह शुद्ध करे ॥२॥ प्रातःकाल सोते से उठ कर नेत्रों को धोके सावधानी से शुद्ध होकर और (अन्नाद्यायव्यूहध्वं०) इत्यादि मन्त्र को जप के दातौन करे॥३॥ और वनस्पति से प्रार्थना करे कि हे वृक्ष तू मुझे अवस्था-बल कीर्त्ति तेज,प्रजा, पशु, धन, वेद और उत्तम बुद्धि इन को दे ॥४॥ श्रावण आदि दो महीनों में सब नदी रजस्वला [मलिन जल वाली] होजाती हैं जो नदी समुद्र तक जाती हैं उन को छोड़ कर रजस्वला नदियों में स्नान न करे ॥ ५ ॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ २५

धनुःसहस्राण्यष्टौतु गतिर्यासांनविद्यते ।
नतानदीशब्दवहा गर्त्तास्ताःपरिकीर्त्तिताः ॥ ६ ॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे प्रेतस्नानेतथैवच ।
चन्द्रसूर्यग्रहेचैव रजोदोषोनविद्यते ॥७॥
वेदाश्छन्दांसिसर्वाणि ब्रह्माद्याश्चदिवौकसः ।
जलार्थिनोऽथपितरो मरीच्याद्यास्तथर्षयः ॥८॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे स्नानार्थंब्रह्मवादिनः ।
पिपासूननुगच्छन्ति सन्तुष्टाःस्वशरीरिणः ॥६॥
समागमस्तुयत्रैषां तत्रहत्यादयोमन्नाः ।
नूनंसर्वेक्षयंयान्ति किमुतैकंनदीरजः ॥१०॥
ऋषीणांसिच्यमानाना-मन्तरालंसमाश्रितः ।
सम्पिबेद्यःशरीरेण पर्षन्मुक्तजलच्छटाः । ११॥
विद्यादीन्ब्राह्मणःकामान्वरादीन्कन्यकाऽऽप्नुयात् ।


आठ हजार धनुष तक जो नहीं जातीं उन को नदी नहीं कहते किन्तु उनका नाम गर्त है ॥६॥ उपाकर्म नाम श्रावणी के दिन होने वाला वेदारम्भ और उत्सर्ग नाम वेद समाप्ति का स्नान प्रेत के निमित्त स्नान चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण का स्नान इन में नदी के रजस्वला होने का दोष नहीं है ॥७॥ वेद, संपूर्ण छंद ब्रह्मादिक देवता और जल के अभिलाषी पितर और मरीचि आदि ऋषी ॥ ८ ॥ ये सब अपना २ सूक्ष्म शरीर धारण कर उस समय उन के पीछे चलते हैं जिस समय सन्तोषी वेद के ज्ञाता देहधारी उपाकर्म और उत्सर्ग के स्नान के निमित्त जाते हैं ॥ ९ ॥ जहां इन वेद आदिकों का समागम है वहां जब हत्या आदि बड़े २ सब पाप निश्चय से नष्ट हो जाते हैं तब नदी का रज नष्ट क्यों न होगा?॥१०॥ सींचे जाते ( हुए ) ऋषियों के मध्य में ठहरा जो मनुष्य अपने शरीर के द्वारा शिष्य समुदाय से छुट्टी जल की छटाओं ( बूंदों ) को पीता है अर्थात् ऋषि आदि के तर्पणो गङ्ग के छींटें अपने शरीर पर लेता है ॥ ११ ॥

२६ भाषार्थसहिता ॥

आमुष्मिकान्यपिसुखान्याप्नुयात्सनसंशयः ॥१२॥ अशुचयशुचिनादत्त माममन्तर्जलादिना । अनिर्गतदशाहास्तु प्रेतारक्षांसिभुञ्जते ॥१३॥ स्वर्धुन्द्यम्भःसमानिस्युः सर्वाण्यम्भांसिभूतले । कूपस्थान्यपिसोमार्क ग्रहणेनात्रसंशयः ॥१४॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्दशः खण्डः ॥ इतिकर्म्मप्र- दीपे परिशिष्टे कात्यायनविरचिते प्रथमः प्रपाठकः १ अतऊर्द्धंप्रवक्ष्यामि संन्ध्योपासनकंविधिम् । अनर्हःकर्मणांविप्रः सन्ध्याहीनोयतःस्मृतः ॥१॥ सव्येपाणौकुशान्कृत्वाकुर्यादाचमनक्रियाम् ॥ ह्रस्वाःप्रचरणीयाःस्युः कुशादीर्घास्तुवर्हिषः ॥२॥ दर्भाःपवित्रमित्युक्तमतःसन्ध्यादिकर्मणि । सव्यःसोपग्रहःकार्यो दक्षिणःसपवित्रकः ॥३॥


यह यदि ब्राह्मण हो तो विद्या आदि मनोरथों को यदि कन्या हो तो उत्तम वर आदि को प्राप्त होती हैं और परलोक के सुखों को भी प्राप्त होते हैं इस में संशय नहीं ॥ १२ ॥ मरे के दश दिन के भीतर अशुद्ध पुरुष ने दिया जो निमन्त्र अन्न और जलादि है उस को प्रेत और राक्षस भोगते हैं इस से दश दिन के भीतर अन्न दानादि न करे ॥ १३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी पर के और कुये के जल चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में गंगा जल के समान हैं इस में सन्देह नहीं ॥१४॥ यह चौदहवां खंड पूरा हुआ- और कात्यायन के रचे परिशिष्ट कर्म प्रदीप में प्रथम प्रपाठक पूरा हुआ ।

इस से आगे संध्या वंदन की विधि कहते हैं जिस से संध्या हीन ब्राह्मण सब कर्मों के अयोग्य कहा ॥१॥ बांये हाथ में कुशा रख कर आचमन करे छोटे दाभ कुश कहाते हैं और बड़े कुश बर्हि कहाते हैं ॥२॥ इस से सन्ध्या आदि कर्म में दर्भ ही पवित्र कहे हैं बांये हाथ में सोपग्रह (१६कुशा) ले और दहिने में पवित्री ॥३॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ ५९

रक्षेद्द्वारिणात्मानं परिक्षिप्यसमंततः । शिरसोमार्जनंकुर्यात्कुशैः सोदकविन्दुभिः ॥ ४ ॥ प्रणवोभूर्भुवःस्वश्च सावित्रीचतृतीयिका । अब्दैवतंस्यृचश्चैव चतुर्थमितिमार्जनम् ॥ ५ ॥ भूराद्यास्तिस्रएवैता महाव्याहृतयोऽव्ययाः । महर्जनस्तपःसत्यं गायत्रीचशिरस्तथा ॥ ६ ॥ आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरितिशिरः । प्रतिप्रतीकं प्रणवमुच्चारयेदन्तेचशिरसः ॥ ७ ॥ एताएतांसहानेनतथैभिर्दशभिःसह । त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥ ८ ॥ करेणोद्धृत्यसलिलंघ्राणमासज्यतत्रच । जपेदनायतासुर्वात्रिःसकृद्वाघमर्षणम् ॥ ९ ॥ उत्थाय कर्मातिप्राहेसवित्रेकेणाऽञ्जलिनाम्भसः ।


अपने शरीर के चारों ओर जल भ्रमा के अपनी रक्षा करे और जल को लेकर कुशाओं से शिर का मार्जन करे । प्र० ओंकार भूः, भुवः, स्वः, और तीसरी गायत्री, जल है देवता जिन का ऐसी तीन ऋचा ( आपो हिष्ठा० आदि ) यह चौथा मार्जन है ॥ ५ ॥ भूः भुवः स्वः ये तीन नित्य अविनाशी महाव्याहृती हैं महःजनः तपः सत्य और गायत्री और शिरः ॥ ६ ॥ (आपोज्योती रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वः) यह शिर मंत्र है। भूः आदि प्रत्येक के साथ और शिरः मंत्र के पीछे ओंकार का उच्चारण करे ॥ ७ ॥ ये सात व्याहृति गायत्री यह शिरोमंत्र और ओंकार इन दशों का प्राणों को रोक कर तीन बार जो जप करना है उसे प्राणायाम कहते हैं ॥ ८ ॥ हाथ में जल को उठा के और नासिका में लगाकर तीन बार वा एकबार प्राणों को रोके हुए वा न रोके हुए अघमर्षण (ऋतंच सत्यंचा०) इत्यादि मंत्र को जपै ॥ ९ ॥ उठकर जल की अंजलि से सूर्य के सम्मुख हो अर्थात् गायत्री मन्त्र पढ़ के अंजली देवे फिर ( उदुत्यं

८८ पाराशर्य्यसंहिता ॥

उद्यच्चित्रम्ऋग्द्वयेनाथचोपतिष्ठेदनन्तरम् ॥ १० ॥ संध्याद्वयेऽप्युपस्थानमेतदाहुर्मनीषिणः । मध्येत्वन्ह उपस्थायविभ्राडादीच्छयाजपेत् ॥ ११ ॥ तदसंसक्तपाष्णिर्वाएकपाददृढंपादपि । कुर्यात्कृताञ्जलिर्वापि ऊर्ध्वबाहुरथापिवा ॥ १२ ॥ यत्रस्यात्कृच्छ्रभूयस्त्वं श्रेयसोऽपिमनीषिणः । भूयस्त्वंब्रुवतेतस्यकृच्छ्रेणोहावाप्यते ॥ १३ ॥ तिष्ठेदुदयनात्पूर्वामध्यनामपिशक्तितः । आसीनस्तुसमाप्तान्त्यां संध्यांपूर्वेत्रिकंजपन् ॥ १४ ॥ एतत्संध्यात्रयंप्रोक्तं ब्राह्मण्यंयत्प्रतिष्ठितम् । यस्यनास्त्यादरस्तत्र नसब्राह्मणउच्यते ॥ १५ ॥ सन्ध्यालोपाच्चचकितः स्नानशीलश्चयःसदा ।


ज्ञान० । चित्रंदेवानां ) इत्यादि दो ऋचाओं से सूर्य की स्तुति करे ॥ १० ॥ दोनों संध्याओं में यही सूर्य का उपस्थान है ऐसा मुनीश्वर लोग कहते हैं और मध्यान्ह में स्तुति के पीछे अपनी इच्छा हो तो (विभ्राड्) इस अनुवाकादि को जपे ॥ ११ ॥ उस स्तुति के समय ऐड़ी पृथ्वी पर न लगे अथवा एक ही पैर से खड़ा रहे अथवा आधे पैर से फिर हाथ जोड़ कर अथवा ऊपर को भुजा करके सूर्य की स्तुति करे ॥ १२ ॥ एक पग से खड़े होने आदि जिस प्रकार करने में कष्ट बहुत हो उसी में कल्याण भी बहुत होता है यह बुद्धिमान् कहते हैं क्योंकि कष्ट से ही कल्याण प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ उदय से पूर्व प्रातःकाल और मध्याह्न की संध्या में यथाशक्ति यथावकाश पूर्वाभिमुख खड़े होके गायत्री जपे और सायंकाल में सूर्यास्त होने से पूर्व बैठ कर गायत्री जपे ॥ १४ ॥ ये जो तीन संध्या कही हैं उन्हीं में ब्राह्मण्य (ब्राह्मणपन) ठहरता है जिस को इन तीनों में आदर श्रद्धा नहीं वह ब्राह्मण भी नहीं है ॥ १५ ॥ जो सन्ध्या के न करने में पाप से भयभीत है और स्नान करने

कात्यायनस्मृतिः ॥ २९

तन्दोषानोपसर्पन्ति गरुत्मन्तमिवोरगाः ॥ १६ ॥
वेदमादितआरभ्यशक्तितोऽहरहर्जपेत् ।
उपतिष्ठेततोरुद्रं सर्वाद्वावैदिकज्जपात् ॥ १७ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकादशः खंडः ॥ ११ ॥
अथाद्भिरुत्तर्पयेद्देवान्सतिलाभिःपितॄनपि ।
नमोऽन्तेतर्पयामीति आदावोमितिचब्रुवन् ॥ १ ॥
ब्रह्माणंविष्णुंरुद्रंप्रजापतिंवेदान्देवान्छन्दांस्यृषीन् पु-
राणाचार्यान्गंधर्वानितरान्मासंसंवत्सरंसावयवं देवीरप्स-
सोदेवानुगान्नागान्सागरानपर्वतान्सरितो दिव्यान्मनुष्या-
नितरान्मनुष्यान्यक्षान्रक्षांसिसुपर्णान्पिशाचान् भूतानि-
पृथिवीमोषधीःपशून्वनस्पतीन्भूतग्रामंचतुर्विधमित्युपवी-
त्यथप्राचीनावीतियमंयमपुरुषान्कव्यवाडन लं सोमंयमम-


का सदा स्वभाव वाला है उस से पाप ऐसे ही भागते हैं जैसे गरुड़ के डर से सांप भागते हैं ॥ १६ ॥ प्रति दिन प्रथम से आरम्भ करके शक्ति के अनुसार वेद का पाठ करे उस के पीछे व पहिले वेद के रुद्राध्याय महादेव जी की स्तुति करे अथवा सब वेद का पाठ न करके केवल रुद्री का ही पाठ करे॥१७॥

यह ग्यारहवाँ खंड पूरा हुआ ॥ ११ ॥

फिर आदि में ओं और नमस्क़े अन्त में तर्पयामि ( ओं ब्रह्मणे नमो ब्रह्माणं तर्पयामि) इत्यादिनाम मन्त्र कहना हुआ शुद्ध जलों से देवताओं-और तिल सहित जलों सेपितरों का तर्पण करे तर्पयामि बोलनाआश्वलायनादि गृह्यसूत्रकारों की रायहै। पर शुक्ल यजु के पारस्करगृह्यानुसार (ब्रह्मा तृप्यताम्) इत्यादिप्रकार पढ़ना चाहिये ] ॥ १॥ उस का यह क्रम है-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, वेद, देव, छन्द, ऋषि, पुराणाचार्य, गंधर्व, इतराचार्य, मास, संवत्सरसावयव, देवी, अप्सरा, देवानुग, नाग, सागर, पर्वत, सरित, दिव्यमनुष्य, इतरमनुष्य, यक्षरक्षः, सुपर्ण, पिशाच भूत, पृथिवी, ओषधी, पशु, वनस्पति, भूतग्रामचतुर्विध-इन का तर्पण सव्य होकर करे फिर अपसव्य होकर यम, यम पुरुष, कव्यवा-

३०भाषार्थसहिता ॥

र्य्यमणमग्निष्वात्तान् सोमपीथान् बर्हिषदोऽथस्वान् पितॄन्सकृत्सकृन्मातामहांश्चेतिप्रतिपुरुषमभ्यस्येज्ज्येष्ठभ्रात्- श्वशुरपितृव्यमांतुलांश्च पितृवंशमातृवंशीयेचान्येमत्तउद- कमर्हन्तितांस्तर्पयामीत्ययमवसानाञ्जलिरथ श्लोकाः ॥२॥ छायांयथेच्छेच्छरदातपार्त्तः पयःपिपासुःक्षुधितोऽलमन्नम् । बालोजनित्रींजननीचबालं योषित्पुमांसंपुरुषश्चयोषाम् ॥३॥ तथासर्वाणिभूतानि स्थावराणिचराणिच । विप्रादुदकमिच्छन्ति सर्वाभ्युदयकृद्धि सः ॥ ४॥ तस्मात्सदैवकर्त्तव्यमकुर्वन्महतेनसा । युज्यतेब्राह्मणःकुर्वन्विश्वमेतद्विभर्त्तिहि ॥ ५ ॥ अल्पत्वाद्वोमकालस्य बहुत्वात्स्नानकर्मणः । प्रातर्नतनुयात्स्नानं होमलोपोहिगर्हितः ॥ ६ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ द्वादशः खण्डः ॥१२॥


अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्ता, सोमपीथ, बर्हिषद्, इस के अनन्तर, अपने पितरों का और मातामहों का एक २ बार तर्पण करे और प्रत्येक पितरों का नाम ले ज्येष्ठ भ्राता श्वशुर चाचा, मामा फिर पिता माता के वंश में जो मरे हों अथवा और जो मेरे से जल की इच्छा करते हैं उन को तृप्त करता हूं यह सब से पीछें अञ्जलि दे ॥ २ ॥ अब श्लोक कहते हैं जैसे घप से दुःखी हुआ मनुष्य छाया चाहता है प्यासा मनुष्य जल भूखा अन्न बालक माता को और माता बालक को स्त्री पुरुष को और पुरुष स्त्री को चाहता है ॥ ३ ॥ तिसी प्रकार स्थावर और जङ्गम सब प्राणी ब्राह्मण से जल चाहते हैं क्योंकि ब्राह्मण सब को सुख देने वाला है ॥ ४ ॥ इस से ब्राह्मण सदैव तर्पण करे जो नहीं करता वह बड़े पाप से युक्त होता है और जो ब्राह्मण नियम से तर्पण करता है वह जानो इस जगत् को पालता है ॥ ५ ॥ होम का समय थोड़ा है और स्नान का कृत्य बहुत इस से प्रातःकाल में स्ना विस्तार से न करे क्योंकि होम का लोप निन्दित है ॥ ६ ॥

यह बारह वां खंड पुरा हुआ ॥१२॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ ३१

पंचानामथसत्राणां महतामुच्यतेविधिः ।
यैरिष्ट्वासततंविप्रः प्राप्नुयात्सद्मशाश्वतम् ॥ १ ॥
देवभूतपितृब्रह्ममनुष्याणामनुक्रमात् ।
महासत्राणिजानीयात्तएवेहमहामखाः ॥ २ ॥
अध्यापनंब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तुतर्पणम् ।
होमोदैवोबलिर्भौतो नृयज्ञोतिथिपूजनम् ॥३॥
श्राद्धंवापितृयज्ञःस्यात्पिण्ड्योबलिरथापिवा ।
यश्चश्रुतिजपःप्रोक्तो ब्रह्मयज्ञःसवोच्यते ॥४॥
सचावार्कतर्पणात्कार्यः पश्चाद्वाप्रातराहुतेः ।
वैश्वदेवावसानेवा नान्यत्रैतौनिमित्तकात् ॥५॥
अप्येकमाशयेद्विप्रं पितृयज्ञार्थसिद्धये ।
अदैवंनास्तिचेदन्यो भोक्ताभोज्यमथापिवा ।
अप्युद्धृत्ययथाशक्त्या किंचिदन्नंयथाविधि ।


इस के अनन्तर सत्तम जो पांच महायज्ञ उन की विधि कहते हैं। जिन को ब्राह्मण निरन्तर अनुष्ठान करके सनातन स्थान [वैकुण्ठ] को प्राप्त होता है।१।
देवयज्ञ भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, इन पांचों को क्रम से महासत्र जानो और ये ही पांच महामख (बड़े यज्ञ) कहे हैं ॥ २ ॥
विधिपूर्वक वेद का पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ है तर्पण पितृयज्ञ है होम दैवयज्ञ बलि रखना भूतयज्ञ है और अतिथि का पूजन मनुष्ययज्ञ है ॥ ३ ॥ अथवा नित्य श्राद्ध को वा पितरों के नाम से जो एक ग्रास (पितृभ्यः स्वधानमः) से दिया जाता है वह पितृयज्ञ है और श्रुति वेद मन्त्रादि का जो जप कहा है वह ब्रह्मयज्ञ है ॥४॥ उस ब्रह्मयज्ञ को तर्पण से पहिले अथवा प्रातःकाल के होम से पीछे अथवा वैश्वदेव के पीछे करे किसी निमित्त के विना अन्य समय में न करे ॥५॥ यदि भोजन करने वाला दूसरा कोई न मिले वा भोजन न मिले तो विश्वेदेवाओं के बिना ही एक ब्राह्मण को पितृयज्ञ की सिद्धि के निमित्त जिमा देवे ॥६॥ यथाशक्ति थोड़ासा अन्न निकाल कर विधिसे पितरों

३२ माधवसंहिता ॥

पितृभ्योऽथम मनुष्येभ्यो दद्यादहरहर्द्विजे ॥७॥
पितृभ्यश्चेदमित्युक्त्वा स्वधाकारमुदीरयेत् ।
हन्तकारं मनुष्येभ्यस्तदर्घेनिनयेदपः ॥८॥
मुनिभिर्द्धिरशनमुक्तं विप्राणांमर्त्यवासिनांनित्यम् ।
अहनिचतथातमस्विन्यां सार्द्धप्रथमयामान्तः ॥९॥
सायंप्रातर्वैश्वदेवः कर्त्तव्योबलिकर्म्मच ।
अनश्नतापि सततमन्यथाकिल्विषीभवेत् ॥१०॥
अमुष्मै नम इत्येवं बलिदानंविधीयते ।
बलिदानप्रदानार्थं नमस्कारः कृतोयतः ॥११॥
(स्वाहाकारवषट्कारनमस्कारादिवौकसाम् ।
स्वधाकारः पितृणांच हन्तकारोनृणांहृतः ॥१२॥
स्वधाकारेणनिनयेत्पितृभ्यंबलिमतःसदा ।
तदर्थेकेनमस्कारं कुर्व्वंतेनेतिगौतमः ॥ १३ ॥


और मनुष्यों के निमित्त ब्राह्मण को प्रतिदिन दे देवे तो भी पितृयज्ञ मनुष्य यज्ञ पूरे हो जाते हैं ॥७॥ पितृभ्यश्चेदं ऐसा कह कर स्वधा कह दे मनुष्यों को भोजन देते समय ( हन्ततइदमन्नम् ) ऐसा कहे और पितरों को दिये अन्नपर पीछे से जल छोड़ देवे ॥८॥ भूलोक के वासी ब्राह्मणों को दो समय ( एक बार दिन में एक बार रात्रि में ) डेढ़ पहर दिन चढ़े वा रात गये तक मुनियों ने भोजन करना कहा है तीसरी बार नहीं ॥९॥ भोजन न करे तो भी सायंप्रातःकाल को बलि वैश्वदेव करे जो न करे तो पाप भागी होता है ॥१०॥ ( इन्द्राय नमः ) इत्यादि मन्त्रों से बलि देना कहा है क्योंकि बलि के लिये नमः शब्द बोलना ही मुख्य है ॥११॥ देवताओं को स्वाहा, वषट्, नमस्कार, पितरों को स्वधा और मनुष्यों को हन्तकार कहना चाहिये ॥ १२ ॥ इस से स्वधा कह कर पितरों को सदैव बलि देवे उस के पीछे नमस्कार करे यह कोई ऋषि कहते हैं और गौतम ऋषि कहते हैं कि न करे ॥ १३ ॥

कात्यायनस्मृतिः ॥ ३१

नावराद्ध्वर्ध्याबलयोभवन्ति महामार्गश्रवणप्रमाणान् । एकत्रचेदविकृष्टाभवंतीतरेतरसंसक्ताश्च ॥ १४ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ त्रयोदशः खंडः ॥ १३ ॥

अतस्तद्विन्यासोवृद्धिपिंडानिवोत्तरांश्चतुरोबलीन्निदध्यात्पृ थिव्यैवायवेविश्वेभ्योदेवेभ्यःप्रजापतयइतिसव्यतएतेषामेकै- कमद्भ्यओषधिवनस्पतिभ्यआकाशायकामायेत्येतेषामपिम- न्यवइन्द्रायवासुकयेब्रह्मणेइत्येतेषामपिरक्षोजनेभ्यइति स- र्वेषांदक्षिणतःपितृभ्यइतिचतुर्दशनित्याआशस्यप्रभृतयःका- म्याःसर्वेषामुभयतोऽद्भिःपरिषेकःपिंडवच्चपश्चिमाप्रतिपत्तिः१। नस्यातां काम्यसामान्ये जुहोतिबलिकर्म्मणी । पूर्वनित्यविशेषोक्तंजुहोतिबलिकर्म्मणोः ॥ २ ॥ काममन्तेभवेयातां नतुमध्यैकदाचन । नै कस्मिन्क र्म्मणितते कर्म्मान्यदापतेद्यतः ॥ ३ ॥


आपसी बुद्धि धन आदि) बलिदिने से कम नहीं होता सनातन मार्ग (संप्रदाय) का जो श्रवण ही इस में प्रमाण है। यदि व्यवधान न हो अथवा परस्पर संबंध (से ।) हो तो एक ही जगह सब बलि दे देवे ॥ १४ ॥

यह तेरहवां खंड पूरा हुआ ॥१३॥

अब बलि देने का क्रम कहते हैं-नांदीमुख के पिंडों के समान चार द- क्षिण उत्तर दिशा में दे पृथिवी, वायु, विश्वेदेवा, प्रजापति ४ इन के दक्षिण में जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश, काम, और मन्यु, इन्द्र, वासुकी, ब्रह्मा, और रक्षोजन, और सबसे दक्षिण दिशा में पितरों को एक बलि देवे ये सबबलि नित्य हैं और आशस्य आदि बलि काम्य हैं जिन को कामना हो तो करे अन्यथा नहीं दोनों ओर की सब बलियों को जल से सींचे और इस से पिछला कर्म पिंड के समान है ॥ १ सामान्य काम्य कर्म में होम और बलि कर्म नहीं होते क्यों कि होम और बलि कर्म का नित्य कर्म से विशेष कहा है ॥२॥ कर्म के अन्त में चाहे इन्हें करले परन्तु बीच में कभी नहीं क्योंकि एक कर्म का जहां प्रारंभ हो वहां दूसरा कर्म प्रारंभ करना नहीं कहा है ॥ ३ ॥

३४ कात्यायनस्मृति ॥

अग्न्यादिर्गौतमाद्युक्तो होमःशाकलएवच । अनाहिताग्नेरप्येष युज्यतेबलिभिःसह ॥ ४ ॥ स्पृष्ट्वापोवोक्ष्यमाणोऽग्निं कृतांजलिपुटस्ततः । वामदेव्यजपात्पूर्वंप्रार्थयेद्द्रविणोदयम् ॥ ५ ॥ आरोग्यमायुरैश्वर्यं धीर्धृतिःशबलंयशः । ओजोवर्चःपशून्वीर्यंब्रह्मन्नाब्राह्मण्यमेवच ॥ ६ ॥ सौभाग्यंकर्मसिद्धिंच कुलज्यैष्ठ्यं सुकृत्वताम् । सर्वमेतत्सर्वसाक्षिन्द्रविणोदश्शरीहितः ॥ ७ ॥ नब्रह्मयज्ञादधिकोस्तियज्ञो नतत्प्रदानात्परमस्तिदानम् । सर्वेनदंताःक्रतवःसदानानान्तोदृष्टःकैश्चिदस्यद्विकस्य ॥८॥ ऋचःपठन्मधुपयःकुल्याभिस्तर्पयेत्सुरान् । घृतामृतौघकुल्याभिर्यजूंष्यपि पठन्सदा ॥ ९ ॥ सामान्यपिपठन्सोममृतकुल्याभिरन्वहम् ।


गौतम आदि ऋषि का कहा अग्नि आदि के आज्यभाग और शाकल (देव कृतस्यैन०) इत्यादि ङः मन्त्रों से होम और बलि कर्म भूत यज्ञ इन को वह ब्राह्मण भी करे जो अग्निहोत्री न हो ॥ ४ ॥ आचमन करके अग्नि को देखता हुआ हाथ जोड़ कर और वामदेव्य सूक्त के जप से पहिले-धन वृद्धि की प्रार्थना करे ॥ ५ ॥ आरोग्य, अवस्था, ऐश्वर्य्य, बुद्धि धैर्य, सुख, बल शुद्ध, यश, ओज, (पराक्रम) वर्च (तेज) पशु वेद, ब्राह्मणशास्त्र ॥ ६ ॥ सौभाग्य, कर्म-की सिद्धि, उत्तम कुल, उत्तमऋतुता, ये सब जो पदार्थ हैं सबके साक्षी द्रविणोद (कुवेर) हमको दीजिये । ७ ॥ ब्रह्मयज्ञ से अधिक यज्ञ और वेद के दान से अधिक दान नहीं है । दान सहित सब यज्ञ यहां तक ही कहे हैं इस से इन दोनों (ब्रह्मयज्ञ और वेद के दान) के फल का अंत किसी ने नहीं देखा ॥ ८ ॥ ऋग्वेद के पढ़ने से शहद और दूध की कुल्याओं (छोटी नदी-वागूल) से देवताओं को और सदैव यजुर्वेद के पढ़ने से घृत और अमृत की कुल्याओं से ॥ ९ ॥ सामवेद के पढ़ने से सोम (अमृत की लता के रस) के