अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ ३१
नावराद्ध्वर्ध्याबलयोभवन्ति महामार्गश्रवणप्रमाणान् । एकत्रचेदविकृष्टाभवंतीतरेतरसंसक्ताश्च ॥ १४ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ त्रयोदशः खंडः ॥ १३ ॥
अतस्तद्विन्यासोवृद्धिपिंडानिवोत्तरांश्चतुरोबलीन्निदध्यात्पृ थिव्यैवायवेविश्वेभ्योदेवेभ्यःप्रजापतयइतिसव्यतएतेषामेकै- कमद्भ्यओषधिवनस्पतिभ्यआकाशायकामायेत्येतेषामपिम- न्यवइन्द्रायवासुकयेब्रह्मणेइत्येतेषामपिरक्षोजनेभ्यइति स- र्वेषांदक्षिणतःपितृभ्यइतिचतुर्दशनित्याआशस्यप्रभृतयःका- म्याःसर्वेषामुभयतोऽद्भिःपरिषेकःपिंडवच्चपश्चिमाप्रतिपत्तिः१। नस्यातां काम्यसामान्ये जुहोतिबलिकर्म्मणी । पूर्वनित्यविशेषोक्तंजुहोतिबलिकर्म्मणोः ॥ २ ॥ काममन्तेभवेयातां नतुमध्यैकदाचन । नै कस्मिन्क र्म्मणितते कर्म्मान्यदापतेद्यतः ॥ ३ ॥
आपसी बुद्धि धन आदि) बलिदिने से कम नहीं होता सनातन मार्ग (संप्रदाय) का जो श्रवण ही इस में प्रमाण है। यदि व्यवधान न हो अथवा परस्पर संबंध (से ।) हो तो एक ही जगह सब बलि दे देवे ॥ १४ ॥
यह तेरहवां खंड पूरा हुआ ॥१३॥
अब बलि देने का क्रम कहते हैं-नांदीमुख के पिंडों के समान चार द- क्षिण उत्तर दिशा में दे पृथिवी, वायु, विश्वेदेवा, प्रजापति ४ इन के दक्षिण में जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश, काम, और मन्यु, इन्द्र, वासुकी, ब्रह्मा, और रक्षोजन, और सबसे दक्षिण दिशा में पितरों को एक बलि देवे ये सबबलि नित्य हैं और आशस्य आदि बलि काम्य हैं जिन को कामना हो तो करे अन्यथा नहीं दोनों ओर की सब बलियों को जल से सींचे और इस से पिछला कर्म पिंड के समान है ॥ १ सामान्य काम्य कर्म में होम और बलि कर्म नहीं होते क्यों कि होम और बलि कर्म का नित्य कर्म से विशेष कहा है ॥२॥ कर्म के अन्त में चाहे इन्हें करले परन्तु बीच में कभी नहीं क्योंकि एक कर्म का जहां प्रारंभ हो वहां दूसरा कर्म प्रारंभ करना नहीं कहा है ॥ ३ ॥