भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३२ माधवसंहिता ॥

पितृभ्योऽथम मनुष्येभ्यो दद्यादहरहर्द्विजे ॥७॥
पितृभ्यश्चेदमित्युक्त्वा स्वधाकारमुदीरयेत् ।
हन्तकारं मनुष्येभ्यस्तदर्घेनिनयेदपः ॥८॥
मुनिभिर्द्धिरशनमुक्तं विप्राणांमर्त्यवासिनांनित्यम् ।
अहनिचतथातमस्विन्यां सार्द्धप्रथमयामान्तः ॥९॥
सायंप्रातर्वैश्वदेवः कर्त्तव्योबलिकर्म्मच ।
अनश्नतापि सततमन्यथाकिल्विषीभवेत् ॥१०॥
अमुष्मै नम इत्येवं बलिदानंविधीयते ।
बलिदानप्रदानार्थं नमस्कारः कृतोयतः ॥११॥
(स्वाहाकारवषट्कारनमस्कारादिवौकसाम् ।
स्वधाकारः पितृणांच हन्तकारोनृणांहृतः ॥१२॥
स्वधाकारेणनिनयेत्पितृभ्यंबलिमतःसदा ।
तदर्थेकेनमस्कारं कुर्व्वंतेनेतिगौतमः ॥ १३ ॥


और मनुष्यों के निमित्त ब्राह्मण को प्रतिदिन दे देवे तो भी पितृयज्ञ मनुष्य यज्ञ पूरे हो जाते हैं ॥७॥ पितृभ्यश्चेदं ऐसा कह कर स्वधा कह दे मनुष्यों को भोजन देते समय ( हन्ततइदमन्नम् ) ऐसा कहे और पितरों को दिये अन्नपर पीछे से जल छोड़ देवे ॥८॥ भूलोक के वासी ब्राह्मणों को दो समय ( एक बार दिन में एक बार रात्रि में ) डेढ़ पहर दिन चढ़े वा रात गये तक मुनियों ने भोजन करना कहा है तीसरी बार नहीं ॥९॥ भोजन न करे तो भी सायंप्रातःकाल को बलि वैश्वदेव करे जो न करे तो पाप भागी होता है ॥१०॥ ( इन्द्राय नमः ) इत्यादि मन्त्रों से बलि देना कहा है क्योंकि बलि के लिये नमः शब्द बोलना ही मुख्य है ॥११॥ देवताओं को स्वाहा, वषट्, नमस्कार, पितरों को स्वधा और मनुष्यों को हन्तकार कहना चाहिये ॥ १२ ॥ इस से स्वधा कह कर पितरों को सदैव बलि देवे उस के पीछे नमस्कार करे यह कोई ऋषि कहते हैं और गौतम ऋषि कहते हैं कि न करे ॥ १३ ॥