अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंकात्यायनस्मृतिः ॥ ३१
पंचानामथसत्राणां महतामुच्यतेविधिः ।
यैरिष्ट्वासततंविप्रः प्राप्नुयात्सद्मशाश्वतम् ॥ १ ॥
देवभूतपितृब्रह्ममनुष्याणामनुक्रमात् ।
महासत्राणिजानीयात्तएवेहमहामखाः ॥ २ ॥
अध्यापनंब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तुतर्पणम् ।
होमोदैवोबलिर्भौतो नृयज्ञोतिथिपूजनम् ॥३॥
श्राद्धंवापितृयज्ञःस्यात्पिण्ड्योबलिरथापिवा ।
यश्चश्रुतिजपःप्रोक्तो ब्रह्मयज्ञःसवोच्यते ॥४॥
सचावार्कतर्पणात्कार्यः पश्चाद्वाप्रातराहुतेः ।
वैश्वदेवावसानेवा नान्यत्रैतौनिमित्तकात् ॥५॥
अप्येकमाशयेद्विप्रं पितृयज्ञार्थसिद्धये ।
अदैवंनास्तिचेदन्यो भोक्ताभोज्यमथापिवा ।
अप्युद्धृत्ययथाशक्त्या किंचिदन्नंयथाविधि ।
इस के अनन्तर सत्तम जो पांच महायज्ञ उन की विधि कहते हैं। जिन को ब्राह्मण निरन्तर अनुष्ठान करके सनातन स्थान [वैकुण्ठ] को प्राप्त होता है।१।
देवयज्ञ भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, इन पांचों को क्रम से महासत्र जानो और ये ही पांच महामख (बड़े यज्ञ) कहे हैं ॥ २ ॥
विधिपूर्वक वेद का पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ है तर्पण पितृयज्ञ है होम दैवयज्ञ बलि रखना भूतयज्ञ है और अतिथि का पूजन मनुष्ययज्ञ है ॥ ३ ॥ अथवा नित्य श्राद्ध को वा पितरों के नाम से जो एक ग्रास (पितृभ्यः स्वधानमः) से दिया जाता है वह पितृयज्ञ है और श्रुति वेद मन्त्रादि का जो जप कहा है वह ब्रह्मयज्ञ है ॥४॥ उस ब्रह्मयज्ञ को तर्पण से पहिले अथवा प्रातःकाल के होम से पीछे अथवा वैश्वदेव के पीछे करे किसी निमित्त के विना अन्य समय में न करे ॥५॥ यदि भोजन करने वाला दूसरा कोई न मिले वा भोजन न मिले तो विश्वेदेवाओं के बिना ही एक ब्राह्मण को पितृयज्ञ की सिद्धि के निमित्त जिमा देवे ॥६॥ यथाशक्ति थोड़ासा अन्न निकाल कर विधिसे पितरों