अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ कात्यायनस्मृति ॥
अग्न्यादिर्गौतमाद्युक्तो होमःशाकलएवच । अनाहिताग्नेरप्येष युज्यतेबलिभिःसह ॥ ४ ॥ स्पृष्ट्वापोवोक्ष्यमाणोऽग्निं कृतांजलिपुटस्ततः । वामदेव्यजपात्पूर्वंप्रार्थयेद्द्रविणोदयम् ॥ ५ ॥ आरोग्यमायुरैश्वर्यं धीर्धृतिःशबलंयशः । ओजोवर्चःपशून्वीर्यंब्रह्मन्नाब्राह्मण्यमेवच ॥ ६ ॥ सौभाग्यंकर्मसिद्धिंच कुलज्यैष्ठ्यं सुकृत्वताम् । सर्वमेतत्सर्वसाक्षिन्द्रविणोदश्शरीहितः ॥ ७ ॥ नब्रह्मयज्ञादधिकोस्तियज्ञो नतत्प्रदानात्परमस्तिदानम् । सर्वेनदंताःक्रतवःसदानानान्तोदृष्टःकैश्चिदस्यद्विकस्य ॥८॥ ऋचःपठन्मधुपयःकुल्याभिस्तर्पयेत्सुरान् । घृतामृतौघकुल्याभिर्यजूंष्यपि पठन्सदा ॥ ९ ॥ सामान्यपिपठन्सोममृतकुल्याभिरन्वहम् ।
गौतम आदि ऋषि का कहा अग्नि आदि के आज्यभाग और शाकल (देव कृतस्यैन०) इत्यादि ङः मन्त्रों से होम और बलि कर्म भूत यज्ञ इन को वह ब्राह्मण भी करे जो अग्निहोत्री न हो ॥ ४ ॥ आचमन करके अग्नि को देखता हुआ हाथ जोड़ कर और वामदेव्य सूक्त के जप से पहिले-धन वृद्धि की प्रार्थना करे ॥ ५ ॥ आरोग्य, अवस्था, ऐश्वर्य्य, बुद्धि धैर्य, सुख, बल शुद्ध, यश, ओज, (पराक्रम) वर्च (तेज) पशु वेद, ब्राह्मणशास्त्र ॥ ६ ॥ सौभाग्य, कर्म-की सिद्धि, उत्तम कुल, उत्तमऋतुता, ये सब जो पदार्थ हैं सबके साक्षी द्रविणोद (कुवेर) हमको दीजिये । ७ ॥ ब्रह्मयज्ञ से अधिक यज्ञ और वेद के दान से अधिक दान नहीं है । दान सहित सब यज्ञ यहां तक ही कहे हैं इस से इन दोनों (ब्रह्मयज्ञ और वेद के दान) के फल का अंत किसी ने नहीं देखा ॥ ८ ॥ ऋग्वेद के पढ़ने से शहद और दूध की कुल्याओं (छोटी नदी-वागूल) से देवताओं को और सदैव यजुर्वेद के पढ़ने से घृत और अमृत की कुल्याओं से ॥ ९ ॥ सामवेद के पढ़ने से सोम (अमृत की लता के रस) के