अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३५
मेदःकुल्याभिरपिच अथर्वाङ्गिरसःपठन् ॥ १० ॥ मांसक्षीरौदनमधुकुल्याभिस्तर्पयेत्पठन् । वाकोवाक्यं पुराणानि इतिहासांनिचान्वहम् ॥ ११ ॥ ऋगादीनामन्यतममेतेषांशक्तितोऽन्वहम् । पठन्मध्वाज्यकुल्याभिः पितॄनपिचतर्पयेत् ॥ १२ ॥ तेतृप्तास्तर्पयन्त्येनं जीवन्तंप्रेतमेवच । कामचारीचभवति सर्वेषुपुरसद्मसु ॥ १३ ॥ गुर्वप्येनोनतंस्पृशेत् पंक्तिञ्चैवपुनातिसः । यंयंक्रतुञ्चपठति फलभाक्तस्यतस्यच ॥ १४ ॥ वसुपूर्णांवसुमतीं त्रिर्दानफलमाप्नुयात् । ब्रह्मयज्ञादपिब्रह्मदानमेवातिरिच्यते ॥ १५ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्दशः खंडः ॥ ब्रह्मणेदक्षिणादेया यत्रयापरिकीर्त्तिता । कर्मान्तेऽनुच्यमानापि पूर्णपात्रादिकाभवेत् ॥ १ ॥
और घृत की कुल्याओं से—और आंगिरस अथर्व वेद के पढ़ने से मेद की कुल्याओं से ॥ १० ॥ वाकोवाक्य पुराण और इतिहास इन को प्रति दिन पढ़ने से मांस दूध ओदन (भात) और मधु इन की कुल्याओं से पुरुष देवताओं को तृप्त करता है ॥११॥ इन ऋग्वेद आदि में से किसी एक को यथाशक्ति प्रति दिन पढ़ने से सहत और घी की कुल्याओं से पितरों को भी तृप्त करता है ॥ १२ ॥ तृप्त हुये वे पितर इस मनुष्य को जीते और मर जाने पर भी तृप्त करते हैं और वह पुरुष सब देवताओं के स्वर्गीय घरों में इच्छा पूर्वक जाने वाला होता है ॥१३॥ बड़ा भी पाप उस को नहीं लगता और जिस पंक्ति में वह बैठता उस को भी पवित्र कर देता है जिस २ यज्ञ को वह पढ़ता है उस २ के फल का भागी होता है ॥१४॥ और धन से भरी हुई पृथ्वी के तीनवार दान के फल को प्राप्त होता है । इस ब्रह्मयज्ञ से अधिक एक ब्रह्म (विद्या) का दान ही है ॥१५॥
यह १४ खण्ड पूरा हुआ॥
जहां २ जो २ दक्षिणा कही है वही दक्षिणा ब्रह्मा को देनी चाहिये यदि किसी कर्म के अन्त में न कही हो तो वहां पूर्णपात्र दक्षिणा देवे ॥ १ ॥
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