अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ कात्यायनस्मृतिः ॥
यावताबहुभोक्तुस्तु तृप्तिःपूर्णेनविद्यते । नावरादूर्ध्वमतःकुर्यात् पूर्णपात्रमितिस्थितिः ॥ २॥
विदध्याद्धौत्रमन्यश्चेद्वक्षिणार्द्धहरोभवेत् । स्वयं चेदुभयंकुर्यादन्यस्मैप्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥
कुलर्त्विजमधीयानं सन्निकृष्टंतथागुरुम् । नातिक्रामेत्सदादित्सन्यइच्छेदात्मनोहितम् ॥ ४ ॥
अहमस्मैददामीति एवमाभाष्यदीयते । नैतावपृष्ट्वाददतः पात्रेऽपिफलमस्तिहि ॥ ५ ॥
दूरस्थाभ्यामपिद्वाभ्यां प्रदायमनसावरम् । इतरेभ्यस्ततोदेया देषदानविधिःपरः ॥ ६ ॥
सन्निकृष्टमधीयानं ब्राह्मणंयोव्यतिक्रमेत् । यदद्यातितमुल्लंघ्य ततःस्तेयेनयुज्यते ॥ ७ ॥
यस्यत्वेकगृहेमूर्खो दूरस्थश्चगुणान्वितः ।
बहुत खाने वाले मनुष्य की तृप्ति जिस भरे हुए पात्र से हो सके उस से कम पूर्णपात्र न करै यह मर्यादा है ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मा से भिन्न होता का काम कोई अन्य ब्राह्मण करे तो आधी दक्षिणा उसको तथा आधी ब्रह्मा को देवे । यदि होता और ब्रह्मा का कर्म आप ही करै तो किसी और सुपात्र ब्राह्मण को पूर्ण पात्र दक्षिणा देदेवे ॥ ३ ॥ कुलका ऋत्विज यदि पढित हो अथवा गुरु समीप में होय तो अपने कल्याण को चाहता हुआ मनुष्य दान देने के समय इन दोनों का उल्लंघन न करे अर्थात् इन्ही को देवे ॥ ४ ॥ मैं इस को देता हूं यह कह कर दिया जाता है इन पुरोहित गुरु के बिना पूछे सुपात्र को देने से भी दाता को फल नहीं होता ॥ ५ ॥ यदि ये दोनों दूरदेश में हों तो उत्तम बस्तु मन से इन दोनों को देकर अन्य मनुष्योंको देवे यह उत्तम दान की विधि है ॥ ६ ॥ समीप के पढित ब्राह्मण को छोड़कर जो दूरस्थ को जितना द्रव्य देता है उतने द्रव्य की चोरी के फल को वह भोगता है ॥ ७ ॥ जिस के घर में एक मूर्ख है और गुणी दूर है तो वहां गुणीको ही देवे क्योंकि वहां मूर्खका उल्लंघन नहीं