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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

३६ कात्यायनस्मृतिः ॥

यावताबहुभोक्तुस्तु तृप्तिःपूर्णेनविद्यते । नावरादूर्ध्वमतःकुर्यात् पूर्णपात्रमितिस्थितिः ॥ २॥

विदध्याद्धौत्रमन्यश्चेद्वक्षिणार्द्धहरोभवेत् । स्वयं चेदुभयंकुर्यादन्यस्मैप्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥

कुलर्त्विजमधीयानं सन्निकृष्टंतथागुरुम् । नातिक्रामेत्सदादित्सन्यइच्छेदात्मनोहितम् ॥ ४ ॥

अहमस्मैददामीति एवमाभाष्यदीयते । नैतावपृष्ट्वाददतः पात्रेऽपिफलमस्तिहि ॥ ५ ॥

दूरस्थाभ्यामपिद्वाभ्यां प्रदायमनसावरम् । इतरेभ्यस्ततोदेया देषदानविधिःपरः ॥ ६ ॥

सन्निकृष्टमधीयानं ब्राह्मणंयोव्यतिक्रमेत् । यदद्यातितमुल्लंघ्य ततःस्तेयेनयुज्यते ॥ ७ ॥

यस्यत्वेकगृहेमूर्खो दूरस्थश्चगुणान्वितः ।


बहुत खाने वाले मनुष्य की तृप्ति जिस भरे हुए पात्र से हो सके उस से कम पूर्णपात्र न करै यह मर्यादा है ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मा से भिन्न होता का काम कोई अन्य ब्राह्मण करे तो आधी दक्षिणा उसको तथा आधी ब्रह्मा को देवे । यदि होता और ब्रह्मा का कर्म आप ही करै तो किसी और सुपात्र ब्राह्मण को पूर्ण पात्र दक्षिणा देदेवे ॥ ३ ॥ कुलका ऋत्विज यदि पढित हो अथवा गुरु समीप में होय तो अपने कल्याण को चाहता हुआ मनुष्य दान देने के समय इन दोनों का उल्लंघन न करे अर्थात् इन्ही को देवे ॥ ४ ॥ मैं इस को देता हूं यह कह कर दिया जाता है इन पुरोहित गुरु के बिना पूछे सुपात्र को देने से भी दाता को फल नहीं होता ॥ ५ ॥ यदि ये दोनों दूरदेश में हों तो उत्तम बस्तु मन से इन दोनों को देकर अन्य मनुष्योंको देवे यह उत्तम दान की विधि है ॥ ६ ॥ समीप के पढित ब्राह्मण को छोड़कर जो दूरस्थ को जितना द्रव्य देता है उतने द्रव्य की चोरी के फल को वह भोगता है ॥ ७ ॥ जिस के घर में एक मूर्ख है और गुणी दूर है तो वहां गुणीको ही देवे क्योंकि वहां मूर्खका उल्लंघन नहीं

भाषार्थसहिता ॥ ३७

गुणान्वितायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति विप्रेवेदविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ९ ॥ आज्यस्थालीचकत्र्त्तव्या तैजसद्रव्यसंभवा । महीमयीवाकर्त्तव्या सर्वास्याज्याहुतीषुच ॥ १० ॥ आज्यस्थाल्याःप्रमाणंतु यथाकामन्तुकारयेत् । सुदृढामव्रणांभद्रामाज्यस्थालींप्रचक्षते ॥ ११ ॥ तिर्यगूद्ध्र्वं समिन्मात्रा दृढानातिबृहन्मुखी । मृन्मय्यौदुम्बरीवापि चरुस्थालीप्रशस्यते ॥ १२ ॥ स्वशाखोक्तःप्रसुस्विन्नो ह्यदग्धोऽकठिनःशुभः । नचातिशिथिलःपाच्यो नचरुञ्चारसस्तथा ॥ १३ ॥ इध्मजातीयमिध्मार्थं प्रमाणंमेक्षणंभवेत् । वृत्तं चाङ्गुष्ठपृथ्वग्रमवदानक्रियाक्षमम् ॥ १४ ॥ एषैवदर्वीस्तत्र विशेषस्तमहंब्रुवे ।


माना जायगा ॥ ८ ॥ वेद से रहित ब्राह्मण का उलंघन नहीं है क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़कर भस्म में आहुति नहीं दी जाती है ॥ ९ ॥

घी की सब आहुतियों में सोने चांदी कांसा तांबादि की वा मिट्टी की आज्यस्थाली ( घी का पात्र ) बनाना चाहिये ॥ १० ॥ आज्यस्थाली का प्रमाण अपनी इच्छा के अनुसार रक्खे परन्तु छिद्र रहित दृढ दर्शनीय पात्र को ही विद्वान् लोग आज्यस्थाली कहते हैं ॥ ११ ॥ जो तिरछी और ऊंची समिधा की बराबर दृढ हो और अधिक चौड़ा जिसका मुख न हो ऐसी चरुस्थाली ( भात पकाने का पात्र ) श्रेष्ठ होता है ॥ १२ ॥ जो अपनी शाखा में कहा हो जिसमें जल न टपके जला न हो—कड़ा न हो— सुन्दर हो—बहुत गला न हो—रस वाला हो ऐसे चरु को पकावे ॥ १३ ॥ जिस काठ का इध्म हो उसी काठ का और इध्म का आधा प्रमाण लम्बा—और गोल—और अंगूठा के समान जिसका अग्रभाग मोटा हो और जो चरु के लेने में समर्थ हो ऐसा मेक्षण होता है ॥ १४ ॥ इसी को

३८ कात्यायनस्मृतिः ॥

दर्वीद्व्यंगुलपृथ्वग्रा तुरीयोनान्तुमेक्षणम् ॥ १५ ॥
मुसलोलूखलेवार्क्षे स्वायत्तेसुदृढेतथा ।
इच्छाप्रमाणेभवतः शूर्पं वैणवमेवच ॥ १६ ॥
दक्षिणंवामतोबाह्यमात्माभिमुखमेवच ।
करंकरस्यकुर्वीत करणेन्यञ्चकर्मणः ॥ १७ ॥
कृत्वाग्न्यभिमुखौपाणी स्वस्थानस्थौसुसंयतौ ।
प्रदक्षिणं तथासीनः कुर्यात्परिसमूहनम् ॥ १८ ॥
बाहुमात्राःपरिधय ऋजवःसत्वचोऽव्रणाः ।
त्रयोभवन्तिशीर्णाग्रा एकेषान्तुचतुर्दिशम् ॥ १९ ॥
प्रागग्रावलिभिःपश्चादुदगग्रमथापरम् ।
न्यसेत्परिधिमन्यंचेदुदगग्रमथपूर्वतः ॥ २० ॥
यथोक्तवस्तुसंपत्तौग्राह्यं तदनुकारयेत् ।


दर्वि कहते हैं। इस में जो विशेषता है उसे हम कहते हैं दर्वि का दो अंगुल मोटा अग्रभाग होता है मेक्षण उस में आधा अंगुल मुटाई में कम होता है ॥१५॥
मुसल और ऊखल काठ के होते हैं अच्छे चौड़े-और दृढ़ और अपनी इच्छा नुसार प्रमाण वाले बनावे और सूप बांस का होता है ॥ १६ ॥ नीचे को कोई काम करना हो तो प्रथम दहिने हाथ को अपने सम्मुख औंधा रक्खे और बांयां हाथ उस से ऊपर औंधा रक्खे ॥ १७ ॥ अग्नि के सन्मुख दोनों हाथ आगे दहिना पीछे वांयां सम्यक् तत्पर करके प्रदक्षिण क्रम से परिसमूहन करें ॥ १८ ॥ भुजा की बराबर लम्बी-कोमल-बक्कल सहित-जो घुनी न हो आगे से फटी तीनपरिधि होती हैं किन्हीं ऋषियों के मत में चारो दिशाओं में चार होती हैं ॥ १९ ॥
तीन परिधि रखने के पक्ष में अग्नि कुण्ड की उत्तर दक्षिण मेखलाओं पर दो परिधि पूर्व को अग्रभाग करके घरे तथा पश्चिम मेखला पर उत्तराग्र धरे । यदि चौथी रक्खे तो पूर्वकी मेखला पर उत्तराग्र धरे । वा पूर्व में खाली रक्खे ॥२०॥
यदि शास्त्र में कही हुई वस्तु न मिले तो उस के सदृश को ग्रहण करे

भाषार्थसहिता ॥ ३९

यवानांमिवगोधूमा व्रीहीणामिवशालयः ॥ २१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चदशः खण्डः ॥ १५ ॥
पिण्डान्वाहार्य्यकं श्राद्धं क्षीणेराजनिशस्यते ।
वासरस्यतृतीयांशे नातिसन्ध्यासमीपतः ॥ १ ॥
यदाचतुर्द्दशीयामं तुरीयमनुपूरयेत् ।
अमावास्याक्षीयमाणा तदैवश्राद्धमिष्यते ॥ २ ॥
यदुक्तंयदहस्त्वेव दर्शनंनैतिचन्द्रमाः ।
अनयापेक्षयाज्ञेयं क्षीणेराजनिचेत्यपि ॥ ३ ॥
यच्चोक्तंदृश्यमानेपितच्चतुर्द्दश्यपेक्षया ।
अमावास्यां प्रतीक्षेत तदन्तेर्वापनिर्वपेत् ॥ ४ ॥
अष्टमेंऽशेचतुर्द्दश्याः क्षीणोभवतिचन्द्रमाः ।
अमावास्याष्टमांशंच पुनःकिलभवेदणु ॥ ५ ॥
आग्रहायण्यमावस्या तथाज्यैष्ठस्ययाभवेत् ।
विशेषमाभ्यांब्रुवते चन्द्रचारविदो जनाः ॥ ६ ॥
अत्रेन्दुराय प्रहरेवतिष्ठते चतुर्थभागोनकलावशिष्टः ।


जौ के सदृश गेहूं हैं और व्रीहि (धान) के समान शालि (चावल सफेद) होते हैं ॥ २१ ॥ यह १५ वां खण्ड पूरा हुआ ॥

पिण्डान्वाहार्य्यक श्राद्ध (जो मावस को होता है) जिस दिन चन्द्रमा क्षीण हो तब करे तीसरे प्रहर में कुछ सन्ध्या काल के अति निकट न हो ऐसे अवसर में करना उत्तम होता है ॥ १ ॥ जब अमावस्था की हानि हो तो चतुर्दशी के चौथे प्रहर में श्राद्ध करना कहा है ॥ २ ॥ जो यह कहा है कि जिस दिन चन्द्रमा न दीखे उसी अपेक्षा से अमावस की हानि होने पर चतुर्दशी को श्राद्ध करे ॥ ३ ॥ और जो श्रुति में कहा है कि चन्द्रमा के दीखने पर भी श्राद्ध करे सो चतुर्दशी के अनुरोध से है परन्तु मावस की प्रतीक्षा करे अथवा चतुर्दशी के अन्त में पिण्ड देदेवे ॥ ४ ॥ चौदश के आठवें भाग में ही चन्द्रमा क्षीण होजाता है और अमावश्या के आठवें भाग में अणु (सूक्ष्म) रूप होता है ॥ ५ ॥ अगहन और जेठकी जो मावस हैं इन दोनों में चन्द्रमा की गति के जानने वाले कुछ विशेषता कहते हैं ॥ ६ ॥ इन दोनों मावसों के पहिले प्रहर में सोलहवें भाग से चतुर्थांश कम चन्द्रमा

४०
कात्यायनस्मृतिः ॥

तदन्तएवक्षयमेतिकृत्स्नमेवंज्योतिश्चक्रविदोवदन्ति ॥ ७ ॥
यस्मिन्नब्देद्वादशैकश्चत्रयव्यस्तस्मिंस्तृतीयायापरिदृश्योनोपजायते।
एवंचारंचन्द्रमसोविदित्वाक्षीणेतस्मिन्नपराण्हेचदद्यात् ॥ ८ ॥
सम्मिश्रायाचतुर्द्दश्याअमावस्याभवेत्क्वचित् ।
खर्व्विकांतांविदुःकेचिद्गताध्वामितिचापरे ॥ ९ ॥
वर्द्धमानाममावस्यां लभेच्चेदपरेहनि ।
यामांस्त्रीनधिकान्वापि पितृयज्ञस्ततोभवेत् ॥ १० ॥
पक्षादावेवकुर्वीत सदापक्षादिकंचरुम् ।
पूर्वाण्हएवकुर्व्वन्ति विद्धेऽप्यन्येमनीषिणः ॥ ११ ॥
सपितुःपितृकृत्येषु ह्यधिकारोनविद्यते ।
नजीवन्तमतिक्रम्य किंचिद्दद्यादितिश्रुतिः ॥ १२ ॥
पितामहेजीवतिच पितुःप्रेतस्यनिर्वपेत् ।
पितुस्तस्यचवृत्तस्य जीवेच्चेत्प्रपितामहः ॥ १३ ॥
पितुःपितुःपितुश्चैव तस्यापिपितुरेवच ।


रहता है फिर एक प्रहर के वाद सब क्षय होजाता है ऐसे ज्योतिष के ज्ञाता कहते हैं ॥ ७ ॥ जिस संवत् में तेरह महीने होते हैं उस में तीसरे पहर से पीछे चौदस को चन्द्रमा नहीं दीखे इस प्रकार चन्द्रमा की गति जानकर क्षीण चन्द्रमा के समय मध्यान्ह के पीछे पिण्ड देवे ॥ ८ ॥ यदि कभी चौदश से मिली मावस होय तो उसे कोई खर्व्विका और कोई गताध्वा कहते हैं ॥ ९ ॥ यदि अगले दिन तीन पहर वा अधिक मावस मिले तो उस दिन पितृ यज्ञ ( श्राद्ध ) होता है ॥ १० ॥ पक्ष याग का चरु पक्ष की आदि (१में) तिथि के विद्ध होने भी मध्यान्ह से पूर्व ही करे यह कोई कहते हैं ॥ ११ ॥ जिस का पिता जीवित हो उसको पितृ कर्म में श्राद्ध का अधिकार नहीं है क्योंकि जीते हुए का उलंघन करके अर्थात् जीवते पिता को छोड़ के पितामहादि को कुछ न देवे यह वेद में लिखा है ॥ १२ ॥ पिता-पितामह-प्रपिता मह इन तीनों को ३ पिण्ड देवे । यदि पिता मर गया हो और पितामह जीवित हो तो मरे पिताको पिण्ड देवे । यदि प्रपितामह जीवित हो तथा पिता पितामह दोनों मर गये हों ॥ १३ ॥ तो वृद्ध प्रपितामह ( बूढा परबाबा )

भाषाऽर्थसहिता ॥
४९

कुर्यात्पिण्डत्रयंयस्य संस्थितःप्रपितामहः ॥ १४ ॥
जीवन्तमतिदद्याद्वा प्रेतायान्नोदकेद्विजः ।
पितुःपितृभ्योवादद्यात् सपितेत्यपराश्रुतिः ॥ १५ ॥
पितामहःपितुःपश्चात्पञ्चत्वंयदिगच्छति ।
पौत्रेणैकादशाहादिकर्तव्यंश्राद्धषोडशम् ॥ १६ ॥
नैतत्पौत्रेणकर्तव्यं पुत्रवांश्चेत्पितामहः ।
पितुःसपिण्डनंकृत्वा कुर्यान्मासानुमासिकम् ॥ १७ ॥
असंस्कृतौनसंस्कार्यौ पूर्वौपौत्रप्रपौत्रकैः ।
पितरंतत्रसंस्कुर्यादितिकात्यायनोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥
पापिष्ठमपिशुद्धेन शुद्धं पापकृतापिवा ।
पितामहेनपितरंसंस्कुर्यादितिनिश्चयः ॥ १९ ॥
ब्राह्मणादिहतेताते पतितेसंगवर्जिते ।
व्युत्क्रमाच्चमृतेदेयं येभ्यएवददात्यसौ ॥ २० ॥
मातुःसपिण्डीकरणं पितामह्यासहोदितम् ।


पितामह और अपना पिता इन के लिये तीन पिण्ड वह पुरुष करे ॥ १४ ॥
(जीवते हुए का उलंघन करके मरे हुए को भी द्विज अन्न और जल देवे अथवा जिस का पिता जीवित हो वह अपने पिता के पितरों को देवे यह दूसरी श्रुति है)॥ १५ ॥
यदि पिता से पीछे पितामह मरे तो पोता एकादश आदि सोलह श्राद्ध करै ॥१६॥
यदि पितामह के कोई अन्य पुत्र होय तो पोता श्राद्ध न करै किन्तु पुत्र पिता की सपिंडी करके महीने २ में मासिक श्राद्ध करै ॥ १७ ॥
पितामह आदि यदि संस्कार हीन होंय तो पोते वा प्रपोते उनका संस्कार (दाह आदि) न करें यदि पिता संस्कार हीन होय तो उसका संस्कार पुत्र करै यह कात्यायन ऋषि ने कहा है ॥ १८ ॥
और यह निश्चय है कि पापी भी शुद्ध के संग शुद्ध हो जाता है पापी भी पितामह के संग पिता का संस्कार (श्राद्ध आदि) पुत्र करै ॥ १९ ॥
यदि पिता ब्राह्मण आदि से मरा हो वा पतित हो वा सत्संग से हीन हो अथवा फांसी से मरा हो तो भी उसे और जिनको यह देता है सब को पिण्ड देवे ॥ २० ॥
माता की सपिंडी दादी के

४२ कात्यायनस्मृतिः ॥

यथोक्तेनैवकल्पेन पुत्रिकायानचेत्सुतः ॥ २१ ॥ नयोषिद्भ्यःपृथग्दद्यादवसानदिनादृते । स्वभर्तृपिण्डमात्राभ्यस्तृप्तिरासांयतःस्मृता ॥ २२ ॥ मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः । द्वितीयंतुपितुस्तस्यास्तृतीयंतुपितुःपितुः ॥ २३ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ षोडशः खण्डः ॥ १६ ॥ पुरतोयात्मनःकुर्युःसापूर्वापरिकीर्त्यते । मध्यमादक्षिणेनास्यास्तद्दक्षिणतउत्तमा ॥ १ ॥ वाय्वग्निदिङ्मुखान्तास्ताः कार्याःसार्द्धांगुलान्तराः । तीक्ष्णान्तायवमध्याश्च मध्यंनावद्वोत्किरेत् ॥ २ ॥ शंकुश्चखादिरःकार्यो रजतेनविभूषितः । शंकुश्चैवोपवेषश्च द्वादशाङ्गुलइष्यते ॥ ३ ॥ अग्न्याशाग्रैः कुशैःकार्यं कर्षूणांस्तरणंघनैः ।

संग शास्त्रोक्त विधि से करे यदि पुत्रिका (जो इस प्रतिज्ञा से बिवाही जाती है कि जो इस के लड़का हो सो मैं लूंगा) का पुत्र न हो ॥ २१ ॥ मरण के दिन से बिना स्त्रियों को पति से पृथक् (पिण्डादि) न देवे क्योंकि स्त्रियों की तृप्ति पति के पिंड के लेश से ही कही है ॥ २२ ॥ जो पुत्रिका का पुत्र है वह पहिला पिण्ड माता को दूसरा नाना को तीसरा परनाना को देवे ॥ २३ ॥

यह १६ खण्ड पूरा हुआ ॥

जो रेखा अपने सामने की जाती है उसे पूर्वा और पूर्वा से जो दक्षिण की तरफ की जाती है उसे मध्यमा—और मध्यमा से दक्षिण की तरफ हो उसे उत्तमा कहते हैं ॥ १ ॥ इन तीनों को ऐसे क्रम से करे जैसे वायव्य दिशा से आरम्भ करके आग्नेय दिशा में अग्र भाग हो और डेढ़ अंगुल का बीच रहे और इन तीनों का अग्रभाग पैना और बीच का भाग जौ के समान मोटा हो जैसा कि नाव का आकार होता है ॥ २ ॥ चांदी जिसमें लगी हो और खैर का हो ऐसा शंकु नाम (नाप करने को गाढ़ने की खूंटी) करना यह शंकु और उपवेष नाम हाथ के तुल्य पांच अंगुलि वाला यज्ञ पात्र ये दोनों बारह २ अंगुल के बनावे ॥ ३ ॥ अग्नि की दिशा में है अग्रभाग जिनका ऐसे

भाषार्थसहिता ॥ ४३

दक्षिणांन्तंतदग्रैस्तु पित्र्ययज्ञेपरिस्तरेत् ॥ ४ ॥
स्थगरंसुरभिज्ञेयं चन्दनादिविलेपनम् ।
सौवीराञ्जनमित्युक्तं पिङ्गुलीनांयदञ्जनम् ॥ ५ ॥
स्वस्तरेसर्वमासाद्य यथावदुपयुज्यते ।
देवपूर्व्वंततःश्राद्धमत्वरःशुचिरारभेत् ॥ ६ ॥
आसनाद्यर्घपर्यन्तं वसिष्ठेनयथेरितम् ।
कृत्वाकर्मार्थपात्रेषु उक्तंदद्यात्तिलोदकम् ॥ ७ ॥
तूष्णींपृथगपोदत्वा मन्त्रेणतुतिलोदकम् ।
गन्धोदकंचदातव्यं सन्निकर्षक्रमेणतु ॥ ८ ॥
आसुरेणतुपात्रेण यस्तुदद्यात्तिलोदकम् ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्च ॥ ९ ॥
कुलालचक्रनिष्पन्नमासुरंमृन्मयंस्मृतम् ।
तदेवहस्तघटितं स्थाल्यादिदैविकंभवेत् ॥ १० ॥
गन्धान्ब्राह्मणसात्कृत्वा पुष्पाण्युतुभवानिच ।


कुशों से कर्षू नाम उक्त तीनों रेखाओं का आच्छादन करे। और पितरों के श्राद्ध में दक्षिणा को है अग्रभाग जिनका ऐसे कुशों का परिस्तरण करे ॥ ४ ॥

सुगन्ध वाले चन्दन आदि के लेपन को स्थगर और पिङ्गुलियों के अञ्जन को सौवीराञ्जन कहते हैं ॥ ५ ॥ अच्छे कुशों के आसन पर सब वस्तुओं को यथोचित रख कर शीघ्रता न करके देवताओं का पूजन आदि पूर्वक शुद्ध होकर श्राद्ध का प्रारम्भ करे ॥ ६ ॥ आसन से लेकर अर्घ पर्यन्त कर्म वशिष्ठ जी ने जैसा कहा है उस प्रकार करके पात्र में पूर्वोक्त तिलोदक देवे ॥ ७ ॥ प्रथम मन्त्र के विना पृथक् २ जल देकर मन्त्र द्वारा तिल जल देवे और समीप के क्रम से फिर गन्धोदक देवे ॥ ८ ॥ आसुर पात्र से जो पुरुष तिलोदक देता है पन्द्रह वर्ष तक उसके यहां पितर नहीं खाते ॥ ९ ॥ कुलाल के चाक से जो मिट्टी का पात्र बनता है उसे आसुर (राक्षसों का) पात्र कहते हैं और वही मट्टी का पात्र स्थाली आदि हाथ से बनता है उसे दैविक (देवताओं का) पात्र कहते हैं ॥ १० ॥ गन्ध और ऋतु में पैदा हुये फूल और दूध ब्राह्मणों को क्रम से

४४ कात्यायनस्मृतिः ॥

धूपंचैवानुपूर्व्येण ह्यग्नौकुर्यादनन्तरम् ॥ ११ ॥ अग्नौकरणहोमश्च कर्तव्य उपवीतिना । प्राङ्मुखेनैवदेवेभ्यो जुहोतीतिश्रुतिःश्रुता ॥ १२ ॥ अपसव्येनवाकार्यो दक्षिणाभिमुखेनच । निरुप्यहविरन्यस्मा अन्यस्मै नहिहूयते ॥ १३ ॥ स्वाहाकुर्यान्नचात्रान्ते नचैवजुहुयाद्धविः । (स्वाहाकारेणहुत्वाग्नौ पश्चान्मन्त्रंसमापयेत्) ॥ १४ ॥ पित्र्येयःपङ्क्तिमूर्द्धन्यस्तस्यपाणावनग्निमान् । हुत्वामन्त्रवदन्येषां तूष्णींपात्रेषुनिःक्षिपेत् ॥ १५ ॥ नोंकुर्याद्धोममन्त्राणां पृथगादिषुकुत्रचित् । अन्येषांचाविकृष्टानां कालेनाचमनादिना ॥ १६ ॥ सव्येनपाणिनेत्येवं यदत्रसमुदीरितम् । परिग्रहणमात्रंतत् सव्यस्यादिशतिव्रतम् ॥ १७ ॥ पिञ्जल्यद्याभिसंगृह्य दक्षिणेनेतरात्करात् ।


देकर क्रम से सब को धूप देवे ॥११॥ अग्नौकरण नामक श्राद्ध सम्बन्धी होम सव्य होकर करे और पूर्व को मुख करके ही देवताओं के लिये होम करे यह वेद में लिखा है ॥ १२ ॥ अथवा दक्षिण को मुख करके अपसव्य होकर करे और अन्य देवता के नाम से हविष् ग्रहण करके किसी अन्य के नाम से होम न करे ॥१३॥ और इस अग्नौकरण होम में मन्त्र के अन्त में स्वाहा न कहे न हविष् का होम करे किन्तु पहिले केवल स्वाहा कह कर होम करके पीछे पूरा मन्त्र पढ़े ॥१४॥ पितृ कर्म में जो ब्राह्मण पंक्ति में मुख्य हो उसके हाथ में विधिपूर्वक अग्निस्थापन न करने वाला ब्राह्मण मन्त्र पढ़कर आहुति देवे और शेष ब्राह्मणों के पात्रमें बिना मन्त्र हविष् को वह रक्खै जो अग्निहोत्री न हो ॥१५॥ होम के मन्त्रोंकी आदि में कहीं भी पृथक् २ ओं न कहे-और आचमनादि काल के समीप के अन्य मन्त्रों में भी आदि में प्रणव का उच्चारण न करे ॥ १६ ॥ जो यहां श्राद्ध में वाम हाथ से कर्म करना कहा है सो दहिने हाथ को वाम से सब ओर से ग्रहण करके वह कर्म करे किन्तु केवल वाम से नहीं ॥१७॥ पिञ्जली आदि कुशों को दहिने हाथ से ग्रहण करके वांएं हाथ से दहिने हाथ को साथ कर

भाषार्थसहिता ॥ ४५

अन्वारभ्यचसव्येन कुर्यादुल्लेखनादिकम् ॥ १८ ॥
यावदर्थमुपादाय हविषोऽर्भकमर्भकम् ।
चरुणासहसन्नीय पिण्डान्दातुमुपक्रमेत् ॥ १९ ॥
पितुरुत्तरकर्बंशे मध्यमेमध्यमस्यतु ।
दक्षिणेतत्पितुश्चैव पिण्डान्पर्वणिनिर्वपेत् ॥ २० ॥
वाममावर्तनंकेचिदुदगन्तंप्रचक्षते ।
सर्वंगौतमशाण्डिल्यौ शाण्डिल्यायनएवच ॥ २१ ॥
आवृत्यप्राणमायम्य पितॄन्ध्यायन्यथार्थतः ।
जपंस्तेनैवचावृत्य ततःप्राणंप्रमोचयेत् ॥ २२ ॥
शाकंचफाल्गुनाष्टम्यां स्वयंपत्त्यपिवापचेत् ।
यस्तुशाकादिकोहोमः कार्योंऽपूपाष्टकावृतः ॥ २३ ॥
आन्वष्टक्यांमध्यमायामितिगोभिलगौतमौ ।
वार्कखण्डिञ्चसर्वासु कौत्सोमेनेष्टकासुच ॥ २४ ॥
स्थालीपाकंपशुस्थाने कुर्याद्यद्यनुकल्पितम् ।


श्राद्ध में उल्लेखन आदि कर्म करे ॥ १८ ॥ थोड़ा २ प्रयोजन मात्र हविष् लेकर चरु के संग मिला के पिण्ड देने का प्रारम्भ करे ॥ १९ ॥ पिण्ड देने के लिये दक्षिणा को बिछाये कुशों के उत्तर भाग में पिता के नाम से, उस से दक्षिण मध्य कुशों पर पितामह के नाम से और उस से भी दक्षिण में प्रपितामह के नाम से पिण्ड देवे ॥ २० ॥ वामावर्तन (दक्षिण दिशा से प्राणों को रोक कर उत्तरतक ले जाना) को उत्तर दिशा तक करना यह गौतम शांडिल्य और शांडिल्यायन सब ऋषि कहते हैं ॥ २१ ॥ प्राणों को रोक कर ठीक २ पितरों का ध्यान करता तथा प्राणायाम के मन्त्र को जपता हुआ उत्तर को जाकर लौट आके श्वास को छोड़े ॥ २२ ॥ फालगुन की अष्टमी के दिन स्वयं पुरुष अथवा पत्नी शाक को पकावे और जो शाक आदि का होम है वह आठ अपूपों सहित श्राद्ध में करे ॥ २३ ॥ और अन्वष्टका (नवमी) का श्राद्ध मध्यमा (बीच की) अष्टका पर करे यह गोभिल और गौतम ऋषि कहते हैं । वार्कखणिड और कौत्स ऋषि यह कहते हैं कि सब तीनों अष्टकाओं में अन्वष्टका श्राद्ध करे ॥ २४ ॥ और जहां अष्टकादि श्राद्ध में पशु का

४६ कात्यायनस्मृतिः ॥

क्षपयेत्तं सवत्सायास्तरुण्यागोपयस्यनु ॥ २५ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ सप्तदशः खण्डः ॥ १७ ॥

सायमादिप्रातरन्तमेकंकर्मप्रचक्षते ।
दर्शान्तंपौर्णमास्याद्यमेकमेवमनीषिणः ॥ १ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेर्दर्शः पौर्णमासोऽपिवाग्रिमः ।
यआयातिसहोतव्यः सएवादिरितिश्श्रुतिः ॥ २ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेःकुर्यात् सायंहोमादनन्तरम् ।
वैश्वदेवंतुपाकान्ते बलिकर्मसमन्वितम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चादभिरूपान्स्वशक्तितः ।
यजमानस्ततोऽश्नीयादितिकात्यायनोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
वैवाहिकाग्नौकुर्वीत सायं॑प्रातस्त्वतन्द्रितः ।
चतुर्थीकर्मकृत्त्वैतदेतच्छाट्यायनेर्मतम् ॥ ५ ॥
ऊर्ध्वंपूर्णाहुतेःप्रातर्हुत्वातांसांयमाहुतिम् ।


लेख हो वहां पशु के स्थान में स्थालीपाक बना के श्राद्ध करे और उसे बछड़े वाली तरुणा गौके दूध में पकावै ॥ २५ ॥
यह १७ सत्रहवां खण्ड पूरा हुआ ॥

सायंकाल से लेकर प्रातःकाल तक दो भाग में विभक्त एक ही कर्म गिना जाता है और पौर्णमासेष्टि से लेकर दर्शैष्टि तक दो भाग में विभक्त एक ही कर्म कहाता है ॥ १ ॥ श्रौत अग्न्याधान में कही पूर्णाहुति के पश्चात् दर्श वा पौर्णमास जिस इष्टि का समय आवे उसी को पहिले करे वही प्रथम इष्टि होगी—ऐसा श्रुति में कहा है ॥ २ ॥ अग्निस्थापन की पूर्णाहुति हो जाने पर जब तक स्थापित अग्नि में सायंकाल का अग्निहोत्र न हो चुके तब तक अन्य वैश्वदेवादि न करे किन्तु सायं होम के बाद पाक बनने पर वैश्वदेव होम तथा बलिकर्म करे ॥ ३ ॥ फिर अपनी शक्ति के अनुसार जो पण्डित हों ऐसे ब्राह्मणों को जिमा के यजमान भोजन करे यह कात्यायन ऋषि कहते हैं ॥ ४ ॥ चतुर्थीकर्म होजाने पर गृहस्थ पुरुष निरालस्य होके सायं प्रातःकाल विवाह के अग्नि में अग्निहोत्र करे यह शाट्यायन ऋषि का मत है ॥ ५ ॥ पूर्णाहुति के उपरान्त उस सायंकाल की आहुति को एक बार प्रातःकालीन होम के साथ

भाषार्थसहिता ॥ ४१

प्रातर्होमस्तदैवस्यादेषएवोत्तरोविधिः ॥ ६ ॥
पौर्णमासात्ययेहव्यं होतावायदहर्भवेत् ।
तदहर्जुहुयादेवममावास्यात्ययेपिच ॥ ७ ॥
अहूयमानेनन्नंशं चेन्नयेत्कालं समाहितः ।
सम्पन्नेतुयथातत्र हूयतेतदिहोच्यते ॥ ८ ॥
अहुताःपरिसंख्याय पात्रेकृत्वाहुतीः सकृत् ।
मन्त्रेणविधिवद्धुत्वाधिकमेवापराअपि ॥ ९ ॥
यत्रव्याहृतिभिर्होमः प्रायश्चित्तात्मकोभवेत् ।
चतस्रस्तत्रविज्ञेयाः स्त्रीपाणिग्रहणेयथा ॥ १० ॥
अपिवाज्ञातमित्येषा प्राजापत्यापिवाहुतिः ।
होतव्यात्रिविकल्पोऽयं प्रायश्चित्तविधिःस्मृतः ॥ ११ ॥
यद्यग्निरग्निनान्येन संभवेदाहितःक्वचित् ।
अग्नयेविविचयेइति जुहुयाद्वाघृताहुतिम् ॥ १२ ॥


प्रथम करके आगे सायं प्रातःकाल की आहुति अपने २ समय में किया करे यही विधान जानो ॥ ६ ॥ पौर्णमासेष्टि और दर्शेट्टि का नियत समय किसी कारण निकल जाय तो जिस दिन पुरोडाशादि हविष् वा होता मिले उसीदिन उन इष्टियों को विधि पूर्वक करे ॥ ७ ॥ यह कब करे जब जितने दिन होम न भया हो उतने दिन विना भोजन किये बिताये हों—और सम्पन्न (यदि भोजन किया हो) हो तो जैसे होम करे वह रीति यहां कहते हैं ॥ ८ ॥ जितनी आहुति न दी हों उतनी गिन कर एक पात्र में रक्खे वा कुछ अधिक रख के उन सब को मन्त्र से विधि पूर्वक अग्नि में होम करके पश्चात् उस दिन की आहुति देवे ॥ ९ ॥ जहां प्रायश्चित्त के निमित्त व्याहृतियों से होम कहा हो वहां विवाह के तुल्य चार आहुति जाने अर्थात् तीन पृथक् २ और एक तीनों व्याहृति मिला के देवे ॥ १० ॥ अथवा (अज्ञातं०) इस मन्त्र से वा प्रजापति के मन्त्र से आहुति देवे इस प्रकार यह प्रायश्चित्त विधि तीन विकल्प युक्त कहा है ॥ ११ ॥ यदि स्थापित किया अग्नि दूसरे लौकिक अग्नि से कभी मिल जाय तो (अग्नये विविचये०) इस मन्त्र से चावल आदि नियत किये हविष् की आहुति अथवा प्रायश्चित्तार्थ घी से ही आहुति देवे ॥ १२ ॥

४८ कात्यायनस्मृतिः ॥

अग्नयेऽप्सुमतेचैव जुहुयाद्वैघृतेनचेत् । अग्नयेशुचयेचैव जुहुयाच्चदुरग्निना ॥ १३ ॥ गृहदाहाग्निनाग्निस्तु यष्टव्यःक्षामवांद्विजैः । दावाग्निनाचसंसर्गे हृदयंयदतिप्यते ॥ १४ ॥ द्विर्भूतोयदिंसंसृज्ये त् संसृष्टमुपशामयेत् । असंसृष्टंजागरयेद्गिरिशर्मैवमुक्तवान् ॥ १५ ॥ नस्वेऽग्नावन्यहोमःस्यान् मुक्त्वाैकांसमिदाहुतिम् । स्वर्गवासक्रियार्थांञ्च यावन्नासौप्रजायते ॥ १६ ॥ अग्निस्तुनामधेयादौ होमेसर्वत्रलौकिकः । नहिपित्रासमानीतः पुत्रस्यभवतिक्वचित् ॥ १७ ॥ यस्याग्नावन्यहोमःस्यात् सर्वैश्वानरदैवतम्। चरुंनिरूप्यजुहुयात् प्रायश्चित्तंतुतस्यतत् ॥ १८ ॥ परेणाग्नौहुतेस्वार्थं परस्याग्नौहुतेस्वयम् ।


किसी निकृष्ट अग्नि के साथ स्थापित अग्नि के मिल जाने पर यदि घी से ही आहुति देवे तो (अग्नयेऽप्सुमते०) इस मन्त्र से और (अग्नये शुचये०) इस मन्त्र से प्रायश्चित्तार्थ होम करे ॥१३॥ यदि घर में लगे हुए अग्नि से आहित अग्नि मिल जाय तो द्विज लोग (क्षामवां०) मन्त्र से होम करें। यदि दावाग्नि से अपने अग्नि का संसर्ग होजाय और उस से हृदय में दुःख हो तो भी उक्त मन्त्र से प्रायश्चित्त होम करे ॥ १४॥ दो बार करके संसर्ग हो तो अग्नि को शान्त कर देवे और संसर्ग न हुआ होय तो अग्नि को जगा लेवे ऐसा गिरिशर्मा ने कहा है ॥१५॥ अपने अग्नि में एक समिधा की आहुति को छोड़ के अन्य पुत्रादि निमित्त का भी होम न करे चाहे वे अन्य के होम स्वर्गवासार्थ भी हों तो भी अपने अग्नि में तब तक न करे कि जब तक पुत्र उत्पन्न न हो ॥ १६ ॥

नामकरण आदि संस्कारों में सब जगह लौकिक अग्नि लेना चाहिये क्यों कि पिता ने जिस अग्नि को स्थापित किया है वह कभी भी पुत्र का नहीं होता ॥ १७ ॥ जिस अग्निहोत्री के अग्नि में दूसरे मनुष्य का होम होजाय तो वह वैश्वानर देवता वाले चरु को बनाकर होम करे यही उसका प्रायश्चित्त है ॥ १८ ॥ अन्य कोई अपने लिये अग्निहोत्री के स्थापित अग्नि में होम करे

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९

पितृयज्ञात्ययेचैव वैश्वदेवद्वयस्यच ॥ १९ ॥
अनिष्ट्वानवयज्ञेन नवान्नप्राशने तथा ।
भोजनेपतितान्नस्य चरुर्वैश्वानरोभवेत् ॥ २० ॥
स्वपितृभ्यःपितादद्यात् सुतसंस्कारकर्मसु ।
पिण्डानोद्वहनात्तेषां तस्याभावेतुतत्क्रमात् ॥ २१ ॥
भूतिप्रवाचनेपत्नी यद्यसन्निहिताभवेत् ।
रजोरोगादिनातत्र कथंकुर्वन्तियाज्ञिकाः ॥ २२ ॥
महानसेऽन्याकुर्यात् सवर्णांतांप्रवाचयेत् ।
प्रणवाद्यपिवाकुर्यात् कात्यायनवचोयथा ॥ २३ ॥
यज्ञवास्तुनिमुष्ट्यांच स्तंबेदर्भबटौतथा ।
दर्भसंख्यानविहिता विष्टरास्तरणेषुच ॥ २४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ अष्टादशः खण्डः ॥ १८ ॥


वा अन्य के अग्नि में अग्निहोत्री स्वयं होम करे, पितृयज्ञ और दो बार वैश्वदेव के छूट जाने पर ॥१९॥ नवान्नेष्टि किये विना नया अन्न खा लेनेपर तथा पतित मनुष्य का अन्न भोजन करलेने पर इतने कर्मों में वैश्वानर चरु से प्रायश्चित्त होम करे ॥२०॥ पुत्रों के नामकरण आदि संस्कारों में पिता अपने पितरों को पिण्ड आदि देवे जब तक पुत्रों का विवाह न हो और विवाह हो जाने पर पुत्र भी मृत पितरों को पिण्ड देवें । पिता के मरजाने पर जो अधिकारी हो वही पिण्ड देवे ॥ २१ ॥ यदि भूतिप्रवाचन ( ऋत्विजों से आशीर्वाद आदि लेना ) में रजोधर्शन वा रोग आदि कारण पत्नी समीप में न होय तो यज्ञ करने वाले कैसा करें ? ॥२२॥ महानस ( रसोई खाने ) में जो स्त्री अन्न पकावे और वह अपनी सजातीय भी होय तो उसे भूतिप्रवाचन के समय पत्नी के स्थाना-पन्न करलेवे अथवा कात्यायन के कथनानुसार ओंकार आदि कर लेवे ॥ २३ ॥ यज्ञ के वास्तु ( घर ) में मुष्टी में यूपादिस्तंभ में दर्भ के बटु में और विष्टर के आस्तरण में कुशों की गिनती नहीं की जाती है ॥ २४ ॥

यह १८ खंड पूरा हुआ ॥

५० कात्यायनस्मृतिः ॥

निःक्षिप्याग्निंस्वदारेषु परिकल्प्यर्त्विजंतथा । प्रवसेत्कार्य्यवान्विप्रो वृथैवनचिरंकचित् ॥ १ ॥ मनसानैत्यिकंकर्म्म प्रवसन्नप्यतन्द्रितः । उपविश्यशुचिःसर्वं यथाकालमनुव्रजेत् ॥२॥ पत्न्याचाप्यवियोगिन्या शुश्रूष्योऽग्निर्विनीतया । सौभाग्यवित्तावैधव्यकामयाभर्तृ भक्तया ॥३॥ यावास्याद्वीरसूरासामाज्ञासंपादिनीप्रिया । दक्षाप्रियंवदाशुद्धा तामत्रविनियोजयेत् ॥४॥ दिनत्रयेणवाकर्म्म यथाज्यैष्ठंस्वशक्तितः । विभज्यसहवाकुर्य्युर्यथाज्ञानंचशास्त्रवत् ॥५॥ स्त्रीणांसौभाग्यतोज्यैष्ठ्यं विद्ययैवद्विजन्मनाम् । नहिख्यात्यानतपसा भर्तातूष्यतियोषिताम् ॥६॥ भर्तुरादेशवर्त्तिन्या यथोमाबहुभिर्व्रतैः ।


अपनी स्त्री को अग्नि सौंप कर और एक ऋत्विज नियत करके कार्य्य वाला ब्राह्मण विदेश में जावे किन्तु चिरकाल तक कहीं व्यर्थ विदेश में भी नहीं ठहरे ॥१॥ विदेश में गया हुआ भी अग्निहोत्री स्नानादि करके बैठ कर अपने सब नित्य कर्म को आलस्य छोड़कर नियत समय पर मन से किया करे ॥ २ ॥ पति के वियोग को न चाहती हुई सौभाग्य, धन विधवा न होना इन की कामना के लिये पति में है भक्ति जिस की ऐसी पत्नी भी पति के विदेश जाने पर नम्र होकर अग्नि की सेवा करे ॥ ३ ॥ जिस के बहुत स्त्री हों वह पुरुष अग्नि की सेवा में उस स्त्री को नियुक्त करे जो वीरसू ( वीर पुत्र उत्पन्न करने वाली ) आज्ञाकारिणी प्यारी चतुर प्रियवचन कहने वाली-और शुद्ध हो॥४॥ अथवा सब स्त्रियां तीन दिन में बड़ी स्त्री के क्रम से अपनी शक्ति के अनुसार विभाग ( पारी २ से ) वा एक साथ मिल के अग्नि की सेवा करें अथवा जैसा शास्त्र का ज्ञान उन को हो वैसे सब करें ॥ ५ ॥ स्त्रियों का बड़प्पन सौभाग्यवती होने से है और ब्राह्मणों की बड़ाई विद्या से क्योंकि प्रसिद्धि और तप से स्त्रियों पर पति प्रसन्न नहीं होता ॥ ६ ॥ किन्तु पति की आज्ञा

भाषार्थसहिता ॥ ५१

अग्निश्चतोषिताऽमुत्र साध्वीसौभाग्यमाप्नुयात्॥७॥ विनयावनतापिस्त्री भर्तुर्यादुर्भागाभवेत्। अमुत्रोमाग्निभर्तॄणामवज्ञात्तिकृतातया॥८॥ श्रोत्रियंसुभगांगांच अग्निमग्निचितिन्तथा । प्रातरुत्थाययःपश्येदापद्भ्यःसप्रमुच्यते ॥ ९ ॥ पापिष्ठंदुर्भागामन्त्यं नग्नमुत्कृत्तनासिकम् । प्रातरुत्थाययःपश्येतत्सकलेरुपयुज्यते ॥ १० ॥ पतिमुल्लङ्घ्यमोहात्स्त्री किंकिन्ननरकंव्रजेत् । कृच्छ्रान्मन्मनुष्यतांप्राप्य किंकिंदुःखंनविन्दति ॥११॥ पतिशुश्रूषयैवस्त्री कान्नलोकान्समश्नुते । दिवःपुनरिहायाता सुखानाम्पम्बुधिर्भवेत् ॥१२॥ सदारोऽन्यान्पुनर्दारान् कस्यचित्कारणान्तरात्। यइच्छेद्दिग्निमान्कर्तुं क्वहोमोऽस्यविधीयते ॥१३॥ स्वेग्नावेवभवेद्धोमो लौकिकेनाकदाचन ।


करने वाली पर प्रसन्न होता है कि जैसे पार्वती जी ने शिव जी को प्रसन्न किया है। जिसने अग्नि को प्रसन्न किया है वह स्त्री परलोक में सौभाग्य को प्राप्त होती है ॥७॥ पति में प्रेम से नम्रनी हुई भी स्त्री जो दुर्भागिन हो जिस के पुत्रादि नहीं उस ने पूर्व जन्म में पार्वती, अग्नि, और पति, इन का तिरस्कार किया जानो ॥८॥ वेदपाठी, सुहागिन स्त्री, गौ, अग्निहोत्र, और अग्निचयन यज्ञ इन को प्रातःकाल उठ कर जो देखे वह विपत्तियों से छूट जाता है ॥९॥ पापशील, दुर्भागिन बंध्या वा (विधवा) चमार भंगी आदि अन्त्यज नंगा, नकटा, इन को जो प्रातःकाल उठकर देखता है वह कलियुग को प्राप्त होता है ॥१०॥ अज्ञान से पति का उल्लंघन करके स्त्री किस २ नरक में नहीं जाती? फिर बड़े कष्ट से मनुष्य योनि को प्राप्त होकर किस २ दुःख को नहीं प्राप्त होती है ? ॥ ११ ॥ और पति की सेवा से स्त्री कौन २ लोक ( स्वर्गादि ) के सुख नहीं भोगती अर्थात् सभी लोकों के सुख पाती है और स्वर्ग से फिर भूलोक में आकर सुखों का समुद्र बनती है ॥ १२ ॥ जो एक स्त्री वाला अग्निहोत्री पुरुष किसी कारण से अन्य स्त्री से विवाह करने की इच्छा करे तो इस का होम किस अग्नि में होवे ? यह शंका है ॥ १३ ॥ समाधान यह है कि अपने अग्नि में ही होम

५२ कात्यायनस्मृतिः ॥

नह्याहिताग्नेःस्वकर्म लौकिकेऽग्नौविधीयते ॥१४॥
षडाहुतिकमन्येन जुहुयाद्ध्रुवदर्शनात् ।
नह्यात्मनोऽर्थंस्यात्तावद्यावन्नपरिणीयते ॥१५॥
पुरस्तात्त्रिविकल्पं यत्प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तत्षडाहुतिकंशिष्टैर्यज्ञविद्भिःप्रकीर्तितम् ॥१६॥
इति कात्यायनस्मृत्तावेकोनविंशः खण्डः ॥१९॥
इति कात्यायनविरचिते कर्मप्रदीपे द्वितीयः प्रपाठकः ॥२॥
असमक्षन्तुदम्पत्योर्होतव्यंनर्त्विगादिना ।
द्वयोरप्यसमक्षंहि भवेद्धुतमनर्थकम् ॥१॥
विहायाग्निंसभार्यश्चेत्सीमामुल्लङ्घ्यगच्छति ।
होमकालात्ययेतस्य पुनराधानमिष्यते ॥२॥
अरण्योःक्षयनाशाग्निदाहेष्वग्निंसमाहितः ।
पालयेदुपशान्तेस्मिन् पुनराधानमिष्यते ॥३॥


करे लौकिक अग्नि में कदापि नहीं क्योंकि अग्निहोत्री का निज कर्म लौकिक अग्नि में करना शास्त्र में विहित नहीं है ॥ १४ ॥ विवाह में होने वाले ध्रुव दर्शन कर्म के पश्चात् प्रायश्चित्त की छः आहुति का भी अन्य अग्नि में होम न करे । पाणिग्रहण और सप्तपदी से पहिले का होम पत्नी भाव न होने के कारण अपने लिये नहीं माना जायगा ॥ १५ ॥ पहिले जो त्रिविकल्प वाला प्रायश्चित्त कह आये हैं उस को ही यज्ञ के जानने वाले शिष्ट (सज्जन) लोग षडाहुतिक कहते हैं ॥ १६ ॥ यह १९ वां खण्ड पूरा हुआ ॥

कात्यायन के रचे कर्म प्रदीप में २ द्वितीय प्रपाठक पूरा हुआ ॥

स्त्री पुरुष दोनों के परोक्ष में ऋत्विज् आदि कोई स्थापित अग्नि में होम न करे क्योंकि पति पत्नी दोनों की अनुपस्थिति में होम निष्फल होता है ॥१॥ यदि अग्नि को छोड़ कर पत्नी को साथ लेके पुरुष ग्राम की सीमा को लांघ कर चला जाय और उस के होम का समय बीत जाय तो वह फिर से विधिपूर्वक अग्नि का आधान करे ॥ २ ॥ अरणियों का नाश हो जाने वा अग्नि में जल जाने पर सावधानी से अग्नि की रक्षा करे तथापि यदि अग्नि शान्त हो जाय तो फिर से विधिपूर्वक अग्नि का आधान करे ॥ ३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ५३

ज्येष्ठाचेद्बहुभार्य्यस्य अतिचारेणगच्छति । पुनराधानमत्रैक इच्छन्तिनतुगौतमः ॥ ४ ॥ दाहयित्वाग्निभिर्भार्य्यां सदृशींपूर्वसंस्थिताम् । पात्रैश्चाथाग्निमादध्यात्कृतदारोऽविलम्बितः ॥ ५ ॥ एवंवृत्तांसवर्णांस्त्रीं द्विजातिःपूर्वमारणीम् । दाहयित्वाग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्चधर्म्मवित् ॥ ६ ॥ द्वितीयांचैवयःपत्नीं दहेद्वैतानिकाग्निभिः । जीवन्त्यांप्रथमायां तु ब्रह्मघ्नेनसमंहितन् ॥ ७ ॥ मृतायांत्तुद्वितीयायां योऽग्निहोत्रंसमुत्सृजेत् । ब्रह्मोज्झंतंविजानीयाद्यश्चकामात्समुत्सृजेत् ॥ ८ ॥ मृतायामपिभार्य्यायां वैदिकाग्निंनहित्यजेत् । उपाधिनापितत्कर्म यावज्जीवंसमापयेत् ॥ ९ ॥ रामोऽपिकृत्त्वासौवर्णीं सीतांपत्नींयशस्विनीम् । ईजेयज्ञैर्बहुविधैः सहभ्रातृभिरच्युतः ॥ १० ॥


यदि बहुत स्त्री वाले पुरुष की जेठी स्त्री व्यभिचार आदि से चली जाय भाग जाय तो ऐसी अवस्था में कोई ऋषि फिर अग्नि का आधान कहते हैं और गौतम ऋषि नहीं कहते ॥ ४ ॥ अपने वर्ण की और पहिले जो मरी ऐसी स्त्री को स्थापित अग्नियों से पात्रों सहित जला करके शीघ्र ही विवाह कर विधि पूर्वक अग्नि का फिर आधान करे ॥ ५॥ धर्मनिष्ठ धर्मज्ञ द्विजाति पुरुष ऐसे आचरण वाली पूर्व मरी सवर्णा स्त्री को अग्निहोत्र के अग्नि से यज्ञपात्रों सहित दग्ध करके फिर से अग्निहोत्र लेवे ॥ ६ ॥ पीछे बियाही दूसरी स्त्री को स्थापित अग्नि से जो पुरुष पहिली स्त्री के विद्यमान होने पर जलाता है वह ब्रह्म हत्यारे के समान है ॥ ७ ॥ पीछे से विवाहित दूसरी स्त्री के मर जाने पर जो पुरुष इच्छा पूर्वक अग्निहोत्र को त्यागता है उस को वेद त्यागने का अपराधी जानो ॥ ८ ॥ मुख्य स्त्री के मर जाने पर भी वैदिक अग्नि का परित्याग न करे उपाधि (कुशा वा धातु की स्त्री बनाकर) से भी अपने जीवने तक अग्निहोत्र कर्म को पूरा करे ॥ ९॥ महाराजा अच्युत भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने भी यश-वाली सोने की-सीता स्त्री को बना कर भाइयों सहित बड़े २ यज्ञ किये ॥१०॥

५४ कात्यायनस्मृतिः ॥

योदहेदग्निहोत्रेण स्वेनभार्यांकथंचन । सास्त्रीसंपद्यतेतेन भार्यावास्यपुमान्भवेत् ॥ ११ ॥ भार्यामरणमापन्ना देशान्तरगतापिवा । अधिकारीभवेत्पुत्रो महापातकिनिद्विजे ॥ १२ ॥ मान्याचेन्म्रियतेपूर्वं भार्यापतिविमानिता । त्रीणिजन्मानिसापुंस्त्वं पुरुषःस्त्रीत्वमर्हति ॥ १३ ॥ पूर्व्वयोनिःपूर्वावृत् पुनराधानकर्म्मणि । विशेषोवाम्युपस्थानमाज्याहुत्यष्टकंतथा ॥ १४ ॥ कृत्वाव्याहृतिहोमान्तमुपतिष्ठेतपावकम् । अध्यायःकेवलाग्नेयः कस्नेजामिरमानसः ॥ १५ ॥ अग्निमीडेअग्नआयाह्यग्नआयाहिवीतये । तिस्रोऽग्निज्योतिरित्याग्निं दूतमग्नेमृडेतिच ॥ १६ ॥ इत्यष्टावाहुतीर्हुत्वायथाविध्यनुपूर्व्वशः । पूर्णाहुत्यादिकंसर्व्वमन्यत्पूर्व्ववदाचरेत् ॥ १७ ॥


जो अपने अग्निहोत्र के अग्नि से कदाचित् पीछे विवाहि अप्रधान स्त्री का दाह करे तो वह पुरुष जन्मान्तर में स्त्री होता और वह स्त्री पुरुष बनती है ॥ ११ ॥ यदि स्त्री मर गई हो वा विदेश में चली गई हो अथवा अग्निहोत्री पुरुष को ही महापातक लगगया हो, तो अग्निहोत्र का अधिकारी पुत्र होता है ॥ १२ ॥ यदि पति के तिरस्कार^त करने से मान के योग्य पहिली ज्येष्ठा स्त्री पहिले मर जाय तो वह स्त्री तीन जन्म तक पुरुष बनती और पुरुष तीन जन्म तक स्त्री बनता है ॥ १३ ॥ दूसरे अग्नि के आधान में पहिले ही योनि ( अरणी ) और आवृत् होते हैं केवल अग्नि का उपस्थान और आठ घी की आहुतियों की विशेषता है ॥ १४ ॥ व्याहृतियों से होम तक कृत्य करके अग्नि का उपस्थान करे और उस स्तुति में केवल अग्नि का अध्याय १ ( कस्तेजामिरमानसः २ ) ॥ १५ ॥ और ( अग्निमीडे ३ ) ( अग्न आयाह्यग्निभिः ४ । ऋ० प्र० ६ । अ० ४ । व० १४ ) ( अग्न आयाहिवीतये ० ५ ऋ० ४ । ५ । २२ ) ( अग्निज्योतिः ० ६ ) ( अग्निंदूतं वृणीमहे ० ऋ० १ । १ । २२ ) ( अग्नेमृडमहाँ असि ० ८ ऋ० ३ । ५ । ९ ) ॥ १६ ॥ इन आठ आहुतियों को क्रम से विधि पूर्वक देकर पूर्णाहुति आदि सब अन्य कर्म पूर्व के समान करे ॥ १७ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ५५

अरण्योरल्पमप्यङ्गं यावत्तिष्ठतिपूर्वयोः ।
नतावत्पुनराधानमन्यारण्योर्विधीयते ॥ १८ ॥
विनष्टस्रुक्स्रुवंन्युब्जं प्रत्यक्स्थलमुदर्च्चिषि ।
प्रत्यगग्रं चमुसलं प्रहरेज्जातवेदसि ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ विंशतितमः खण्डः ॥ २० ॥
स्वयंहोमासमर्थस्य समीपमुपसर्पणम् ।
तत्राप्यसक्तस्त्यततः शयनाच्चोपवेशनम् ॥ १ ॥
हुतायांसायमाहुत्यां दुर्बलश्चेद्गृहीभवेत् ।
प्रातर्होमस्तदैवस्याज्जीवेच्चेत्सपुनर्नवा ॥ २ ॥
दुर्बलंस्नापयित्वातु शुद्धचैलाभिसंवृतम् ।
दक्षिणाशिरसंभूमौ बर्हिष्मत्यांनिवेशयेत् ॥ ३ ॥
घृतेनाभ्यक्तमाप्लाव्य सवस्त्रमुपवीतिनम् ।
चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं सुमनोभिर्विभूषितम् ॥ ४ ॥


जब तक पहिली दोनों अरणियों का थोड़ा भी भाग शेष रहे तब तक अन्य नयी अरणियों द्वारा अग्नि का पुनराधान कदापि न करे ॥ १८॥ नष्ट हुये स्रुक् स्रुव को औंधा करके और नष्ट हुए मुसल को पश्चिमाग्र करके अच्छे जलते हुए अग्नि में छोड़ के जला देवे ॥ १९ ॥

यह २० वां खण्ड पूरा हुआ ॥

यदि अग्निहोत्री को स्वयं होम करने का सामर्थ्य न हो तो अग्नि के समीप जा बैठे यदि समीप भी न जाया जाय तो शय्या से नीचे उतर बैठे ॥१॥ यदि सायंकाल का होम किये पीछे गृहस्थ दुर्बल ( मरने के समान ) होजाय तो प्रातःकाल का होम उसी समय हो जाय यदि फिर भी वह प्रातःकाल तक जीवित बना रहे तो फिर भी प्रातःकाल हो वा न बचे तो न हो ॥ २॥ दुर्बल ( मरने के समीप जो हो ) को स्नान कराकर शुद्ध वस्त्र पहनावे और दक्षिण दिशा की तरफ शिर करके कुश बिछायी पृथ्वी में लिटा देवे ॥ ३ ॥ मरजाने पर सब शरीर में घी लगा के सवस्त्र स्नान करावे फिर सव्य जनेऊ पहना के सब अङ्गों पर चन्दन छिड़के और पुष्पों से शोभित करे ॥ ४ ॥