अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ५५
अरण्योरल्पमप्यङ्गं यावत्तिष्ठतिपूर्वयोः ।
नतावत्पुनराधानमन्यारण्योर्विधीयते ॥ १८ ॥
विनष्टस्रुक्स्रुवंन्युब्जं प्रत्यक्स्थलमुदर्च्चिषि ।
प्रत्यगग्रं चमुसलं प्रहरेज्जातवेदसि ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ विंशतितमः खण्डः ॥ २० ॥
स्वयंहोमासमर्थस्य समीपमुपसर्पणम् ।
तत्राप्यसक्तस्त्यततः शयनाच्चोपवेशनम् ॥ १ ॥
हुतायांसायमाहुत्यां दुर्बलश्चेद्गृहीभवेत् ।
प्रातर्होमस्तदैवस्याज्जीवेच्चेत्सपुनर्नवा ॥ २ ॥
दुर्बलंस्नापयित्वातु शुद्धचैलाभिसंवृतम् ।
दक्षिणाशिरसंभूमौ बर्हिष्मत्यांनिवेशयेत् ॥ ३ ॥
घृतेनाभ्यक्तमाप्लाव्य सवस्त्रमुपवीतिनम् ।
चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं सुमनोभिर्विभूषितम् ॥ ४ ॥
जब तक पहिली दोनों अरणियों का थोड़ा भी भाग शेष रहे तब तक अन्य नयी अरणियों द्वारा अग्नि का पुनराधान कदापि न करे ॥ १८॥ नष्ट हुये स्रुक् स्रुव को औंधा करके और नष्ट हुए मुसल को पश्चिमाग्र करके अच्छे जलते हुए अग्नि में छोड़ के जला देवे ॥ १९ ॥
यह २० वां खण्ड पूरा हुआ ॥
यदि अग्निहोत्री को स्वयं होम करने का सामर्थ्य न हो तो अग्नि के समीप जा बैठे यदि समीप भी न जाया जाय तो शय्या से नीचे उतर बैठे ॥१॥ यदि सायंकाल का होम किये पीछे गृहस्थ दुर्बल ( मरने के समान ) होजाय तो प्रातःकाल का होम उसी समय हो जाय यदि फिर भी वह प्रातःकाल तक जीवित बना रहे तो फिर भी प्रातःकाल हो वा न बचे तो न हो ॥ २॥ दुर्बल ( मरने के समीप जो हो ) को स्नान कराकर शुद्ध वस्त्र पहनावे और दक्षिण दिशा की तरफ शिर करके कुश बिछायी पृथ्वी में लिटा देवे ॥ ३ ॥ मरजाने पर सब शरीर में घी लगा के सवस्त्र स्नान करावे फिर सव्य जनेऊ पहना के सब अङ्गों पर चन्दन छिड़के और पुष्पों से शोभित करे ॥ ४ ॥