अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ ५५
अरण्योरल्पमप्यङ्गं यावत्तिष्ठतिपूर्वयोः ।
नतावत्पुनराधानमन्यारण्योर्विधीयते ॥ १८ ॥
विनष्टस्रुक्स्रुवंन्युब्जं प्रत्यक्स्थलमुदर्च्चिषि ।
प्रत्यगग्रं चमुसलं प्रहरेज्जातवेदसि ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ विंशतितमः खण्डः ॥ २० ॥
स्वयंहोमासमर्थस्य समीपमुपसर्पणम् ।
तत्राप्यसक्तस्त्यततः शयनाच्चोपवेशनम् ॥ १ ॥
हुतायांसायमाहुत्यां दुर्बलश्चेद्गृहीभवेत् ।
प्रातर्होमस्तदैवस्याज्जीवेच्चेत्सपुनर्नवा ॥ २ ॥
दुर्बलंस्नापयित्वातु शुद्धचैलाभिसंवृतम् ।
दक्षिणाशिरसंभूमौ बर्हिष्मत्यांनिवेशयेत् ॥ ३ ॥
घृतेनाभ्यक्तमाप्लाव्य सवस्त्रमुपवीतिनम् ।
चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं सुमनोभिर्विभूषितम् ॥ ४ ॥
जब तक पहिली दोनों अरणियों का थोड़ा भी भाग शेष रहे तब तक अन्य नयी अरणियों द्वारा अग्नि का पुनराधान कदापि न करे ॥ १८॥ नष्ट हुये स्रुक् स्रुव को औंधा करके और नष्ट हुए मुसल को पश्चिमाग्र करके अच्छे जलते हुए अग्नि में छोड़ के जला देवे ॥ १९ ॥
यह २० वां खण्ड पूरा हुआ ॥
यदि अग्निहोत्री को स्वयं होम करने का सामर्थ्य न हो तो अग्नि के समीप जा बैठे यदि समीप भी न जाया जाय तो शय्या से नीचे उतर बैठे ॥१॥ यदि सायंकाल का होम किये पीछे गृहस्थ दुर्बल ( मरने के समान ) होजाय तो प्रातःकाल का होम उसी समय हो जाय यदि फिर भी वह प्रातःकाल तक जीवित बना रहे तो फिर भी प्रातःकाल हो वा न बचे तो न हो ॥ २॥ दुर्बल ( मरने के समीप जो हो ) को स्नान कराकर शुद्ध वस्त्र पहनावे और दक्षिण दिशा की तरफ शिर करके कुश बिछायी पृथ्वी में लिटा देवे ॥ ३ ॥ मरजाने पर सब शरीर में घी लगा के सवस्त्र स्नान करावे फिर सव्य जनेऊ पहना के सब अङ्गों पर चन्दन छिड़के और पुष्पों से शोभित करे ॥ ४ ॥
५६ कात्यायनस्मृतिः ॥
हिरण्यशकलान्यस्य क्षिप्त्वाछिद्रेषुसप्तसु । मुखेष्वथापिधायैनं निर्हरेयुःसुतादयः ॥ ५ ॥ आमपात्रेऽन्नमादाय प्रेतमग्निपुरःसरम् । एकोऽनुगच्छेत्तस्यार्द्धमर्द्धम्पथ्युत्सृजेद्भुवि ॥ ६ ॥ अर्धमादहनंप्राप आसीनोदक्षिणामुखः । सव्यंजान्वाच्यशनकैः सतिलंपिण्डदानवत् ॥ ७ ॥ अथपुत्रादिराप्लुत्य कुर्य्याद्दारुचयंमहत् । भूप्रदेशेशुचौदेशे पञ्चाग्नित्यादिलक्षणे ॥ ८ ॥ तत्रोत्तानंनिपात्यैनं दक्षिणाशिरसंमुखे । आज्यपूर्णांस्रुचंदद्याद्दक्षिणाग्रांनसिस्स्रुवम् ॥ ९ ॥ पादयोरधरांप्राचीमरणीमुरसीतराम् । पार्श्वयोःशूर्पचमसे सव्यदक्षिणयोःक्रमात् ॥ १० ॥ मुसलेनसहन्युब्जमन्तरूर्वोरुलूखलम् ।
और सुवर्ण के टुकड़े सातो छिद्रों ( मुख आदि ) में गेरै और मुर्द्दे के मुख को ढांक कर पुत्र आदि श्मशान में ले जायं ॥ ५ ॥ कच्चे मट्टी के पात्र में अन्न लेकर एक मनुष्य मृत के पीछे २ चले और अग्निहोत्र के अग्नि को कोई आगे २ ले चले प्रेत को पीछे ले चले और उस अन्न में से आधे अन्न को घर और श्मशान के बीच मार्ग में पृथ्वी पर पुत्र छोड़ देवै ॥ ६ ॥ और जब श्मशान भूमि में मुर्दा पहुंचजाय तब दक्षिण को मुख करके बैठा हुआ बायां घोंटू पृथिवी में टेक कर धीरे २ तिल सहित उस अन्न को पिण्डदान की विधि से पृथिवी पर छोड़ देवै ॥ ७ ॥ इस के पश्चात् जो चिता के योग्य हो ऐसे भूमि के शुद्ध स्थल में जो स्थान ग्राम से पश्चिम वा दक्षिण दिशा में हो वहां पुत्र आदि स्नान करके चिता बना के उस पर बहुत लकड़ी चिने ॥ ८ ॥ तिस चिता पर दक्षिण की ओर जिस का शिर हो ऐसे इस अग्निहोत्री को ऊपर को मुख करके लिटावे और दक्षिण को अग्र भाग करके घी से भरी जुहू सुच् को मुख पर और घी से भरे स्रुव को नाक पर रख देवे ॥ ९ ॥ अधरारणी को पगों पर पूर्वाग्र धरे और उत्तरारणी को छाती पर पूर्वाग्र धरे और बांई पशुलियों पर सूपको तथा दहिनी पर चमस को क्रम से रख देवे ॥ १० ॥ मुशल,
भाषार्थसंहिता ॥ ५१
चात्रौवीलीकमत्रैवमनश्रुनयनोविभीः ॥ ११ ॥
अपसव्येनकृत्वैतद्द्वाग्यतःपितृदिङ्मुखः ।
अथाग्निंसव्यजान्वक्तो दद्याद्दक्षिणतःशनैः ॥ १२ ॥
अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतांपुनः ।
असौस्वर्गायलोकाय स्वाहेतियजुरीरयन् ॥ १३ ॥
एवंगृहपतिर्दग्धः सर्वंतरतिदुष्कृतम् ।
यश्चैनंदाहयेत्सोपि प्रजांप्राप्नोत्यनिन्दिताम् ॥ १४ ॥
यथास्वायुधधृक्पान्थोह्यरण्यान्यपिनिर्भयः ।
अतिक्रम्यात्मनोभीष्टं स्थानमिष्टंचविन्दति ॥ १५ ॥
एवमेषोऽग्निमान्यज्ञपात्रायुधविभूषितः ।
लोकानन्यानातिक्रम्य परंब्रह्मैवविन्दति ॥ १६ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकविंशतितमःखण्डः ॥ २१ ॥
औंधी ओखली, चात्र तथा ओदिली को जंघाओं के बीच में भय रहित और न रोता हुआ पुत्र रखदेवे ॥ ११ ॥ दक्षिण की ओर मुख कर मौन हुआ अप सव्य होके पूर्वोक्त पात्रचयन कर्म करके बांये घोंटू को भूमि में लगा के चिता में दक्षिण दिशा की ओर धीरे से अग्नि जलावै ॥ १२ ॥ और उस समय इस यजुर्वेद के मन्त्र को पढ़े कि (अस्मात्त्वमधि०) हे जीव ! और हे देह तू इस अग्नि से पैदा हुआ था । और हे अग्नि ! तेरे से यह देह आदि फिर पैदा हो इस से प्रज्वलित अग्नि में इस प्राणी को स्वर्ग लोक की प्राप्ति के निमित्त यह स्वाहा है ॥ १३ ॥ इस उक्त प्रकार जिस का दाहकर्म कियाजाय वह गृहस्थ सब पापों से छूट जाता है और जो दाह करता है वह भी उत्तम संतानों को प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ जैसे अपने उत्तम शस्त्रों को ले कर पथिक पुरुष निर्भय होकर बनों को भी लांघ कर अपने वांछित स्थान को पहुंचता है और अपने मनोरथ को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ इसी प्रकार अपने यज्ञ पात्ररूप शस्त्रों से शोभित यह अग्निहोत्री भी स्वर्ग आदि लोकों को लांघ कर परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
यह २१ इक्कीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
५८ कात्यायनस्मृतिः ॥
अथानवेक्षमेत्यापः सर्वएवशवस्पृशः । स्नात्वासचैलमाचम्य दद्युरस्योदकंस्थले ॥ १ ॥ गोत्रनामानुवादान्ते तर्पयामीत्यनन्तरम् । दक्षिणाग्रान्कुशान्कृत्वा सतिलन्तुपृथक्पृथक् ॥ २ ॥ एवंकृतोदकान्सम्यक् सर्वान्शाद्वलसंस्थितान् । आप्लुत्यपुनराचान्तान् वदेयुस्तेऽनुयायिनः ॥ ३ ॥ माशोकंकुरुतानित्ये सर्वस्मिन्प्राणधर्मणि । धर्म्मंकुरुतयत्नेन योवःसहगमिष्यति ॥ ४ ॥ मानुष्येकदलीस्तंभे निःसारेसारमार्गणम् । यःकरोतिससंमूढो जलबुद्बुदसन्निभे ॥ ५ ॥ गन्त्रीवसुमतीनाशमुदधिर्देवतानिच । फेनप्रख्यःकथन्नाशं मर्त्यलोकोनयास्यति ॥ ६ ॥
इस के अनन्तर चिता की ओर न देखते हुए मुर्दे को स्पर्श करने वाले सब लोग सचैल स्नान और आचमन करके इस प्रेत को स्थल (जहां जल न हो ऐसी भूमि) पर जल देवें ॥ १ ॥ गोत्र और प्रेत के नाम के अन्त में “तर्पयामि” कहैं जैसे (वसिष्ठगोत्रं चैत्रशर्म्माणं तर्पयामि) और दक्षिण को अग्रभाग जिन का हो ऐसे कुशों को करके उन कुशों और तिल सहित जल पृथक् २ सब लोग देवें यही तिलाञ्जलि कहाती है ॥ २ ॥ उत्तम प्रकार से शास्त्र रीत्यनुसार दिया है जल जिन्होंने और जो हरी घास पर बैठे हों तिलाञ्जलि देने पश्चात् फिर स्नान कर के किया है आचमन जिन्होंने ऐसे प्रेत के सब कुटुम्बियों को उन के संग श्मशान में कोई विद्वान् वा संसार गति के जानने वाले विचार शील गये हों वे निम्न प्रकार उपदेश करें कि ॥ ३ ॥ सब प्राणी अनित्य हैं इस से शोक मत करो किन्तु बड़े यत्न और सावधानी से धर्म करो जो धर्म तुम्हारे संग चलेगा ॥ ४ ॥ जैसे केला के खम्भा में छिलके उतारते जावें तो भीतर कुछ सार नहीं निकलता वैसे ही संसारी विषयों में विचार पूर्वक सच्चे सुख का खोज करें तो कहीं लेशमात्र भी नहीं दीखता। इसलिये जल के बुल बुलों को पकड़ने के समान जगत् में सुख खोजने वाला महा मूर्ख है ॥ ५ ॥ जब कि पृथ्वी, समुद्र, देवता; ये भी नष्ट होने वाले हैं तब जल में उठे फेन के तुल्य लीन होने वाले मनुष्य लोगों का नाश किस प्रकार न होगा ? अर्थात् अवश्य नाश होगा ॥ ६ ॥
भाषार्थसंहिता ॥ ५८
पञ्चधासम्भृतःकायो यदिपञ्चत्वमागतः ।
कर्मभिःस्वशरोरोत्थैस्तत्रकापरिदेवना ॥ ७ ॥
सर्वेक्षयान्तानिचयाः पतनान्ताःसमुच्छ्रयाः ।
संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्तंहिजीवितम् ॥ ८ ॥
श्लेष्माश्रुबान्धवैर्मुक्तं प्रेतोभुङ्क्तेयतोऽवशः ।
अतोनरोदितव्यंहि क्रियाःकार्याःप्रयत्नतः ॥ ९ ॥
एवमुक्त्वाव्रजेयुस्ते गृहाँल्लघुपुरःसराः ।
स्नानाग्निस्पर्शनाज्याशैः शुध्येयुरितरेकृतैः ॥ १० ॥
इति कात्यायनस्मृतौ द्वाविंशतितमः खण्डः ॥ २२ ॥
एवमेवाहिताग्नेस्तु पात्रन्यासादिकम्भवेत् ।
कृष्णाजिनादिकश्चात्र विशेषःसूत्रचोदितः ॥ १ ॥
यदि पांच भूतों से बना देह अपने देह से किये कर्मों के कारण मृत्यु (मरण) को प्राप्त होगया तो इस में शोक वा आश्चर्य ही क्या है ? ॥ ७ ॥ संसार में संचय वा वृद्धि का अन्तपरिणाम नाश है । ऊपर को चढ़ने वालों का अन्तपरिणाम नीचे गिरना है । तथा सब मेल वा संयोगों का अन्त वियोग और जीवन का अन्त परिणाम मरण है ॥ ८ ॥ जिन आंसुओं को भाई बन्धु छोड़ते हैं उन्हें वेवश हुआ प्रेत खाता है इस से रोना उचित नहीं किन्तु यत्न से और्ध्वदेहिक कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥ मुर्दा को लेजाते समय सब से बड़ी आयु वाला सब से आगे चले उस से कम २ आयु वाले क्रम से पीछे २ चलें सब से छोटा सब से पीछे चले । बराबर कोई न चले । और उक्त प्रकार श्मशान के समीप उपदेश कर लौटते समय सब से छोटा सब से आगे चले और सब से अधिक बूढ़ा सब से पीछे २ आवे । और जो कुटुम्बियों से भिन्न मनुष्य मरघट में गये हों उनकी शुद्धि स्नान अग्निस्पर्श और घी खाने से होती है ॥१०॥
यह २२ वाईशवां खण्ड पूरा हुआ ॥
इसी प्रकार आहिताग्नि (अग्निहोत्री) का पात्रचयनादि अन्त्येष्टि कर्म किया जाय । और जिन कृष्णाजिन आदि यज्ञ सम्बन्धी पदार्थों के लिये यहां कुछ नहीं कहा उन का कृत्य कल्प सूत्रों में कहे अनुसार जानो ॥ १ ॥
६० कात्यायनस्मृतिः ॥
विदेशमरणेस्थीनि ह्याहत्याभ्यज्यसर्पिषा । दाहयेदूर्णायाच्छाद्य पात्रन्यासादिपूर्ववत् ॥ २ ॥ अस्थनामलाभेपर्णानि सकलान्युक्तयावृता । भर्जयेदस्थिसंख्यानि ततःप्रभृतिसूतकम् ॥ ३ ॥ महापातकसंयुक्तो दैवात्स्यादग्निमान्यदि । पुत्रादिःपालयेदग्नीन्युक्तआदोषसंक्षयात् ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्तंनकुर्याद्यः कुर्वन्वाम्रियतेयदि । गृह्यं निर्वापयेच्छ्रौतमप्स्रवस्येत्सपरिच्छदम् ॥ ५ ॥ सादयेदुभयंवाप्सु ह्यद्भ्योऽग्निरभवद्यतः । पात्राणिदद्याद्विप्राय दहेदप्स्वेववाक्षिपेत् ॥ ६ ॥ अनयैवावृतानारी दग्धव्यायाव्यवस्थिता । अग्निप्रदानमन्त्रोस्या नप्रयोज्यइतिस्थितिः ॥ ७ ॥
यदि कोई विदेश में मरजाय तो वहां से उस की हड्डी लेकर उन में घी लगा के और ऊन के वस्त्र से ढांक कर दाह करे और यज्ञ पात्रों का रखना पूर्व के समान यहां भी जानो ॥२॥ यदि विदेश में मरे की हड्डी भी न मिलें तो शरीर में जितनी हड्डियां होती हैं उतने पत्ते किसी यज्ञार्ह ढांक आदि वृक्षके लेकर उन्हें भूंज कर मुर्दे की तरह श्मशान में लेजाकर पूर्वोक्त प्रकार पात्रचयनादि दाह पर्यन्त कर्म करे और तभी से सूतक माने ॥३॥ यदि अग्निहोत्री को दैवयोग से ब्रह्महत्यादि महापातक लग जाय तो प्रायश्चित्त द्वारा दोष की निवृत्ति होने तक पुत्रादि सावधान होकर अग्नि की रक्षा तथा विधिके साथ नित्य होमादिकृत्य करे ॥४॥ यदि महापातकी प्रायश्चित्त न करे या प्रायश्चित्त करता २ ही मरजाय तो गृह्य नाम आवसथ्याग्नि को बुता देवे और यज्ञपात्रों सहित श्रौत अग्नियों को किसी उत्तम जलाशय में छोड़ देवे ॥ ५ ॥ अथवा श्रौतस्मार्त दोनों अग्नियों जल में छोड़ देवे क्योंकि जिस कारण जल से ही अग्नि उत्पन्न हुआ है। अथवा पात्र ब्राह्मण को देदेवे वा जलादे अथवा जल में ही गेर देवे ॥ ६ ॥ इसी शास्त्रोक्त रीति से जो अग्निहोत्री की स्त्री अपने धर्म पर स्थित रहती हुई मरे तो उसका भी दाह कर्म करे परन्तु अग्नि देने का मन्त्र न पढ़े यह शास्त्र की मर्यादा है ॥ ७ ॥ यदि स्त्री किसी कारण पति से पृथक् स्वतन्त्र होगई हो
भाषाथंसहिता ॥ ६१
अग्निनैवदहेद्भार्यां स्वतन्त्रापतितानचेत् । तदुत्तरेणपात्राणि दाहयेत्पृथगन्तिके ॥ ८ ॥ अपरेद्युस्तृतीयेवा अस्थ्नांसञ्चयनंभवेत् । यस्तत्रविधिरादिष्ट ऋषिभिः सोधुनोच्यते ॥ ९ ॥ स्नानान्तंपूर्ववत्कृत्वा गव्येनपयसाततः । सिञ्चेदस्थीनिसर्वाणि प्राचीनावीत्यभाषणन् ॥ १० ॥ शमीपलाशशाखाभ्यामुद्धृत्योद्धृत्यभस्मनः । आज्येनाभ्यज्यगव्येन सेचयेद्गन्धवारिणा ॥ ११ ॥ मृत्पात्रसंपुटंकृत्वा सूत्रेणपरिवेष्टयच । श्वभ्रंखात्वाशुचौभूमौ निखनेद्दक्षिणामुखः ॥ १२ ॥ पूरयित्वावटंपङ्कपिण्डशैवालसंयुतम् । दत्त्वोपरिसमंशेषं कुर्यात्पूर्वाह्नकर्मणा ॥ १३ ॥ एवमेवागृहीताग्नेः प्रेतस्याविधिरीष्यते ।
पर व्याभचारादि द्वारा पतित न हुई हो तो उस का भी अग्निहोत्र के अग्नि से ही दाह कर्म करे परन्तु यज्ञ के पात्र स्त्री से उत्तर दिशा में समीप पृथक् जला देवे किन्तु उक्त प्रकार चयन न करे ॥ ८ ॥ दूसरे वा तीसरे दिन अस्थि संचयन कर्म करे उस का जो विधान ऋषियों ने कहा है उसे हम कहते हैं ॥ ९ ॥ पूर्ववत् स्नान पर्यन्त कर्म करके तदनन्तर गौके दूध से सब हड्डियों को छिड़के अपसव्य रहे, मौन भी धारण करे ॥ १० ॥ शमी (छ्योंकर) और ढांक की शाखा से भस्म में से हड्डियों को निकास २ कर गौ का घी उन में लगा २ के सुगन्ध जल से छिड़के ॥ ११ ॥ घट को संपुट (सीधा) करे और उस में हड्डियों को भरकर रंगे सूत से लपेट के शुद्ध भूमि स्थल में गढ़ा खोद कर उस में घड़े को धरके दक्षिण को मुख कर गाड़ देवे ॥ १२ ॥ और उस गढ़े में जितना खाली हो उसे गीली मट्टी और नदी की घास सिवार नामक से भर कर उस के ऊपर कुछ रखकर सम (एकसा) करदे और यह सब काम पूर्वाह्न में करे ॥ १३ ॥ इसी प्रकार जो अग्निहोत्री नही उसका भी दाह विधि करना शास्त्रानुकूल इष्ट है । परन्तु स्त्री के तुल्य मन्त्र पढ़े बिना ही उस अनाहिता-
६२ | कात्यायनस्मृतिः ॥
स्त्रीणामिवाग्निदानं स्यादाथातोऽनुक्तमुच्यते ॥ १४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ त्रयोविंशतितमः खण्डः ॥ २३ ॥
सूतके कर्मणां त्यागः सन्ध्यादीनां विधीयते ।
होमः श्रौते तु कर्तव्यः शुष्कान्नेनापि वा फलैः ॥ १ ॥
अकृतं हावयेत्स्मार्त्तं तदभावे कृताकृतम् ।
कृतं वा हावयेदन्नमन्वारम्भविधानतः ॥ २ ॥
कृतमोदनसक्त्वादि तण्डुलादिकृताकृतम् ।
व्रीह्यादि चाकृतं प्रोक्तमिति हव्यं त्रिधा बुधैः ॥ ३ ॥
सूतके च प्रवासेषु चाशक्तौ श्राद्धभोजने ।
एवमादिनिमित्तेषु हावयेदिति योजयेत् ॥ ४ ॥
न त्यजेत्सूतके कर्म ब्रह्मचारी स्वकं क्वचित् ।
न दीक्षण्यात्परं यज्ञे न कृच्छ्रादितपञ्चरन् ॥ ५ ॥
पितर्य्यपि मृते नैषां दोषो भवति कर्हिचित् ।
अग्नि को भस्म करे। अब जो पूर्व नहीं कहा सो अनाहिताग्नि के लिये विशेष कहते हैं ॥ १४ ॥
यह २३ तेईसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
सूतक में संध्या आदि कर्मों का त्याग कहा है परन्तु सूखे अन्न वा फलों से गार्हपत्यादि श्रौत अग्नियों में सूतक के दिनों में भी होम करना चाहिये ॥ १ ॥
आवसथ्य नामक स्मार्त्त अग्नि में अकृत की वा अकृत न मिले तो कृताकृतकी अथवा कृत अन्न की आहुति ब्रह्मा के अन्वारम्भ करनेपर दिया करे ॥ २ ॥
ओदन (भात) और सत्तू आदि पीसा पकाया अन्न कृत, कच्चे चावलादि कृताकृत और बिनकुटे धान आदि अकृत कहाते हैं यह तीन प्रकार का हविष्यान्न विद्वानों ने कहा है ॥ ३ ॥ सूतक में, परदेश में, रोगादि से असमर्थ होने पर, श्राद्ध भोजन करने पर इत्यादि निमित्तों में स्वयं होम न करे किन्तु अन्य किसी द्वारा होम करावे ॥ ४ ॥ सूतक में ब्रह्मचारी अपने कर्म को कभी न छोड़े और दीक्षणीया इष्टि से आगे यज्ञ में और दो आदि दिन में होने वाले कृच्छ्र सान्तपन आदि तप करता हुआ भी सूतक में न छोड़े ॥ ५ ॥
पिता के भी मरजाने पर इन ब्रह्मचारी आदि को दोष नहीं लगता अथवा
द्वादशप्रतिमास्यानि आद्यं षाण्मासिकेतथा ।
भाषार्थसहिता ॥ ६३
आशौचं कर्मणोऽन्तेस्यात् त्र्यहंवाऽब्रह्मचारिणः ॥ ६ ॥
श्राद्धमग्निमतःकार्यं दाहादेकादशेऽहनि ।
प्रत्याब्दिकंतु कुर्वीत प्रमीताहनिसर्व्वदा ॥ ७ ॥
द्वादशप्रतिमास्यानि आद्यं षाण्मासिकेतथा ।
सपिण्डीकरणञ्चैव एतदूंश्राद्धषोडशम् ॥ ८ ॥
एकाहेनतुषण्मासा यदास्युरपिवात्रिभिः ।
न्यूनाःसंवत्सरश्चैव स्यातांपाण्मासिकेतदा ॥ ९ ॥
यानिपञ्चदशाद्यानि अपुत्रस्येतराणितु ।
एकस्मिन्नह्निदेयानि सपुत्रस्यैवसर्व्वदा ॥ १० ॥
नयोषायाःपतिर्दद्यादपुत्रायाअपिक्कचित् ।
नपुत्रस्यापितादद्यान्नानुजस्यतथाग्रजः ॥ ११ ॥
एकादशेऽह्नि निर्वर्त्य अवाग्दर्शाद्यथाविधि ।
प्रकुर्वीताग्निमान्पुत्रो मातापित्रोःसपिण्डताम् ॥ १२ ॥
ब्रह्मचारी को प्रारम्भ किये कर्म के समाप्त हो जाने पर तीन दिन सूतक मानना चाहिये ॥ ६ ॥ अग्निहोत्री का श्राद्ध दाह के दिन से ग्यारहवें दिन करे और प्रति वर्ष में भी मरने के दिन सदैव श्राद्ध करै ॥ ७ ॥ एक वर्षतक बारह मास के प्रत्येक अमावास्या के बारह श्राद्ध, ग्यारहवें दिन का १ एक पहिला श्राद्ध, छः २ महिने पूरे होने पर दो श्राद्ध और एक सपिंडीकरण श्राद्ध ये अग्निहोत्री के सोलह श्राद्ध कहाते हैं ॥ ८ ॥ ये दो छः २ मास वाले श्राद्ध तब होते हैं जब छः महीने वा १ वर्ष में एक वा तीन दिन शेष रहें तब छठे २ महीने में दो वार श्राद्ध करे ॥ ९॥ पहिले जो पन्द्रह श्राद्ध हैं वे जिसके पुत्र न हो उसके एक ही दिन में करदे और जिसके पुत्र हो उसके सर्वदा (पृथक् २) उस २ समय में करै ॥ १० ॥
जिस स्त्री के पुत्र न हो उस का पति उस को श्राद्ध में पिण्ड न देवे पुत्र को पिता पिण्ड न दे तथा छोटे भाई को बड़ा भाई पिण्ड न देवे ॥ ११ ॥ ग्यारहवें दिन मावस से पहिले कर्म को पूर्ण करके अग्निहोत्री पुत्र माता पिता की सपिण्डी विधि पूर्वक करै ॥ १२ ॥ सपिण्डी किये पीछे प्रति महीने एको-
६४ कात्यायनस्मृतिः ॥
सपिण्डीकरणादूर्ध्वं नदद्यात्प्रतिमासिकम् । एकोद्दिष्टेनविधिना दद्यादित्याहगौतमः ॥ १३ ॥ कर्पूसमन्वितमुक्त्वा तथाद्यं श्राद्धषोडशम् । प्रत्याब्दिकंचशेषेषु पिण्डाःस्युःषडितिस्थितिः ॥ १४ ॥ अर्घ्येद्वक्षय्योदकेचैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्यतुनिवृत्तिःस्यात्स्वधावाचनएवच ॥ १५ ॥ ब्रह्मदण्डादियुक्तानां येषांनास्त्यग्निसत्क्रिया । श्राद्धादिसत्क्रियाभाजो नभवन्तीहतेक्वचित् ॥ १६ ॥ इति कात्यायनस्मृतौचतुर्विंशतितमः खण्डः ॥ २४ ॥
मन्त्राम्नायेऽग्नइत्येतत् पञ्चकंलाघवार्थिभिः । पठ्यतेतत्प्रयोगेस्यान्मन्त्राणामेवविंशतिः ॥ १ ॥ अग्नेःस्थानेवायुचन्द्रसूर्यान्बह्ववद्गूह्यच । समस्यपञ्चमीसूत्रे चतुश्चतुरितिश्रुतेः ॥ २ ॥
दिष्ट श्राद्ध न करे और गौतम ऋषि यह कहते हैं कि सपिण्डी के पश्चात् भी एकोद्दिष्ट की विधि से ही प्रति महीने श्राद्ध करे ॥ १३ ॥ कर्पू ( अर्घ्य ) सहित पहिले श्राद्ध को षोडश १६ श्राद्धों को और वार्षिक (क्षयाह ) श्राद्ध को छोड़ कर शेष पार्वणादि श्राद्धों में छः २ पिण्ड देने चाहिये यह मर्यादा है ॥ १४ ॥ अर्घ्य अक्षय्योदक, पिण्डदान, अवनेजन, और स्वधावाचन इतने कामों में तन्त्र न करे । अर्थात् किसी को किसी के साथ मिला के न करे ॥ १५ ॥ ब्रह्मदण्ड (शाप) आदि से मरे जिन पुरुषों का अग्नि में दाह रूप सत्कर्म नहीं कहा वे श्राद्ध आदि सत्कर्म के भागी इस लोक में कभी नहीं होते ॥ १६ ॥
यह २४ चौबीशवां खण्ड पूरा हुआ ॥
मन्त्र संहिता में ( अग्ने० ) इत्यादि जो पांच मन्त्र लाघव चाहने वाले ऋषियों ने पढ़े हैं उन मन्त्रों के प्रयोग में बीस मन्त्र होते हैं ॥ १ ॥ क्योंकि ( अग्ने ) इस पद के स्थान में ( वायो ) ( चन्द्र ) ( सूर्य ) इन का ऊह कर लेने से एक २ के चार २ मन्त्र हो जाते हैं । फिर पांचवां मन्त्र पूरा करने के लिये अग्नि आदि चारो देवताओं का समास कर लेना चाहिये । क्योंकि चार २ देवताओं को एक २ आहुति देणे यह श्रुति में कहा है ॥ २ ॥ पहिले पञ्चक
प्रथमेपञ्चकेपापीलक्ष्मीरितिपदंभवेत् ।
भाषार्थसहिता ॥ ६५
प्रथमेपञ्चकेपापीलक्ष्मीरितिपदंभवेत् । अपिपञ्चसुमन्त्रेषु इतियज्ञविदोविदुः ॥ ३ ॥ द्वितीयेतुपतिघ्नीस्यादपुत्रेतिवृतीयके । चतुर्थेत्वपसव्येति इदमाहुतिविंशकम् ॥ ४ ॥ धृतिहोमेनप्रयुञ्ज्याद्गोनामसुतथाष्टसु । चतुर्थ्यामघ्न्यइत्येतद्गोनामसुहिहूयते ॥ ५ ॥ लताग्रपल्लवोगूढः शुङ्गेतिपरिकीर्त्यते । पतिव्रताव्रतवती ब्रह्मबन्धु स्तथाऽश्रुतः ॥ ६ ॥ शलाटुनीलमित्युक्तं ग्रन्थःस्तबकउच्यते । कपुष्णिकाभितःकेशा मूर्द्धनिपश्चात्कमुच्छलम् ॥ ७ ॥ श्वाविच्छलाकाशल्लली तथावीरतरःशरः । तिलतण्डुलसम्पक्वः कृसरःसोभिधीयते ॥ ८ ॥ नामधेयेमुनिवसुपिशाचावहुवत्सदा । यक्षाश्चपितरोदेवा यष्टव्यास्तिथिदेवताः ॥ ९ ॥ आग्नेयाद्येऽथसर्पाद्ये विशाखायोतथैवच ।
में पापी लक्ष्मा पद पांचों मन्त्रों में लगाव यह यज्ञ का तत्त्व जानने वालों ने स्थिर किया है ॥ ३ ॥ दूसरे पंचक में पतिघ्नी पद तीसरे पंचक में अपुत्रा पद और चौथे पञ्चक में अपसव्या पद लगावे ये बीश आहुति हैं ॥ ४ ॥ धृति के होम में और आठों गोनाम के होमों में प्रयोग न करे गो नामों में चौथी आहुति पर ( अघ्न्ये ) इस मन्त्र से आहुति देवे ॥५॥ लता के आगेका जो पत्ता गुप्त है उसे शुंगा कहते हैं पतिव्रता को व्रतवती और जो वेद न पढ़ा हो उस ब्राह्मण को ब्रह्मबन्धु कहते हैं ॥६॥ नील को शलाटु, स्तवक (गुच्छा) को ग्रन्थ कहते हैं । स्त्री के शिर पर दोनों तरफ के केशों को कपुष्णिका और पीछे केश के जूड़े को कपुच्छल कहते हैं ॥७॥ सेही के कांटे को शलली, बाण को वीरतर कहते और इकट्ठे पके तिल चावलों को कृसर नाम खिचड़ी कहते हैं ॥ ८ ॥ मुनि, वसु, पिशाच, यक्ष, पितर, देव और तिथियों के देवता इन सब को बहुवचनान्त नाम लेकर पूजे ( जैसे मुनिभ्योनमः इत्यादि ) ॥९॥ इतने नक्षत्र द्वन्द्व (दो २) हैं इन को सदैव बहुवचन पद से यथा ( कृत्तिकाभ्यः
६६ कात्यायनस्मृतिः ॥
आषाढाद्ये धनिष्ठाद्ये अश्विन्याद्ये तथैवच ॥१०॥ द्वन्द्वान्येतानिबहुवद् ऋक्षाणांजुहुयात्सदा। द्वन्द्वद्वयंद्दिवच्छेषमवशिष्टान्यथैकवत् ॥११॥ देवतास्वपिहूयन्ते बहुवत्सार्वपित्तयः। देवाश्चवसवश्चैव द्विपद्देवाश्विनौसदा॥१२॥ ब्रह्मचारिसमादिष्टो गुरुणाव्रतकर्मणि। वाढमोमित्यवान्ब्रूयात्तथैवानुपपालयेत् ॥१३॥ सशिखंवपनंकार्यमास्नानाद्ब्रह्मचारिणा। आशरीरविमोक्षाय ब्रह्मचर्य्यंनचेद्भवेत् ॥ १४ ॥ नगात्रोत्सादनंकुर्यादनापदिकदाचन। जलक्रीडामलंकारान्नतीद्गण्डइवाप्लवेत् ॥ १५ ॥ देवतानांविपर्यासे जुहोतिषुकथम्भवेत्। सर्वंप्रायश्चित्तंहुत्वा क्रमेणजुहुयात्पुनः ॥ १६ ॥ संस्काराअतिपत्येरन् स्वकालाच्चेतकञ्चन।
स्वाहा इत्यादि) आहुति दे और शेष दो द्वन्द्वों को द्विवचनान्त पद से और बाकी के नक्षत्रों को एक वचनान्त पद से आहुति देवे ॥११॥ देवताओं में भी सार्वपित्ति देव, वसु, द्विपद्देव, अश्विनीकुमार इन को बहुवचनान्त पद से उच्चारण करे ॥ १२ ॥ जिस व्रत के काम में ब्रह्मचारी को गुरु आज्ञा देवें उस में बाढं (सत्य है) अथवा ओं (अङ्गीकार है) ऐसे कहे और गुरु की आज्ञा को वैसी ही ज्यों की त्यों पालन करे ॥ १३ ॥
यदि जीवन भर के लिये नैष्ठिक ब्रह्मचर्य्य धारण न किया हो तो समावर्त्तन संस्कार होने पर्यन्त ब्रह्मचारी को शिखा सहित मुण्डन सदा कराना चाहिये ॥१४॥ ब्रह्मचारी आपत्ति के बिना अपने शरीर को किसी से न दबवावे। जल में क्रीड़ा, आभूषण धारण इन को भी न करे और जलाशय में डुबकी लगा के स्नान न करे किन्तु दण्ड के तुल्य जल पर तर लेवे ॥ १५ ॥ यदि कभी होम में देवताओं का विपर्यास (आगे का पीछे वा पीछे का आगे) होजाय तो प्रायश्चित्त की सब आहुति देकर फिर क्रम से होम करे ॥ १६ ॥ यदि यज्ञोपवीत से पहिले संस्कारों (जात कर्मादि) की अतिपत्ति
भाषार्थसहिता ॥ ६९
हुत्वात्तदैवकर्त्तव्या येत्चूपनयनादयः ॥ १७ ॥
अनिष्ट्रानवयज्ञेन नवान्नंयोऽत्त्यकामतः ।
वैश्वानरश्चरुस्तस्य प्रायश्चित्तंविधीयते ॥ १८ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चविंशतितमः खण्डः ॥ २५ ॥
चरुःसमशनीयोयस्तथागोयज्ञकर्मणि ।
वृषभोत्सर्जनैचैव अश्वमेधे तथैवच ॥ १ ॥
श्रावण्यांवाप्रदोषेयः कृप्यारम्भेतथैवच ।
कथमेतेपुनिर्वापाः कथञ्चैवजुहोतयः ॥ २ ॥
देवतासंख्ययाग्राह्या निर्वापास्तुपृथक्पृथक् ।
तूष्णींद्विरेवगृह्णीयाद्धोमश्चापिपृथक्पृथक् ॥ ३ ॥
यावताहोमनिर्वृत्तिर्भवेद्यायत्रकीर्तिता ।
शेषश्चैवभवेत्किञ्चित्तावन्तंनिर्वपेच्चरुम् ॥ ४ ॥
चरौसमशनीयेतु पितृयज्ञेचरौतथा ।
शास्त्रोक्त समय पर न होना ) हो जाय तो प्रायश्चित्त की सब आहुति देकर उन २ संस्कारों को समय निकल जाने पर भी करे ॥ १७ ॥ जो पुरुष अज्ञान से नवान्नेष्टि किये विना नवीन अन्न को खा लेवे उस का प्रायश्चित्त वैश्वानर ( अग्नि का ) चरु है अर्थात् वैश्वानर देवता के नाम से चरु बना कर होम करे ॥ १८ ॥
यह २५ पच्चीशवां खण्ड पूरा हुआ ॥
जो समशनीय ( खाने योग्य ) चरु है वह और गोयज्ञ कर्म में वृषोत्सर्ग में, अश्वमेध में ॥१॥ श्रावणी में, प्रदोष में, कृषि ( खेती ) के आरम्भ में इतनी जगहों में निर्वाप और आहुति कैसे होनी चाहिये सो कहते हैं ॥२॥ जितने देवता हों उतने ही पृथक् २ निर्वाप लेने चाहिये-और प्रत्येक देवता के लिये एक २ बार मन्त्र से दो २ बार तूष्णीं हविष्यान्न का ग्रहण करे और सब देवताओं के लिये होम भी पृथक् २ करे ॥ ३ ॥ जितना होम जहां कहा हो या जितने से होम हो सके और कुछ शेष भी रह जाय उतना ही चरु बनावे ॥ ४ ॥ समशनीय चरु में पितृयज्ञ के चरु में इन में तो मेक्षण नाम
६८ कात्यायनस्मृतिः ॥
होतव्यम्मेक्षणेनान्य उपस्तीर्याभिघारितम् ॥ ५ ॥ कालःकात्यायनेनोक्तो विधिश्चैवसमासतः । वृषोत्सर्गयतोनाऽत्र गोभिलेनतुभाषितः ॥ ६ ॥ पारिभाषिकएवस्यात् कालगोवाजिमेधयोः । अन्यस्मादुपदेशाच्च स्वस्त्यारोहणकर्मच ॥ ७ ॥ अथवामार्गपाल्येऽन्हि कालगोयज्ञकर्मणः । नीराजनेऽहिवाश्वानामितितन्त्रान्तरेविधिः ॥ ८ ॥ शरद्वसन्तयोःकेचिन्न्वयज्ञंप्रचक्षते । धान्यपाकवशादन्ये श्यामाकोवनिनःस्मृतः ॥ ९ ॥ आश्वयुज्यान्तथाकृष्यां वास्तुकर्मणियाज्ञिकाः । यज्ञार्थतत्त्ववेत्तारो होममेवंप्रचक्षते ॥ १० ॥ द्वेपञ्चद्वेक्रमेणैता हविराहुतयःस्मृताः । शेषाआज्येनहोतव्या इतिकात्यायनोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥
काष्ठ के यज्ञपात्र से होम करे और अन्य चरु में घी का उपस्तरण (आहुति देने से प्रथम स्रुचादि में घी चुपड़ना) और आहुति के लिये ग्रहण किये चरु पुरोडाशादि पर ऊपर से घी डालना अभिघार कहाता है ॥ ५ ॥ काल और विधि संक्षेप से कात्यायन ने कहे हैं परन्तु वृषोत्सर्ग में गोभिल ऋषि ने काल और विधि नहीं कहे ॥ ६ ॥ गोमेध और अश्वमेध यज्ञ में समय वही है जो पारिभाषिक (परिभाषा सूत्रों में नियत किया) हो। अन्य उपदेश से स्वस्त्यारोहण गृह्यकर्म का काल भी पारिभाषिक जानो ॥ ७ ॥ अथवा मार्गपाल्य दिन में गोयज्ञ कर्म का और नीराजन (दिवाली) के दिन अश्वकर्म का काल होता है यह शास्त्रान्तरों की विधि है ॥ ८ ॥ कोई ऋषि शरद् और वसन्त में नवाग्रयणयज्ञ कहते और कोई अन्न के पकने पर कहते हैं और वानप्रस्थ को श्यामाक (समा) पकने पर वर्षा ऋतु में नवाग्रेष्टि यज्ञ कहा है ॥ ९ ॥ आश्विन की पूर्णिमा के दिन, कृषि कर्म के आरम्भ में और वास्तु प्रतिष्ठा में इन में यज्ञ का तत्त्व जानने वाले याज्ञिक लोग इस आगे कहे प्रकार से होम कहते हैं ॥ १० ॥ दो, पांच, फिर दो, इस क्रम से आहुति हविष्यान्न की और शेष आहुति घी की देनी चाहिये यह कात्यायनने कहा है ॥ ११ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ६९
पयोयदाज्यसंयुक्तं तत्पृषातकमुच्यते । दध्यैकेतदुपासाद्य कर्त्तव्यः पायसञ्चरुः ॥ १२ ॥
ब्रीहयःशालयोमुद्गा गोधूमाःसर्षपास्तिलाः । यवाश्चौषधयःसप्त विपदंघ्नन्तिधारिताः ॥ १३ ॥
संस्काराःपुरुषस्यैते स्मर्य्यन्तेगौतमादिभिः । अतोऽष्टकादयःकार्य्याः सर्व्वकालक्रमोदिताः ॥ १४ ॥
सकृदप्यष्टकादीनि कुर्यात्कर्माणि यो द्विजः । सपङ्क्तिपावनोभूत्वा लोकान्प्रीतिघृतश्च्युतः ॥ १५ ॥
एकाहमपिकर्मस्थो योऽग्निंशुश्रूषकःशुचिः । नयत्यत्रतदेवास्य शताहंदिविजायते ॥ १६ ॥
यस्त्व आधायाग्निमाशास्य देवादीन्नैभिरिष्टवान् । निराकर्त्तामरादीनां सविज्ञेयोनिराकृतिः ॥ १७ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षड्विंशतितमः खण्डः ॥ २६ ॥
घी जिस में मिला है ऐसे दूध को पृषातक कहते हैं और कोई विद्वान् यह कहते हैं कि उस दूध में दधि मिलाकर पायस चरु बनाले ॥१२॥ ब्रीहि धान शालि बासमती, मूंग, गेहूँ, सरसों, तिल, जौ,-ये सात औषधी धारण करने से विपत्ति को दूर करतीं हैं ॥ १३ ॥ गौतम आदि ऋषियों ने ये स्मार्त्तकर्म पुरुष को शुद्ध करने वाले कहे हैं इससे अष्टका आदि सब कर्म जिस समय में कहे हैं उसी समय करने चाहिये ॥ १४ ॥ जो द्विज पुरुष अष्टका श्राद्ध आदि कर्मों को एक बार भी श्रद्धा और विधि से ठीक २ करता है वह पंक्तिपावन (पांत का पवित्र करने वाला) होकर उत्तम लोकों (स्वर्गा- दि) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ जो धर्म कर्म में तत्पर शुद्धि के साथ स्थापित अग्नि का सेवक पुरुष एक दिन भी ऐसी दशा में विताता है वही दिन स्वर्ग में सौ १०० गुणा फल दायक हो जाता है ॥ १६ ॥ जो अग्नि का आधान स्था- पन करके और देवतादि को आशा देकर इन यज्ञों से देवताओं का पूजन नहीं करता इस से उन देवताओं को तिरस्कार करने वाले को निराकृति (ना- स्तिक) जानना चाहिये ॥ १७ ॥
यह २६ छब्बीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
७० कात्यायनस्मृतिः ॥
यच्छ्राद्धंकर्मणामादौ याचान्तेदक्षिणाभवेत् ।
अमावास्यांद्वितीयंयदन्वाहार्य्यंतदुच्यते ॥ १ ॥
एकसाध्येष्वबर्हिःषु नस्यात्परिसमूहनम् ।
नोदगासादनञ्चैव क्षिप्रहोमाहितेमताः ॥ २ ॥
अभावेब्रीहियवयोर्दध्नावापयसापिवा ।
तदभावेयवाग्वावा जुहुयादुदकेनवा ॥ ३ ॥
रौद्रन्तुराक्षसंपित्र्यमासुरञ्चाभिचारिकम् ।
उक्त्वामन्त्रंस्पृशेदाप आलभ्यात्मानमेवच ॥ ४ ॥
यजनीयेन्हिसोमञ्चेद्वारुण्यांदिशिदृश्यते ।
तत्रव्याहृतिभिर्हुत्वा दण्डंदद्याद्द्विजातये ॥ ५ ॥
लवणंमधुमांसंच क्षारांशोयेनहूयते ।
उपवासेनभुञ्जीत नोरुरात्रौनकिंचन ॥ ६ ॥
स्वकालेसायमात्याह अप्राप्तौहोतृहव्ययोः ।
कर्मों के आदि में जो आभ्युदयिक श्राद्ध होता है और कर्मों के अन्त में जो दक्षिणा दीजाती है और अमावस को जो दूसरा श्राद्ध होता है उसे अन्वाहार्य्य कहते हैं ॥ १ ॥
एक साथ होने वाले, जिन में बर्हिनामक कुश न लिये गये हों ऐसे होमों में परिसमूहन और उत्तर २ पात्रों का रखना नहीं होता क्योंकि वे शीघ्र होने वाले होम कहाते हैं ॥ २ ॥
ब्रीहि और जौ के अभाव में दही या दूध से और उन के भी अभाव में ढीले रांधे हुए चावलों से, यदि ये भी न मिलें तो केवल जल से होम करें ॥ ३ ॥
रुद्र, राक्षस, पितर, असुर और अभिचार नाम शत्रु वध का जिन में विशेष कर वर्णन हो ऐसे मन्त्रों का उच्चारण करके अपने हृदय का स्पर्श कर दहिने हाथ से जल स्पर्श करे ॥ ४ ॥
यदि दर्शेष्टि के दिन संध्या के समय पश्चिम दिशा में चन्द्रमा दीख पड़े तो वहां व्याहृति [ भूः आदि ] यों से होम करके किसी ब्राह्मण को एक छड़ी दान में देवे ॥ ५ ॥
लवण, सहत, मांस, और खार इन का अग्नि में जो होम करता है वह दिन में उपवास करे और रात्रि में भी मध्यम भोजन करे न बहुत कम न अधिक ॥६॥
सायंकाल की आहुति के समय पर यदि होता और हविष्यान्न न मिलें
भाषार्थसहिता ॥ ७१
प्राक्प्रातराहुतेःकालः प्रायश्चित्तेहुतेसति ॥ ७ प्राक्सायमाहुतेः प्रातर्होमकालानतिक्रमः । प्राकपौर्णमासाद्दर्शस्य प्राग्दर्शादितरस्यतु ॥ ८ ॥ वैश्वदेवेत्वतिक्रान्ते अहोरात्रमभोजनम् । प्रायश्चित्तमथोहुत्वा पुनःसन्तनुयाद्व्रतम् ॥ ६ ॥ होमद्वयात्ययेदर्शपौर्णमासात्ययेतथा । पुनरेवाग्निमादध्यादितिभार्गवशासनम् ॥ १० ॥ अनूचोमाणवोज्ञेय एणःकृष्णमृगःस्मृतः । रुरुर्गौरमृगःप्रोक्तस्तम्बलःशोणउच्यते ॥ ११ ॥ केशान्तिकोब्राह्मणस्य दण्डःकार्यःप्रमाणतः । ललाटसम्मितोराज्ञः स्यात्तु नासान्तिकोविशः ॥ १२ ॥ ऋजवस्तेतुसर्वेस्युरव्रणाःसौम्यदर्शनाः । अनुद्वेगकरानृणां सत्वचोऽनाग्निदूषिताः ॥ १३ ॥ गौर्विशिष्टतयाविप्रैर्वेदेष्वपिनिगद्यते ।
तो प्रातःकाल की आहुति देने से पहिले प्रायश्चित्त की आहुति के पीछे सायं काल का होम कर देवे और प्रातःकाल का होम छूट जाय तो सायंकाल की आहुति से पहिले प्रायश्चित्तपूर्वक उस के कर लेने का समय है। यदि कोई पौर्णमासेष्टि समय पर न हो पावे तो दर्शेटि से पहिले २ उस को प्रायश्चित्त पूर्वक कर लेवे और दर्शेष्टि छूट जावे तो अगली पौर्णमासेष्टि से पहिले उसे भी कर लेवे ॥ ८ ॥ एक दिन का वैश्वदेव छूट जाने पर एक दिन रात भोजन न करे तदनन्तर प्रायश्चित्त होम करके विस्तार के साथ नियम का पालन करे ॥९॥ यदि दो बार का होम छूट जाय वा दर्शपूर्णमास दोनों इष्टि छूट जायं तो फिर से अग्नि का आधान करे यह भार्गव का मत है ॥ १० ॥ यज्ञोपवीत न हुए बालक को अनूच कहते और काले मृग को एण और गोरे मृग को रुरु और लाल को तम्बल कहते हैं ॥ ११ ॥ केशों की ऊंचाई तक ब्राह्मण का, मस्तक तक क्षत्रिय का और नासिका तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड होना चाहिये॥१२॥ और वे दण्ड कोमल हों, घुने न हों, देखने में सुन्दर हों, मनुष्यों को डरपाने वाले न हों, वक्कल सहित हों और जले न हों ॥ १३ ॥ ब्राह्मणों ने और वेदों में
७२ | कात्यायनस्मृतिः ॥
नततोऽन्यद्वरंयस्मात्तस्माद्गौर्वरमुच्यते ॥ १४ ॥
येषांव्रतानामन्तेषु दक्षिणानाविधीयते ।
वरंतत्रभवेद्दानमपिवाच्छादयेद्गुरुम् ॥ १५ ॥
अस्थानोच्छ्वासविच्छेदघोषणाध्यापनादिकम् ।
प्रमादिकंश्रुतौयत्तत्स्यादयातयामत्वकारितत् ॥ १६ ॥
प्रत्यब्दंयदुपाकर्म सोत्सर्गंविधिवद्द्विजैः ।
क्रियतेछन्दसान्तेन पुनराप्यायनंभवेत् ॥ १७ ॥
अयातयामैश्छन्दोभिर्यत्कर्मक्रियतेद्विजैः ।
क्रीडमानैरपिसदा तत्तेषांसिद्धिकारकम् ॥ १८ ॥
गायत्रींचसगायत्रां बार्हस्पत्यमितित्रिकम् ।
शिष्येभ्योऽनूच्यविधिवदुपाकुर्य्यात्ततःश्रुतिम् ॥ १९ ॥
छन्दसामेकत्रिंशानां संहितायांयथाक्रमम् ।
तच्छन्दस्काभिरेवर्षिर्भिराद्याभिर्होमइष्यते ॥ २० ॥
भी गौ को उत्तम कहा है जिस कारण गौ से श्रेष्ठ दक्षिणा अन्य कोई नहीं है इस कारण वर शब्द से कही गोदान की दक्षिणा ही सर्वोत्तम जानो ॥ १४ ॥ जिन व्रतों के अन्त में कोई दक्षिणा नहीं कही वहां वर ( गौ ) को ही दक्षिणा देवे अथवा गुरु को वस्त्र दान देवे ॥ १५ ॥ अस्थान ( जिस स्थान से बोलना चाहिये उस से वर्णों को न बोलना ) ऊंचे श्वास से बोलना सन्धि न करके विच्छेद अवसान देकर बोलना, अति ऊंचे शब्द से बोलना, और पढ़ाने की तरह पढ़ना, यदि ऐसे दोष प्रमाद से होजांय तो वेदाध्ययनरूप धर्म यातयाम नाम सारहीन होजाता है ॥ १६ ॥ प्रतिवर्ष जो उत्सर्ग के सहित उपाकर्म श्रावण में ब्राह्मण लोग करते हैं उस से फिर वेदों की आप्यायन नाम पूर्ति हो जाती है ॥ १७ ॥ अयातयाम [ सार वाले ] वेदों द्वारा जो कर्म खेल करते हुये भी द्विज लोग करते हैं वह कर्म उन के मनोरथ की सिद्धि करने वाला होता है ॥ १८ ॥ प्रणव सहित गायत्री और बार्हस्पत्य ( बृहस्पति देवता का मन्त्र ) इन तीनों को शिष्यों को पढ़ा के तदनन्तर वेद का उपाकर्म करे ॥ १९ ॥ वेद संहिताओं में गायत्री आदि इकतीस छन्द हैं, उन छन्दों वाली सनातन ऋचाओं से होम कहा है ॥ २० ॥
भाषार्थसहिता ॥ ९३
पर्व्वभिश्चैवगानेषु ब्राह्मणेपूत्तरादिभिः ।
अङ्गेष्वर्चामन्त्रेषु इतिषष्टिर्जुहोतयः ॥२१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ सप्तविंशतितमःखण्डः ॥ २७ ॥
अक्षतास्तुयवाःप्रोक्ता भ्रष्टाधानाभवन्तिते ।
भ्रष्टास्तुव्रीहयोलाजा घटःखाण्डिकउच्यते ॥ १ ॥
नाधीयीतरहस्यानि सोत्तराणिविचक्षणः ।
नचोपनिषदश्चैव षण्मासान्दक्षिणायनान् ॥ २ ॥
उपाकृत्योदगयने ततोऽधीयीतधर्म्मवित् ।
उत्सर्गश्चैकएवैषां तैष्यांप्रोष्ठपदेऽपिवा ॥ ३ ॥
अजातव्यञ्जनालोम्नी नतयासहसंविशेत् ।
अयुग्गूःकाकवन्ध्याया जातातान्नविवाहयेत् ॥ ४ ॥
संसक्तपदविन्यासस्त्रिपदःप्रक्रमःस्मृतः ।
स्मार्त्तकर्म्मणिसर्व्वत्र श्रौतन्त्वध्वर्युणोदितः ॥ ५ ॥
गान ( सामवेद ) में पर्व्वों से और ब्राह्मण वेद में उत्तरादि से और अङ्गों में चर्चा और मन्त्रों में जो कही है वही साठ ६० आहुति हैं ॥ २१ ॥
यह सत्ताईशवां २७ खण्ड पूरा हुआ ॥
बिन कुटे जौ को अक्षत कहते हैं और वही भुंजे हुए जौ धाना कहाते हैं तथा भुंजे धानों को लाजा (खीलें) कहते हैं और घड़े को खाण्डिक कहते हैं ॥ १ ॥
दक्षिणायन के छः महीनों में विद्वान् पुरुष उत्तर भागों सहित वेद सम्बन्धी रहस्य ग्रन्थों को और उपनिषदों को न पढ़े ॥ २ ॥
उपाकर्म करके उत्तरायण में धर्म का ज्ञाता पुरुष रहस्यादि वेद भागों को पढ़े । द्विजों के लिये पौष वा भाद्रपद की पौर्णमासी पर एक ही वार उत्सर्ग कर्म कहा है ॥ ३ ॥
जिस स्त्री के शरीर पर जब तक सर्वथा ही लोम न उगे हों और जिस के वक्षस्थल में कुच प्रकट न हुए हों, उसके साथ धर्मनिष्ठ पुरुष संयोग न करे जिस के अंग उत्पत्ति से ही बिगड़े हों और जो काकबन्ध्या हो उस के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥
सर्वत्र स्मार्त्त कर्म में मिलाकर नापे तीन पग लंबा १ प्रक्रम कहाता है । और श्रौतकर्मों में यजुर्वेद के ब्राह्मणकल्प में कहा प्रक्रम का नाप जानो ॥ ५ ॥
| ७४ | कात्यायनस्मृतिः ॥ |
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यस्यांदिशिबलिंदद्यात्तामेवाभिमुखोबलिम् । श्रवणाकर्म्मणिभवेन्न्यञ्चुकर्म्मनसर्वदा ॥ ६ ॥ बलिशेषस्यहवनमग्निप्रणयनन्तथा । प्रत्यहंनभवेयातामुल्मुकन्तुभवेत्सदा ॥ ७ ॥ पृषातकप्रेषणयोर्नवस्यहविषस्तथा । शिष्टस्यप्राशनेमन्त्रस्तत्रसर्वेऽधिकारिणः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणानामसान्निध्ये स्वयमेवपृषातकम् । अवेक्षेतद्विजःशेषं नवयज्ञेऽपिभक्षयेत् ॥ ९ ॥ सफलाबदरीशाखा फलवत्यभिधीयते । घनाविसिकताःशङ्काः स्मृताजातशिलास्तुताः ॥ १० ॥ नष्टेविनष्टेमणिकः शिलानाशेतथैवच । तदेवाहृत्यसंस्कार्य्यो नापेक्षेदाग्रहायणीम् ॥ ११ ॥ श्रवणाकर्म्मलुप्तंचेत्कथंचित्सूतकादिना । आग्रहायणिकंकुर्याद्वलिवर्जमशेषतः ॥ १२ ॥
जिस दिशा में बलि देनी हो उसी दिशा के सम्मुख बैठे-और श्रावणी कर्म में नीचे को अधोमुख कर्म सदा ही न करे ॥ ६ ॥ बलि के शेष भाग का होम और अग्नि का प्रणयन-(लाना) ये प्रतिदिन होते और उल्मुक अंगार तो प्रति दिन होता ही है ॥ ७ ॥ पृषातक [मिलाये हुये दूध घी] प्रेषण नवीन हविः और हविः शेष के भोजन में जो मन्त्र है उसमें सब द्विज अधिकारी हैं ॥ ८ ॥ यदि ब्राह्मण समीप में न हों तो क्षत्रियादि पुरुष आप ही पृषातक को देखले और नवयज्ञ में भी हविः शेषः का भक्षण भी करे ॥ ९ ॥ फलों पत्तों वाली बेरिया की शाखा को फलवती कहते और सघन कंकड़ीली मट्टी जो शिला जैसी जम गई हो, जिस में बालू न हो, उसे शंका कहते हैं ॥१०॥ मणिक वा शिला नष्ट भ्रष्ट हो जावे तो उसी समय नया लाकर संस्कार करले किन्तु अगहन की पौर्णमासी की बाट न देखे ॥ ११ ॥ यदि किसी प्रकार सूतक आदि से श्रावणी का कर्म न हुआ हो तो बलि कर्म को छोड़ कर आग्रहायणी (अगहन शुदी १५) को सब कर्म करे ॥ १२ ॥