अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ कात्यायनस्मृतिः ॥
अथानवेक्षमेत्यापः सर्वएवशवस्पृशः । स्नात्वासचैलमाचम्य दद्युरस्योदकंस्थले ॥ १ ॥ गोत्रनामानुवादान्ते तर्पयामीत्यनन्तरम् । दक्षिणाग्रान्कुशान्कृत्वा सतिलन्तुपृथक्पृथक् ॥ २ ॥ एवंकृतोदकान्सम्यक् सर्वान्शाद्वलसंस्थितान् । आप्लुत्यपुनराचान्तान् वदेयुस्तेऽनुयायिनः ॥ ३ ॥ माशोकंकुरुतानित्ये सर्वस्मिन्प्राणधर्मणि । धर्म्मंकुरुतयत्नेन योवःसहगमिष्यति ॥ ४ ॥ मानुष्येकदलीस्तंभे निःसारेसारमार्गणम् । यःकरोतिससंमूढो जलबुद्बुदसन्निभे ॥ ५ ॥ गन्त्रीवसुमतीनाशमुदधिर्देवतानिच । फेनप्रख्यःकथन्नाशं मर्त्यलोकोनयास्यति ॥ ६ ॥
इस के अनन्तर चिता की ओर न देखते हुए मुर्दे को स्पर्श करने वाले सब लोग सचैल स्नान और आचमन करके इस प्रेत को स्थल (जहां जल न हो ऐसी भूमि) पर जल देवें ॥ १ ॥ गोत्र और प्रेत के नाम के अन्त में “तर्पयामि” कहैं जैसे (वसिष्ठगोत्रं चैत्रशर्म्माणं तर्पयामि) और दक्षिण को अग्रभाग जिन का हो ऐसे कुशों को करके उन कुशों और तिल सहित जल पृथक् २ सब लोग देवें यही तिलाञ्जलि कहाती है ॥ २ ॥ उत्तम प्रकार से शास्त्र रीत्यनुसार दिया है जल जिन्होंने और जो हरी घास पर बैठे हों तिलाञ्जलि देने पश्चात् फिर स्नान कर के किया है आचमन जिन्होंने ऐसे प्रेत के सब कुटुम्बियों को उन के संग श्मशान में कोई विद्वान् वा संसार गति के जानने वाले विचार शील गये हों वे निम्न प्रकार उपदेश करें कि ॥ ३ ॥ सब प्राणी अनित्य हैं इस से शोक मत करो किन्तु बड़े यत्न और सावधानी से धर्म करो जो धर्म तुम्हारे संग चलेगा ॥ ४ ॥ जैसे केला के खम्भा में छिलके उतारते जावें तो भीतर कुछ सार नहीं निकलता वैसे ही संसारी विषयों में विचार पूर्वक सच्चे सुख का खोज करें तो कहीं लेशमात्र भी नहीं दीखता। इसलिये जल के बुल बुलों को पकड़ने के समान जगत् में सुख खोजने वाला महा मूर्ख है ॥ ५ ॥ जब कि पृथ्वी, समुद्र, देवता; ये भी नष्ट होने वाले हैं तब जल में उठे फेन के तुल्य लीन होने वाले मनुष्य लोगों का नाश किस प्रकार न होगा ? अर्थात् अवश्य नाश होगा ॥ ६ ॥