भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥ ५१

चात्रौवीलीकमत्रैवमनश्रुनयनोविभीः ॥ ११ ॥
अपसव्येनकृत्वैतद्द्वाग्यतःपितृदिङ्मुखः ।
अथाग्निंसव्यजान्वक्तो दद्याद्दक्षिणतःशनैः ॥ १२ ॥
अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतांपुनः ।
असौस्वर्गायलोकाय स्वाहेतियजुरीरयन् ॥ १३ ॥
एवंगृहपतिर्दग्धः सर्वंतरतिदुष्कृतम् ।
यश्चैनंदाहयेत्सोपि प्रजांप्राप्नोत्यनिन्दिताम् ॥ १४ ॥
यथास्वायुधधृक्पान्थोह्यरण्यान्यपिनिर्भयः ।
अतिक्रम्यात्मनोभीष्टं स्थानमिष्टंचविन्दति ॥ १५ ॥
एवमेषोऽग्निमान्यज्ञपात्रायुधविभूषितः ।
लोकानन्यानातिक्रम्य परंब्रह्मैवविन्दति ॥ १६ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकविंशतितमःखण्डः ॥ २१ ॥


औंधी ओखली, चात्र तथा ओदिली को जंघाओं के बीच में भय रहित और न रोता हुआ पुत्र रखदेवे ॥ ११ ॥ दक्षिण की ओर मुख कर मौन हुआ अप सव्य होके पूर्वोक्त पात्रचयन कर्म करके बांये घोंटू को भूमि में लगा के चिता में दक्षिण दिशा की ओर धीरे से अग्नि जलावै ॥ १२ ॥ और उस समय इस यजुर्वेद के मन्त्र को पढ़े कि (अस्मात्त्वमधि०) हे जीव ! और हे देह तू इस अग्नि से पैदा हुआ था । और हे अग्नि ! तेरे से यह देह आदि फिर पैदा हो इस से प्रज्वलित अग्नि में इस प्राणी को स्वर्ग लोक की प्राप्ति के निमित्त यह स्वाहा है ॥ १३ ॥ इस उक्त प्रकार जिस का दाहकर्म कियाजाय वह गृहस्थ सब पापों से छूट जाता है और जो दाह करता है वह भी उत्तम संतानों को प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ जैसे अपने उत्तम शस्त्रों को ले कर पथिक पुरुष निर्भय होकर बनों को भी लांघ कर अपने वांछित स्थान को पहुंचता है और अपने मनोरथ को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ इसी प्रकार अपने यज्ञ पात्ररूप शस्त्रों से शोभित यह अग्निहोत्री भी स्वर्ग आदि लोकों को लांघ कर परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

यह २१ इक्कीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥