भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 805 में से

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५६ कात्यायनस्मृतिः ॥

हिरण्यशकलान्यस्य क्षिप्त्वाछिद्रेषुसप्तसु । मुखेष्वथापिधायैनं निर्हरेयुःसुतादयः ॥ ५ ॥ आमपात्रेऽन्नमादाय प्रेतमग्निपुरःसरम् । एकोऽनुगच्छेत्तस्यार्द्धमर्द्धम्पथ्युत्सृजेद्भुवि ॥ ६ ॥ अर्धमादहनंप्राप आसीनोदक्षिणामुखः । सव्यंजान्वाच्यशनकैः सतिलंपिण्डदानवत् ॥ ७ ॥ अथपुत्रादिराप्लुत्य कुर्य्याद्दारुचयंमहत् । भूप्रदेशेशुचौदेशे पञ्चाग्नित्यादिलक्षणे ॥ ८ ॥ तत्रोत्तानंनिपात्यैनं दक्षिणाशिरसंमुखे । आज्यपूर्णांस्रुचंदद्याद्दक्षिणाग्रांनसिस्स्रुवम् ॥ ९ ॥ पादयोरधरांप्राचीमरणीमुरसीतराम् । पार्श्वयोःशूर्पचमसे सव्यदक्षिणयोःक्रमात् ॥ १० ॥ मुसलेनसहन्युब्जमन्तरूर्वोरुलूखलम् ।


और सुवर्ण के टुकड़े सातो छिद्रों ( मुख आदि ) में गेरै और मुर्द्दे के मुख को ढांक कर पुत्र आदि श्मशान में ले जायं ॥ ५ ॥ कच्चे मट्टी के पात्र में अन्न लेकर एक मनुष्य मृत के पीछे २ चले और अग्निहोत्र के अग्नि को कोई आगे २ ले चले प्रेत को पीछे ले चले और उस अन्न में से आधे अन्न को घर और श्मशान के बीच मार्ग में पृथ्वी पर पुत्र छोड़ देवै ॥ ६ ॥ और जब श्मशान भूमि में मुर्दा पहुंचजाय तब दक्षिण को मुख करके बैठा हुआ बायां घोंटू पृथिवी में टेक कर धीरे २ तिल सहित उस अन्न को पिण्डदान की विधि से पृथिवी पर छोड़ देवै ॥ ७ ॥ इस के पश्चात् जो चिता के योग्य हो ऐसे भूमि के शुद्ध स्थल में जो स्थान ग्राम से पश्चिम वा दक्षिण दिशा में हो वहां पुत्र आदि स्नान करके चिता बना के उस पर बहुत लकड़ी चिने ॥ ८ ॥ तिस चिता पर दक्षिण की ओर जिस का शिर हो ऐसे इस अग्निहोत्री को ऊपर को मुख करके लिटावे और दक्षिण को अग्र भाग करके घी से भरी जुहू सुच् को मुख पर और घी से भरे स्रुव को नाक पर रख देवे ॥ ९ ॥ अधरारणी को पगों पर पूर्वाग्र धरे और उत्तरारणी को छाती पर पूर्वाग्र धरे और बांई पशुलियों पर सूपको तथा दहिनी पर चमस को क्रम से रख देवे ॥ १० ॥ मुशल,

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