अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ ५८
पञ्चधासम्भृतःकायो यदिपञ्चत्वमागतः ।
कर्मभिःस्वशरोरोत्थैस्तत्रकापरिदेवना ॥ ७ ॥
सर्वेक्षयान्तानिचयाः पतनान्ताःसमुच्छ्रयाः ।
संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्तंहिजीवितम् ॥ ८ ॥
श्लेष्माश्रुबान्धवैर्मुक्तं प्रेतोभुङ्क्तेयतोऽवशः ।
अतोनरोदितव्यंहि क्रियाःकार्याःप्रयत्नतः ॥ ९ ॥
एवमुक्त्वाव्रजेयुस्ते गृहाँल्लघुपुरःसराः ।
स्नानाग्निस्पर्शनाज्याशैः शुध्येयुरितरेकृतैः ॥ १० ॥
इति कात्यायनस्मृतौ द्वाविंशतितमः खण्डः ॥ २२ ॥
एवमेवाहिताग्नेस्तु पात्रन्यासादिकम्भवेत् ।
कृष्णाजिनादिकश्चात्र विशेषःसूत्रचोदितः ॥ १ ॥
यदि पांच भूतों से बना देह अपने देह से किये कर्मों के कारण मृत्यु (मरण) को प्राप्त होगया तो इस में शोक वा आश्चर्य ही क्या है ? ॥ ७ ॥ संसार में संचय वा वृद्धि का अन्तपरिणाम नाश है । ऊपर को चढ़ने वालों का अन्तपरिणाम नीचे गिरना है । तथा सब मेल वा संयोगों का अन्त वियोग और जीवन का अन्त परिणाम मरण है ॥ ८ ॥ जिन आंसुओं को भाई बन्धु छोड़ते हैं उन्हें वेवश हुआ प्रेत खाता है इस से रोना उचित नहीं किन्तु यत्न से और्ध्वदेहिक कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥ मुर्दा को लेजाते समय सब से बड़ी आयु वाला सब से आगे चले उस से कम २ आयु वाले क्रम से पीछे २ चलें सब से छोटा सब से पीछे चले । बराबर कोई न चले । और उक्त प्रकार श्मशान के समीप उपदेश कर लौटते समय सब से छोटा सब से आगे चले और सब से अधिक बूढ़ा सब से पीछे २ आवे । और जो कुटुम्बियों से भिन्न मनुष्य मरघट में गये हों उनकी शुद्धि स्नान अग्निस्पर्श और घी खाने से होती है ॥१०॥
यह २२ वाईशवां खण्ड पूरा हुआ ॥
इसी प्रकार आहिताग्नि (अग्निहोत्री) का पात्रचयनादि अन्त्येष्टि कर्म किया जाय । और जिन कृष्णाजिन आदि यज्ञ सम्बन्धी पदार्थों के लिये यहां कुछ नहीं कहा उन का कृत्य कल्प सूत्रों में कहे अनुसार जानो ॥ १ ॥