अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० कात्यायनस्मृतिः ॥
विदेशमरणेस्थीनि ह्याहत्याभ्यज्यसर्पिषा । दाहयेदूर्णायाच्छाद्य पात्रन्यासादिपूर्ववत् ॥ २ ॥ अस्थनामलाभेपर्णानि सकलान्युक्तयावृता । भर्जयेदस्थिसंख्यानि ततःप्रभृतिसूतकम् ॥ ३ ॥ महापातकसंयुक्तो दैवात्स्यादग्निमान्यदि । पुत्रादिःपालयेदग्नीन्युक्तआदोषसंक्षयात् ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्तंनकुर्याद्यः कुर्वन्वाम्रियतेयदि । गृह्यं निर्वापयेच्छ्रौतमप्स्रवस्येत्सपरिच्छदम् ॥ ५ ॥ सादयेदुभयंवाप्सु ह्यद्भ्योऽग्निरभवद्यतः । पात्राणिदद्याद्विप्राय दहेदप्स्वेववाक्षिपेत् ॥ ६ ॥ अनयैवावृतानारी दग्धव्यायाव्यवस्थिता । अग्निप्रदानमन्त्रोस्या नप्रयोज्यइतिस्थितिः ॥ ७ ॥
यदि कोई विदेश में मरजाय तो वहां से उस की हड्डी लेकर उन में घी लगा के और ऊन के वस्त्र से ढांक कर दाह करे और यज्ञ पात्रों का रखना पूर्व के समान यहां भी जानो ॥२॥ यदि विदेश में मरे की हड्डी भी न मिलें तो शरीर में जितनी हड्डियां होती हैं उतने पत्ते किसी यज्ञार्ह ढांक आदि वृक्षके लेकर उन्हें भूंज कर मुर्दे की तरह श्मशान में लेजाकर पूर्वोक्त प्रकार पात्रचयनादि दाह पर्यन्त कर्म करे और तभी से सूतक माने ॥३॥ यदि अग्निहोत्री को दैवयोग से ब्रह्महत्यादि महापातक लग जाय तो प्रायश्चित्त द्वारा दोष की निवृत्ति होने तक पुत्रादि सावधान होकर अग्नि की रक्षा तथा विधिके साथ नित्य होमादिकृत्य करे ॥४॥ यदि महापातकी प्रायश्चित्त न करे या प्रायश्चित्त करता २ ही मरजाय तो गृह्य नाम आवसथ्याग्नि को बुता देवे और यज्ञपात्रों सहित श्रौत अग्नियों को किसी उत्तम जलाशय में छोड़ देवे ॥ ५ ॥ अथवा श्रौतस्मार्त दोनों अग्नियों जल में छोड़ देवे क्योंकि जिस कारण जल से ही अग्नि उत्पन्न हुआ है। अथवा पात्र ब्राह्मण को देदेवे वा जलादे अथवा जल में ही गेर देवे ॥ ६ ॥ इसी शास्त्रोक्त रीति से जो अग्निहोत्री की स्त्री अपने धर्म पर स्थित रहती हुई मरे तो उसका भी दाह कर्म करे परन्तु अग्नि देने का मन्त्र न पढ़े यह शास्त्र की मर्यादा है ॥ ७ ॥ यदि स्त्री किसी कारण पति से पृथक् स्वतन्त्र होगई हो