भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाथंसहिता ॥ ६१

अग्निनैवदहेद्भार्यां स्वतन्त्रापतितानचेत् । तदुत्तरेणपात्राणि दाहयेत्पृथगन्तिके ॥ ८ ॥ अपरेद्युस्तृतीयेवा अस्थ्नांसञ्चयनंभवेत् । यस्तत्रविधिरादिष्ट ऋषिभिः सोधुनोच्यते ॥ ९ ॥ स्नानान्तंपूर्ववत्कृत्वा गव्येनपयसाततः । सिञ्चेदस्थीनिसर्वाणि प्राचीनावीत्यभाषणन् ॥ १० ॥ शमीपलाशशाखाभ्यामुद्धृत्योद्धृत्यभस्मनः । आज्येनाभ्यज्यगव्येन सेचयेद्गन्धवारिणा ॥ ११ ॥ मृत्पात्रसंपुटंकृत्वा सूत्रेणपरिवेष्टयच । श्वभ्रंखात्वाशुचौभूमौ निखनेद्दक्षिणामुखः ॥ १२ ॥ पूरयित्वावटंपङ्कपिण्डशैवालसंयुतम् । दत्त्वोपरिसमंशेषं कुर्यात्पूर्वाह्नकर्मणा ॥ १३ ॥ एवमेवागृहीताग्नेः प्रेतस्याविधिरीष्यते ।

पर व्याभचारादि द्वारा पतित न हुई हो तो उस का भी अग्निहोत्र के अग्नि से ही दाह कर्म करे परन्तु यज्ञ के पात्र स्त्री से उत्तर दिशा में समीप पृथक् जला देवे किन्तु उक्त प्रकार चयन न करे ॥ ८ ॥ दूसरे वा तीसरे दिन अस्थि संचयन कर्म करे उस का जो विधान ऋषियों ने कहा है उसे हम कहते हैं ॥ ९ ॥ पूर्ववत् स्नान पर्यन्त कर्म करके तदनन्तर गौके दूध से सब हड्डियों को छिड़के अपसव्य रहे, मौन भी धारण करे ॥ १० ॥ शमी (छ्योंकर) और ढांक की शाखा से भस्म में से हड्डियों को निकास २ कर गौ का घी उन में लगा २ के सुगन्ध जल से छिड़के ॥ ११ ॥ घट को संपुट (सीधा) करे और उस में हड्डियों को भरकर रंगे सूत से लपेट के शुद्ध भूमि स्थल में गढ़ा खोद कर उस में घड़े को धरके दक्षिण को मुख कर गाड़ देवे ॥ १२ ॥ और उस गढ़े में जितना खाली हो उसे गीली मट्टी और नदी की घास सिवार नामक से भर कर उस के ऊपर कुछ रखकर सम (एकसा) करदे और यह सब काम पूर्वाह्न में करे ॥ १३ ॥ इसी प्रकार जो अग्निहोत्री नही उसका भी दाह विधि करना शास्त्रानुकूल इष्ट है । परन्तु स्त्री के तुल्य मन्त्र पढ़े बिना ही उस अनाहिता-