अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ | कात्यायनस्मृतिः ॥
स्त्रीणामिवाग्निदानं स्यादाथातोऽनुक्तमुच्यते ॥ १४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ त्रयोविंशतितमः खण्डः ॥ २३ ॥
सूतके कर्मणां त्यागः सन्ध्यादीनां विधीयते ।
होमः श्रौते तु कर्तव्यः शुष्कान्नेनापि वा फलैः ॥ १ ॥
अकृतं हावयेत्स्मार्त्तं तदभावे कृताकृतम् ।
कृतं वा हावयेदन्नमन्वारम्भविधानतः ॥ २ ॥
कृतमोदनसक्त्वादि तण्डुलादिकृताकृतम् ।
व्रीह्यादि चाकृतं प्रोक्तमिति हव्यं त्रिधा बुधैः ॥ ३ ॥
सूतके च प्रवासेषु चाशक्तौ श्राद्धभोजने ।
एवमादिनिमित्तेषु हावयेदिति योजयेत् ॥ ४ ॥
न त्यजेत्सूतके कर्म ब्रह्मचारी स्वकं क्वचित् ।
न दीक्षण्यात्परं यज्ञे न कृच्छ्रादितपञ्चरन् ॥ ५ ॥
पितर्य्यपि मृते नैषां दोषो भवति कर्हिचित् ।
अग्नि को भस्म करे। अब जो पूर्व नहीं कहा सो अनाहिताग्नि के लिये विशेष कहते हैं ॥ १४ ॥
यह २३ तेईसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
सूतक में संध्या आदि कर्मों का त्याग कहा है परन्तु सूखे अन्न वा फलों से गार्हपत्यादि श्रौत अग्नियों में सूतक के दिनों में भी होम करना चाहिये ॥ १ ॥
आवसथ्य नामक स्मार्त्त अग्नि में अकृत की वा अकृत न मिले तो कृताकृतकी अथवा कृत अन्न की आहुति ब्रह्मा के अन्वारम्भ करनेपर दिया करे ॥ २ ॥
ओदन (भात) और सत्तू आदि पीसा पकाया अन्न कृत, कच्चे चावलादि कृताकृत और बिनकुटे धान आदि अकृत कहाते हैं यह तीन प्रकार का हविष्यान्न विद्वानों ने कहा है ॥ ३ ॥ सूतक में, परदेश में, रोगादि से असमर्थ होने पर, श्राद्ध भोजन करने पर इत्यादि निमित्तों में स्वयं होम न करे किन्तु अन्य किसी द्वारा होम करावे ॥ ४ ॥ सूतक में ब्रह्मचारी अपने कर्म को कभी न छोड़े और दीक्षणीया इष्टि से आगे यज्ञ में और दो आदि दिन में होने वाले कृच्छ्र सान्तपन आदि तप करता हुआ भी सूतक में न छोड़े ॥ ५ ॥
पिता के भी मरजाने पर इन ब्रह्मचारी आदि को दोष नहीं लगता अथवा