अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 313, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ | कात्यायनस्मृतिः ॥
नततोऽन्यद्वरंयस्मात्तस्माद्गौर्वरमुच्यते ॥ १४ ॥
येषांव्रतानामन्तेषु दक्षिणानाविधीयते ।
वरंतत्रभवेद्दानमपिवाच्छादयेद्गुरुम् ॥ १५ ॥
अस्थानोच्छ्वासविच्छेदघोषणाध्यापनादिकम् ।
प्रमादिकंश्रुतौयत्तत्स्यादयातयामत्वकारितत् ॥ १६ ॥
प्रत्यब्दंयदुपाकर्म सोत्सर्गंविधिवद्द्विजैः ।
क्रियतेछन्दसान्तेन पुनराप्यायनंभवेत् ॥ १७ ॥
अयातयामैश्छन्दोभिर्यत्कर्मक्रियतेद्विजैः ।
क्रीडमानैरपिसदा तत्तेषांसिद्धिकारकम् ॥ १८ ॥
गायत्रींचसगायत्रां बार्हस्पत्यमितित्रिकम् ।
शिष्येभ्योऽनूच्यविधिवदुपाकुर्य्यात्ततःश्रुतिम् ॥ १९ ॥
छन्दसामेकत्रिंशानां संहितायांयथाक्रमम् ।
तच्छन्दस्काभिरेवर्षिर्भिराद्याभिर्होमइष्यते ॥ २० ॥
भी गौ को उत्तम कहा है जिस कारण गौ से श्रेष्ठ दक्षिणा अन्य कोई नहीं है इस कारण वर शब्द से कही गोदान की दक्षिणा ही सर्वोत्तम जानो ॥ १४ ॥ जिन व्रतों के अन्त में कोई दक्षिणा नहीं कही वहां वर ( गौ ) को ही दक्षिणा देवे अथवा गुरु को वस्त्र दान देवे ॥ १५ ॥ अस्थान ( जिस स्थान से बोलना चाहिये उस से वर्णों को न बोलना ) ऊंचे श्वास से बोलना सन्धि न करके विच्छेद अवसान देकर बोलना, अति ऊंचे शब्द से बोलना, और पढ़ाने की तरह पढ़ना, यदि ऐसे दोष प्रमाद से होजांय तो वेदाध्ययनरूप धर्म यातयाम नाम सारहीन होजाता है ॥ १६ ॥ प्रतिवर्ष जो उत्सर्ग के सहित उपाकर्म श्रावण में ब्राह्मण लोग करते हैं उस से फिर वेदों की आप्यायन नाम पूर्ति हो जाती है ॥ १७ ॥ अयातयाम [ सार वाले ] वेदों द्वारा जो कर्म खेल करते हुये भी द्विज लोग करते हैं वह कर्म उन के मनोरथ की सिद्धि करने वाला होता है ॥ १८ ॥ प्रणव सहित गायत्री और बार्हस्पत्य ( बृहस्पति देवता का मन्त्र ) इन तीनों को शिष्यों को पढ़ा के तदनन्तर वेद का उपाकर्म करे ॥ १९ ॥ वेद संहिताओं में गायत्री आदि इकतीस छन्द हैं, उन छन्दों वाली सनातन ऋचाओं से होम कहा है ॥ २० ॥