अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९३
पर्व्वभिश्चैवगानेषु ब्राह्मणेपूत्तरादिभिः ।
अङ्गेष्वर्चामन्त्रेषु इतिषष्टिर्जुहोतयः ॥२१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ सप्तविंशतितमःखण्डः ॥ २७ ॥
अक्षतास्तुयवाःप्रोक्ता भ्रष्टाधानाभवन्तिते ।
भ्रष्टास्तुव्रीहयोलाजा घटःखाण्डिकउच्यते ॥ १ ॥
नाधीयीतरहस्यानि सोत्तराणिविचक्षणः ।
नचोपनिषदश्चैव षण्मासान्दक्षिणायनान् ॥ २ ॥
उपाकृत्योदगयने ततोऽधीयीतधर्म्मवित् ।
उत्सर्गश्चैकएवैषां तैष्यांप्रोष्ठपदेऽपिवा ॥ ३ ॥
अजातव्यञ्जनालोम्नी नतयासहसंविशेत् ।
अयुग्गूःकाकवन्ध्याया जातातान्नविवाहयेत् ॥ ४ ॥
संसक्तपदविन्यासस्त्रिपदःप्रक्रमःस्मृतः ।
स्मार्त्तकर्म्मणिसर्व्वत्र श्रौतन्त्वध्वर्युणोदितः ॥ ५ ॥
गान ( सामवेद ) में पर्व्वों से और ब्राह्मण वेद में उत्तरादि से और अङ्गों में चर्चा और मन्त्रों में जो कही है वही साठ ६० आहुति हैं ॥ २१ ॥
यह सत्ताईशवां २७ खण्ड पूरा हुआ ॥
बिन कुटे जौ को अक्षत कहते हैं और वही भुंजे हुए जौ धाना कहाते हैं तथा भुंजे धानों को लाजा (खीलें) कहते हैं और घड़े को खाण्डिक कहते हैं ॥ १ ॥
दक्षिणायन के छः महीनों में विद्वान् पुरुष उत्तर भागों सहित वेद सम्बन्धी रहस्य ग्रन्थों को और उपनिषदों को न पढ़े ॥ २ ॥
उपाकर्म करके उत्तरायण में धर्म का ज्ञाता पुरुष रहस्यादि वेद भागों को पढ़े । द्विजों के लिये पौष वा भाद्रपद की पौर्णमासी पर एक ही वार उत्सर्ग कर्म कहा है ॥ ३ ॥
जिस स्त्री के शरीर पर जब तक सर्वथा ही लोम न उगे हों और जिस के वक्षस्थल में कुच प्रकट न हुए हों, उसके साथ धर्मनिष्ठ पुरुष संयोग न करे जिस के अंग उत्पत्ति से ही बिगड़े हों और जो काकबन्ध्या हो उस के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥
सर्वत्र स्मार्त्त कर्म में मिलाकर नापे तीन पग लंबा १ प्रक्रम कहाता है । और श्रौतकर्मों में यजुर्वेद के ब्राह्मणकल्प में कहा प्रक्रम का नाप जानो ॥ ५ ॥