भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 315
७४कात्यायनस्मृतिः ॥

यस्यांदिशिबलिंदद्यात्तामेवाभिमुखोबलिम् । श्रवणाकर्म्मणिभवेन्न्यञ्चुकर्म्मनसर्वदा ॥ ६ ॥ बलिशेषस्यहवनमग्निप्रणयनन्तथा । प्रत्यहंनभवेयातामुल्मुकन्तुभवेत्सदा ॥ ७ ॥ पृषातकप्रेषणयोर्नवस्यहविषस्तथा । शिष्टस्यप्राशनेमन्त्रस्तत्रसर्वेऽधिकारिणः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणानामसान्निध्ये स्वयमेवपृषातकम् । अवेक्षेतद्विजःशेषं नवयज्ञेऽपिभक्षयेत् ॥ ९ ॥ सफलाबदरीशाखा फलवत्यभिधीयते । घनाविसिकताःशङ्काः स्मृताजातशिलास्तुताः ॥ १० ॥ नष्टेविनष्टेमणिकः शिलानाशेतथैवच । तदेवाहृत्यसंस्कार्य्यो नापेक्षेदाग्रहायणीम् ॥ ११ ॥ श्रवणाकर्म्मलुप्तंचेत्कथंचित्सूतकादिना । आग्रहायणिकंकुर्याद्वलिवर्जमशेषतः ॥ १२ ॥


जिस दिशा में बलि देनी हो उसी दिशा के सम्मुख बैठे-और श्रावणी कर्म में नीचे को अधोमुख कर्म सदा ही न करे ॥ ६ ॥ बलि के शेष भाग का होम और अग्नि का प्रणयन-(लाना) ये प्रतिदिन होते और उल्मुक अंगार तो प्रति दिन होता ही है ॥ ७ ॥ पृषातक [मिलाये हुये दूध घी] प्रेषण नवीन हविः और हविः शेष के भोजन में जो मन्त्र है उसमें सब द्विज अधिकारी हैं ॥ ८ ॥ यदि ब्राह्मण समीप में न हों तो क्षत्रियादि पुरुष आप ही पृषातक को देखले और नवयज्ञ में भी हविः शेषः का भक्षण भी करे ॥ ९ ॥ फलों पत्तों वाली बेरिया की शाखा को फलवती कहते और सघन कंकड़ीली मट्टी जो शिला जैसी जम गई हो, जिस में बालू न हो, उसे शंका कहते हैं ॥१०॥ मणिक वा शिला नष्ट भ्रष्ट हो जावे तो उसी समय नया लाकर संस्कार करले किन्तु अगहन की पौर्णमासी की बाट न देखे ॥ ११ ॥ यदि किसी प्रकार सूतक आदि से श्रावणी का कर्म न हुआ हो तो बलि कर्म को छोड़ कर आग्रहायणी (अगहन शुदी १५) को सब कर्म करे ॥ १२ ॥