अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ कात्यायनस्मृतिः ॥
सपिण्डीकरणादूर्ध्वं नदद्यात्प्रतिमासिकम् । एकोद्दिष्टेनविधिना दद्यादित्याहगौतमः ॥ १३ ॥ कर्पूसमन्वितमुक्त्वा तथाद्यं श्राद्धषोडशम् । प्रत्याब्दिकंचशेषेषु पिण्डाःस्युःषडितिस्थितिः ॥ १४ ॥ अर्घ्येद्वक्षय्योदकेचैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्यतुनिवृत्तिःस्यात्स्वधावाचनएवच ॥ १५ ॥ ब्रह्मदण्डादियुक्तानां येषांनास्त्यग्निसत्क्रिया । श्राद्धादिसत्क्रियाभाजो नभवन्तीहतेक्वचित् ॥ १६ ॥ इति कात्यायनस्मृतौचतुर्विंशतितमः खण्डः ॥ २४ ॥
मन्त्राम्नायेऽग्नइत्येतत् पञ्चकंलाघवार्थिभिः । पठ्यतेतत्प्रयोगेस्यान्मन्त्राणामेवविंशतिः ॥ १ ॥ अग्नेःस्थानेवायुचन्द्रसूर्यान्बह्ववद्गूह्यच । समस्यपञ्चमीसूत्रे चतुश्चतुरितिश्रुतेः ॥ २ ॥
दिष्ट श्राद्ध न करे और गौतम ऋषि यह कहते हैं कि सपिण्डी के पश्चात् भी एकोद्दिष्ट की विधि से ही प्रति महीने श्राद्ध करे ॥ १३ ॥ कर्पू ( अर्घ्य ) सहित पहिले श्राद्ध को षोडश १६ श्राद्धों को और वार्षिक (क्षयाह ) श्राद्ध को छोड़ कर शेष पार्वणादि श्राद्धों में छः २ पिण्ड देने चाहिये यह मर्यादा है ॥ १४ ॥ अर्घ्य अक्षय्योदक, पिण्डदान, अवनेजन, और स्वधावाचन इतने कामों में तन्त्र न करे । अर्थात् किसी को किसी के साथ मिला के न करे ॥ १५ ॥ ब्रह्मदण्ड (शाप) आदि से मरे जिन पुरुषों का अग्नि में दाह रूप सत्कर्म नहीं कहा वे श्राद्ध आदि सत्कर्म के भागी इस लोक में कभी नहीं होते ॥ १६ ॥
यह २४ चौबीशवां खण्ड पूरा हुआ ॥
मन्त्र संहिता में ( अग्ने० ) इत्यादि जो पांच मन्त्र लाघव चाहने वाले ऋषियों ने पढ़े हैं उन मन्त्रों के प्रयोग में बीस मन्त्र होते हैं ॥ १ ॥ क्योंकि ( अग्ने ) इस पद के स्थान में ( वायो ) ( चन्द्र ) ( सूर्य ) इन का ऊह कर लेने से एक २ के चार २ मन्त्र हो जाते हैं । फिर पांचवां मन्त्र पूरा करने के लिये अग्नि आदि चारो देवताओं का समास कर लेना चाहिये । क्योंकि चार २ देवताओं को एक २ आहुति देणे यह श्रुति में कहा है ॥ २ ॥ पहिले पञ्चक