भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ६५

प्रथमेपञ्चकेपापीलक्ष्मीरितिपदंभवेत् । अपिपञ्चसुमन्त्रेषु इतियज्ञविदोविदुः ॥ ३ ॥ द्वितीयेतुपतिघ्नीस्यादपुत्रेतिवृतीयके । चतुर्थेत्वपसव्येति इदमाहुतिविंशकम् ॥ ४ ॥ धृतिहोमेनप्रयुञ्ज्याद्गोनामसुतथाष्टसु । चतुर्थ्यामघ्न्यइत्येतद्गोनामसुहिहूयते ॥ ५ ॥ लताग्रपल्लवोगूढः शुङ्गेतिपरिकीर्त्यते । पतिव्रताव्रतवती ब्रह्मबन्धु स्तथाऽश्रुतः ॥ ६ ॥ शलाटुनीलमित्युक्तं ग्रन्थःस्तबकउच्यते । कपुष्णिकाभितःकेशा मूर्द्धनिपश्चात्कमुच्छलम् ॥ ७ ॥ श्वाविच्छलाकाशल्लली तथावीरतरःशरः । तिलतण्डुलसम्पक्वः कृसरःसोभिधीयते ॥ ८ ॥ नामधेयेमुनिवसुपिशाचावहुवत्सदा । यक्षाश्चपितरोदेवा यष्टव्यास्तिथिदेवताः ॥ ९ ॥ आग्नेयाद्येऽथसर्पाद्ये विशाखायोतथैवच ।


में पापी लक्ष्मा पद पांचों मन्त्रों में लगाव यह यज्ञ का तत्त्व जानने वालों ने स्थिर किया है ॥ ३ ॥ दूसरे पंचक में पतिघ्नी पद तीसरे पंचक में अपुत्रा पद और चौथे पञ्चक में अपसव्या पद लगावे ये बीश आहुति हैं ॥ ४ ॥ धृति के होम में और आठों गोनाम के होमों में प्रयोग न करे गो नामों में चौथी आहुति पर ( अघ्न्ये ) इस मन्त्र से आहुति देवे ॥५॥ लता के आगेका जो पत्ता गुप्त है उसे शुंगा कहते हैं पतिव्रता को व्रतवती और जो वेद न पढ़ा हो उस ब्राह्मण को ब्रह्मबन्धु कहते हैं ॥६॥ नील को शलाटु, स्तवक (गुच्छा) को ग्रन्थ कहते हैं । स्त्री के शिर पर दोनों तरफ के केशों को कपुष्णिका और पीछे केश के जूड़े को कपुच्छल कहते हैं ॥७॥ सेही के कांटे को शलली, बाण को वीरतर कहते और इकट्ठे पके तिल चावलों को कृसर नाम खिचड़ी कहते हैं ॥ ८ ॥ मुनि, वसु, पिशाच, यक्ष, पितर, देव और तिथियों के देवता इन सब को बहुवचनान्त नाम लेकर पूजे ( जैसे मुनिभ्योनमः इत्यादि ) ॥९॥ इतने नक्षत्र द्वन्द्व (दो २) हैं इन को सदैव बहुवचन पद से यथा ( कृत्तिकाभ्यः