अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ६९
पयोयदाज्यसंयुक्तं तत्पृषातकमुच्यते । दध्यैकेतदुपासाद्य कर्त्तव्यः पायसञ्चरुः ॥ १२ ॥
ब्रीहयःशालयोमुद्गा गोधूमाःसर्षपास्तिलाः । यवाश्चौषधयःसप्त विपदंघ्नन्तिधारिताः ॥ १३ ॥
संस्काराःपुरुषस्यैते स्मर्य्यन्तेगौतमादिभिः । अतोऽष्टकादयःकार्य्याः सर्व्वकालक्रमोदिताः ॥ १४ ॥
सकृदप्यष्टकादीनि कुर्यात्कर्माणि यो द्विजः । सपङ्क्तिपावनोभूत्वा लोकान्प्रीतिघृतश्च्युतः ॥ १५ ॥
एकाहमपिकर्मस्थो योऽग्निंशुश्रूषकःशुचिः । नयत्यत्रतदेवास्य शताहंदिविजायते ॥ १६ ॥
यस्त्व आधायाग्निमाशास्य देवादीन्नैभिरिष्टवान् । निराकर्त्तामरादीनां सविज्ञेयोनिराकृतिः ॥ १७ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षड्विंशतितमः खण्डः ॥ २६ ॥
घी जिस में मिला है ऐसे दूध को पृषातक कहते हैं और कोई विद्वान् यह कहते हैं कि उस दूध में दधि मिलाकर पायस चरु बनाले ॥१२॥ ब्रीहि धान शालि बासमती, मूंग, गेहूँ, सरसों, तिल, जौ,-ये सात औषधी धारण करने से विपत्ति को दूर करतीं हैं ॥ १३ ॥ गौतम आदि ऋषियों ने ये स्मार्त्तकर्म पुरुष को शुद्ध करने वाले कहे हैं इससे अष्टका आदि सब कर्म जिस समय में कहे हैं उसी समय करने चाहिये ॥ १४ ॥ जो द्विज पुरुष अष्टका श्राद्ध आदि कर्मों को एक बार भी श्रद्धा और विधि से ठीक २ करता है वह पंक्तिपावन (पांत का पवित्र करने वाला) होकर उत्तम लोकों (स्वर्गा- दि) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ जो धर्म कर्म में तत्पर शुद्धि के साथ स्थापित अग्नि का सेवक पुरुष एक दिन भी ऐसी दशा में विताता है वही दिन स्वर्ग में सौ १०० गुणा फल दायक हो जाता है ॥ १६ ॥ जो अग्नि का आधान स्था- पन करके और देवतादि को आशा देकर इन यज्ञों से देवताओं का पूजन नहीं करता इस से उन देवताओं को तिरस्कार करने वाले को निराकृति (ना- स्तिक) जानना चाहिये ॥ १७ ॥
यह २६ छब्बीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥