अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ ६९
पयोयदाज्यसंयुक्तं तत्पृषातकमुच्यते । दध्यैकेतदुपासाद्य कर्त्तव्यः पायसञ्चरुः ॥ १२ ॥
ब्रीहयःशालयोमुद्गा गोधूमाःसर्षपास्तिलाः । यवाश्चौषधयःसप्त विपदंघ्नन्तिधारिताः ॥ १३ ॥
संस्काराःपुरुषस्यैते स्मर्य्यन्तेगौतमादिभिः । अतोऽष्टकादयःकार्य्याः सर्व्वकालक्रमोदिताः ॥ १४ ॥
सकृदप्यष्टकादीनि कुर्यात्कर्माणि यो द्विजः । सपङ्क्तिपावनोभूत्वा लोकान्प्रीतिघृतश्च्युतः ॥ १५ ॥
एकाहमपिकर्मस्थो योऽग्निंशुश्रूषकःशुचिः । नयत्यत्रतदेवास्य शताहंदिविजायते ॥ १६ ॥
यस्त्व आधायाग्निमाशास्य देवादीन्नैभिरिष्टवान् । निराकर्त्तामरादीनां सविज्ञेयोनिराकृतिः ॥ १७ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षड्विंशतितमः खण्डः ॥ २६ ॥
घी जिस में मिला है ऐसे दूध को पृषातक कहते हैं और कोई विद्वान् यह कहते हैं कि उस दूध में दधि मिलाकर पायस चरु बनाले ॥१२॥ ब्रीहि धान शालि बासमती, मूंग, गेहूँ, सरसों, तिल, जौ,-ये सात औषधी धारण करने से विपत्ति को दूर करतीं हैं ॥ १३ ॥ गौतम आदि ऋषियों ने ये स्मार्त्तकर्म पुरुष को शुद्ध करने वाले कहे हैं इससे अष्टका आदि सब कर्म जिस समय में कहे हैं उसी समय करने चाहिये ॥ १४ ॥ जो द्विज पुरुष अष्टका श्राद्ध आदि कर्मों को एक बार भी श्रद्धा और विधि से ठीक २ करता है वह पंक्तिपावन (पांत का पवित्र करने वाला) होकर उत्तम लोकों (स्वर्गा- दि) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ जो धर्म कर्म में तत्पर शुद्धि के साथ स्थापित अग्नि का सेवक पुरुष एक दिन भी ऐसी दशा में विताता है वही दिन स्वर्ग में सौ १०० गुणा फल दायक हो जाता है ॥ १६ ॥ जो अग्नि का आधान स्था- पन करके और देवतादि को आशा देकर इन यज्ञों से देवताओं का पूजन नहीं करता इस से उन देवताओं को तिरस्कार करने वाले को निराकृति (ना- स्तिक) जानना चाहिये ॥ १७ ॥
यह २६ छब्बीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
७० कात्यायनस्मृतिः ॥
यच्छ्राद्धंकर्मणामादौ याचान्तेदक्षिणाभवेत् ।
अमावास्यांद्वितीयंयदन्वाहार्य्यंतदुच्यते ॥ १ ॥
एकसाध्येष्वबर्हिःषु नस्यात्परिसमूहनम् ।
नोदगासादनञ्चैव क्षिप्रहोमाहितेमताः ॥ २ ॥
अभावेब्रीहियवयोर्दध्नावापयसापिवा ।
तदभावेयवाग्वावा जुहुयादुदकेनवा ॥ ३ ॥
रौद्रन्तुराक्षसंपित्र्यमासुरञ्चाभिचारिकम् ।
उक्त्वामन्त्रंस्पृशेदाप आलभ्यात्मानमेवच ॥ ४ ॥
यजनीयेन्हिसोमञ्चेद्वारुण्यांदिशिदृश्यते ।
तत्रव्याहृतिभिर्हुत्वा दण्डंदद्याद्द्विजातये ॥ ५ ॥
लवणंमधुमांसंच क्षारांशोयेनहूयते ।
उपवासेनभुञ्जीत नोरुरात्रौनकिंचन ॥ ६ ॥
स्वकालेसायमात्याह अप्राप्तौहोतृहव्ययोः ।
कर्मों के आदि में जो आभ्युदयिक श्राद्ध होता है और कर्मों के अन्त में जो दक्षिणा दीजाती है और अमावस को जो दूसरा श्राद्ध होता है उसे अन्वाहार्य्य कहते हैं ॥ १ ॥
एक साथ होने वाले, जिन में बर्हिनामक कुश न लिये गये हों ऐसे होमों में परिसमूहन और उत्तर २ पात्रों का रखना नहीं होता क्योंकि वे शीघ्र होने वाले होम कहाते हैं ॥ २ ॥
ब्रीहि और जौ के अभाव में दही या दूध से और उन के भी अभाव में ढीले रांधे हुए चावलों से, यदि ये भी न मिलें तो केवल जल से होम करें ॥ ३ ॥
रुद्र, राक्षस, पितर, असुर और अभिचार नाम शत्रु वध का जिन में विशेष कर वर्णन हो ऐसे मन्त्रों का उच्चारण करके अपने हृदय का स्पर्श कर दहिने हाथ से जल स्पर्श करे ॥ ४ ॥
यदि दर्शेष्टि के दिन संध्या के समय पश्चिम दिशा में चन्द्रमा दीख पड़े तो वहां व्याहृति [ भूः आदि ] यों से होम करके किसी ब्राह्मण को एक छड़ी दान में देवे ॥ ५ ॥
लवण, सहत, मांस, और खार इन का अग्नि में जो होम करता है वह दिन में उपवास करे और रात्रि में भी मध्यम भोजन करे न बहुत कम न अधिक ॥६॥
सायंकाल की आहुति के समय पर यदि होता और हविष्यान्न न मिलें
भाषार्थसहिता ॥ ७१
प्राक्प्रातराहुतेःकालः प्रायश्चित्तेहुतेसति ॥ ७ प्राक्सायमाहुतेः प्रातर्होमकालानतिक्रमः । प्राकपौर्णमासाद्दर्शस्य प्राग्दर्शादितरस्यतु ॥ ८ ॥ वैश्वदेवेत्वतिक्रान्ते अहोरात्रमभोजनम् । प्रायश्चित्तमथोहुत्वा पुनःसन्तनुयाद्व्रतम् ॥ ६ ॥ होमद्वयात्ययेदर्शपौर्णमासात्ययेतथा । पुनरेवाग्निमादध्यादितिभार्गवशासनम् ॥ १० ॥ अनूचोमाणवोज्ञेय एणःकृष्णमृगःस्मृतः । रुरुर्गौरमृगःप्रोक्तस्तम्बलःशोणउच्यते ॥ ११ ॥ केशान्तिकोब्राह्मणस्य दण्डःकार्यःप्रमाणतः । ललाटसम्मितोराज्ञः स्यात्तु नासान्तिकोविशः ॥ १२ ॥ ऋजवस्तेतुसर्वेस्युरव्रणाःसौम्यदर्शनाः । अनुद्वेगकरानृणां सत्वचोऽनाग्निदूषिताः ॥ १३ ॥ गौर्विशिष्टतयाविप्रैर्वेदेष्वपिनिगद्यते ।
तो प्रातःकाल की आहुति देने से पहिले प्रायश्चित्त की आहुति के पीछे सायं काल का होम कर देवे और प्रातःकाल का होम छूट जाय तो सायंकाल की आहुति से पहिले प्रायश्चित्तपूर्वक उस के कर लेने का समय है। यदि कोई पौर्णमासेष्टि समय पर न हो पावे तो दर्शेटि से पहिले २ उस को प्रायश्चित्त पूर्वक कर लेवे और दर्शेष्टि छूट जावे तो अगली पौर्णमासेष्टि से पहिले उसे भी कर लेवे ॥ ८ ॥ एक दिन का वैश्वदेव छूट जाने पर एक दिन रात भोजन न करे तदनन्तर प्रायश्चित्त होम करके विस्तार के साथ नियम का पालन करे ॥९॥ यदि दो बार का होम छूट जाय वा दर्शपूर्णमास दोनों इष्टि छूट जायं तो फिर से अग्नि का आधान करे यह भार्गव का मत है ॥ १० ॥ यज्ञोपवीत न हुए बालक को अनूच कहते और काले मृग को एण और गोरे मृग को रुरु और लाल को तम्बल कहते हैं ॥ ११ ॥ केशों की ऊंचाई तक ब्राह्मण का, मस्तक तक क्षत्रिय का और नासिका तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड होना चाहिये॥१२॥ और वे दण्ड कोमल हों, घुने न हों, देखने में सुन्दर हों, मनुष्यों को डरपाने वाले न हों, वक्कल सहित हों और जले न हों ॥ १३ ॥ ब्राह्मणों ने और वेदों में
७२ | कात्यायनस्मृतिः ॥
नततोऽन्यद्वरंयस्मात्तस्माद्गौर्वरमुच्यते ॥ १४ ॥
येषांव्रतानामन्तेषु दक्षिणानाविधीयते ।
वरंतत्रभवेद्दानमपिवाच्छादयेद्गुरुम् ॥ १५ ॥
अस्थानोच्छ्वासविच्छेदघोषणाध्यापनादिकम् ।
प्रमादिकंश्रुतौयत्तत्स्यादयातयामत्वकारितत् ॥ १६ ॥
प्रत्यब्दंयदुपाकर्म सोत्सर्गंविधिवद्द्विजैः ।
क्रियतेछन्दसान्तेन पुनराप्यायनंभवेत् ॥ १७ ॥
अयातयामैश्छन्दोभिर्यत्कर्मक्रियतेद्विजैः ।
क्रीडमानैरपिसदा तत्तेषांसिद्धिकारकम् ॥ १८ ॥
गायत्रींचसगायत्रां बार्हस्पत्यमितित्रिकम् ।
शिष्येभ्योऽनूच्यविधिवदुपाकुर्य्यात्ततःश्रुतिम् ॥ १९ ॥
छन्दसामेकत्रिंशानां संहितायांयथाक्रमम् ।
तच्छन्दस्काभिरेवर्षिर्भिराद्याभिर्होमइष्यते ॥ २० ॥
भी गौ को उत्तम कहा है जिस कारण गौ से श्रेष्ठ दक्षिणा अन्य कोई नहीं है इस कारण वर शब्द से कही गोदान की दक्षिणा ही सर्वोत्तम जानो ॥ १४ ॥ जिन व्रतों के अन्त में कोई दक्षिणा नहीं कही वहां वर ( गौ ) को ही दक्षिणा देवे अथवा गुरु को वस्त्र दान देवे ॥ १५ ॥ अस्थान ( जिस स्थान से बोलना चाहिये उस से वर्णों को न बोलना ) ऊंचे श्वास से बोलना सन्धि न करके विच्छेद अवसान देकर बोलना, अति ऊंचे शब्द से बोलना, और पढ़ाने की तरह पढ़ना, यदि ऐसे दोष प्रमाद से होजांय तो वेदाध्ययनरूप धर्म यातयाम नाम सारहीन होजाता है ॥ १६ ॥ प्रतिवर्ष जो उत्सर्ग के सहित उपाकर्म श्रावण में ब्राह्मण लोग करते हैं उस से फिर वेदों की आप्यायन नाम पूर्ति हो जाती है ॥ १७ ॥ अयातयाम [ सार वाले ] वेदों द्वारा जो कर्म खेल करते हुये भी द्विज लोग करते हैं वह कर्म उन के मनोरथ की सिद्धि करने वाला होता है ॥ १८ ॥ प्रणव सहित गायत्री और बार्हस्पत्य ( बृहस्पति देवता का मन्त्र ) इन तीनों को शिष्यों को पढ़ा के तदनन्तर वेद का उपाकर्म करे ॥ १९ ॥ वेद संहिताओं में गायत्री आदि इकतीस छन्द हैं, उन छन्दों वाली सनातन ऋचाओं से होम कहा है ॥ २० ॥
भाषार्थसहिता ॥ ९३
पर्व्वभिश्चैवगानेषु ब्राह्मणेपूत्तरादिभिः ।
अङ्गेष्वर्चामन्त्रेषु इतिषष्टिर्जुहोतयः ॥२१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ सप्तविंशतितमःखण्डः ॥ २७ ॥
अक्षतास्तुयवाःप्रोक्ता भ्रष्टाधानाभवन्तिते ।
भ्रष्टास्तुव्रीहयोलाजा घटःखाण्डिकउच्यते ॥ १ ॥
नाधीयीतरहस्यानि सोत्तराणिविचक्षणः ।
नचोपनिषदश्चैव षण्मासान्दक्षिणायनान् ॥ २ ॥
उपाकृत्योदगयने ततोऽधीयीतधर्म्मवित् ।
उत्सर्गश्चैकएवैषां तैष्यांप्रोष्ठपदेऽपिवा ॥ ३ ॥
अजातव्यञ्जनालोम्नी नतयासहसंविशेत् ।
अयुग्गूःकाकवन्ध्याया जातातान्नविवाहयेत् ॥ ४ ॥
संसक्तपदविन्यासस्त्रिपदःप्रक्रमःस्मृतः ।
स्मार्त्तकर्म्मणिसर्व्वत्र श्रौतन्त्वध्वर्युणोदितः ॥ ५ ॥
गान ( सामवेद ) में पर्व्वों से और ब्राह्मण वेद में उत्तरादि से और अङ्गों में चर्चा और मन्त्रों में जो कही है वही साठ ६० आहुति हैं ॥ २१ ॥
यह सत्ताईशवां २७ खण्ड पूरा हुआ ॥
बिन कुटे जौ को अक्षत कहते हैं और वही भुंजे हुए जौ धाना कहाते हैं तथा भुंजे धानों को लाजा (खीलें) कहते हैं और घड़े को खाण्डिक कहते हैं ॥ १ ॥
दक्षिणायन के छः महीनों में विद्वान् पुरुष उत्तर भागों सहित वेद सम्बन्धी रहस्य ग्रन्थों को और उपनिषदों को न पढ़े ॥ २ ॥
उपाकर्म करके उत्तरायण में धर्म का ज्ञाता पुरुष रहस्यादि वेद भागों को पढ़े । द्विजों के लिये पौष वा भाद्रपद की पौर्णमासी पर एक ही वार उत्सर्ग कर्म कहा है ॥ ३ ॥
जिस स्त्री के शरीर पर जब तक सर्वथा ही लोम न उगे हों और जिस के वक्षस्थल में कुच प्रकट न हुए हों, उसके साथ धर्मनिष्ठ पुरुष संयोग न करे जिस के अंग उत्पत्ति से ही बिगड़े हों और जो काकबन्ध्या हो उस के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥
सर्वत्र स्मार्त्त कर्म में मिलाकर नापे तीन पग लंबा १ प्रक्रम कहाता है । और श्रौतकर्मों में यजुर्वेद के ब्राह्मणकल्प में कहा प्रक्रम का नाप जानो ॥ ५ ॥
| ७४ | कात्यायनस्मृतिः ॥ |
|---|
यस्यांदिशिबलिंदद्यात्तामेवाभिमुखोबलिम् । श्रवणाकर्म्मणिभवेन्न्यञ्चुकर्म्मनसर्वदा ॥ ६ ॥ बलिशेषस्यहवनमग्निप्रणयनन्तथा । प्रत्यहंनभवेयातामुल्मुकन्तुभवेत्सदा ॥ ७ ॥ पृषातकप्रेषणयोर्नवस्यहविषस्तथा । शिष्टस्यप्राशनेमन्त्रस्तत्रसर्वेऽधिकारिणः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणानामसान्निध्ये स्वयमेवपृषातकम् । अवेक्षेतद्विजःशेषं नवयज्ञेऽपिभक्षयेत् ॥ ९ ॥ सफलाबदरीशाखा फलवत्यभिधीयते । घनाविसिकताःशङ्काः स्मृताजातशिलास्तुताः ॥ १० ॥ नष्टेविनष्टेमणिकः शिलानाशेतथैवच । तदेवाहृत्यसंस्कार्य्यो नापेक्षेदाग्रहायणीम् ॥ ११ ॥ श्रवणाकर्म्मलुप्तंचेत्कथंचित्सूतकादिना । आग्रहायणिकंकुर्याद्वलिवर्जमशेषतः ॥ १२ ॥
जिस दिशा में बलि देनी हो उसी दिशा के सम्मुख बैठे-और श्रावणी कर्म में नीचे को अधोमुख कर्म सदा ही न करे ॥ ६ ॥ बलि के शेष भाग का होम और अग्नि का प्रणयन-(लाना) ये प्रतिदिन होते और उल्मुक अंगार तो प्रति दिन होता ही है ॥ ७ ॥ पृषातक [मिलाये हुये दूध घी] प्रेषण नवीन हविः और हविः शेष के भोजन में जो मन्त्र है उसमें सब द्विज अधिकारी हैं ॥ ८ ॥ यदि ब्राह्मण समीप में न हों तो क्षत्रियादि पुरुष आप ही पृषातक को देखले और नवयज्ञ में भी हविः शेषः का भक्षण भी करे ॥ ९ ॥ फलों पत्तों वाली बेरिया की शाखा को फलवती कहते और सघन कंकड़ीली मट्टी जो शिला जैसी जम गई हो, जिस में बालू न हो, उसे शंका कहते हैं ॥१०॥ मणिक वा शिला नष्ट भ्रष्ट हो जावे तो उसी समय नया लाकर संस्कार करले किन्तु अगहन की पौर्णमासी की बाट न देखे ॥ ११ ॥ यदि किसी प्रकार सूतक आदि से श्रावणी का कर्म न हुआ हो तो बलि कर्म को छोड़ कर आग्रहायणी (अगहन शुदी १५) को सब कर्म करे ॥ १२ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ७१
ऊर्ध्वंस्वस्तरशायीस्यान्मासमर्द्धमथापिवा । सप्तरात्रंत्रिरात्रंवा एकांवासद्यएववा ॥१३॥ नोर्ध्वमन्त्रप्रयोगःस्यान्नाग्न्यागारं नियम्यते । नाहतास्तरणंचैव नपार्श्वंचापिदक्षिणम् ॥ १४ ॥ दृढश्चेदाग्रहायण्यामावृत्त्यावापिकर्म्मणः । कुम्भौमन्त्रवदासिञ्चेत्प्रतिकुम्भमृचंपठेत् ॥ १५ ॥ अल्पानांयोविघातःस्यात् सबाधोबहुभिःस्मृतः । प्राणसम्मितइत्यादि वसिष्ठं बाधितंयथा ॥ १६ ॥ विरोधोयत्रवाक्यानां प्रामाण्यंतत्रभूयसाम् । तुल्यप्रमाणकत्वेतु न्यायएवंप्रकीर्तितः ॥ १७ ॥ त्रैयम्बकंकरतलमपूपांमण्डकाःस्मृताः । पालाशगोलकाश्चैव लोहचूर्णञ्चचीवरम् ॥ १८॥ स्पृशन्ननामिकाग्रेण क्वचिदालोकयन्नपि । अनुमन्त्रणीयं सर्वत्र सदैवमनुमन्त्रयेत् ॥ १९ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ अष्टाविंशतितमः खण्डः ॥ २८॥
फिर एक महीने वा पन्द्रह दिन वा सात दिन वा तीन दिन वा एक दिन अथवा उसी समय अपने २ गृह्यकल्प में कहे अनुसार स्वस्तरारोहण कर्म करें ॥ १३ ॥ फिर स्वस्तरारोहण के पीछे सोने में मन्त्र प्रयोग, अग्न्यागार के निकट सोने का नियम, अहतवस्त्र बिछाने का नियम और दहिने करवट से लेटने का नियम नहीं रक्खा जाता है ॥ १४ ॥ यदि मनुष्य मार्गशिर की पौर्णमासी को वार २ कर्म की आवृत्ति करने में समर्थ हो तो कुप्पा में से जल लाकर मट्टी के बड़े २ दो पात्रों में प्रत्येक वार मन्त्र पढ़ २ के जल भरे ॥ १५ ॥ छोटे कर्मों का जो विघात (नाश) है उसे बहुत ऋषि बाध कहते हैं जैसे प्राण सम्मित (शक्ति के अनुसार) इत्यादि वशिष्ठ ऋषि का कहा विचार बाधित है ॥ १६ ॥ जहां वचनों का परस्पर विरोध हो वहां बहुत ऋषियों का वचन प्रमाण होता है और जहां दोनों विरुद्धों में तुल्य प्रमाण हों वहां यह आगे कहा निर्णय जानो ॥ १७ ॥ हाथ के तल को त्रैयंबक, अपूपों को मण्डक, ढाकों को गोलक और लोहे के चूर्ण को चीवर कहते हैं ॥ १८ ॥ अनामिका के अग्रभाग से अनुमन्त्रणीय वस्तुका सब अनुमन्त्रण के कामों में स्पर्श करता हुआ वा किसी कर्म में उस को देखता हुआ भी सदव अनुमन्त्रण करे ॥ १९ ॥
यह २८ वां खण्ड पूरा हुआ ॥
११
३६ | कात्यायनस्मृतिः ॥
क्षालनं दर्भकूर्चेन सर्वतः प्रोक्षणांस्तथा ।
तूष्णीमिच्छाक्रमेणस्या द्वपार्थेपाणदारुणी ॥ १ ॥
सप्ततावन्मूर्धन्यानि तथास्तनचतुष्टयम् ।
नाभिःश्रोणिरपानंच गोस्रोतांसिचतुर्दश ॥ २ ॥
क्षुरोमांसावदानार्थः कृत्स्वास्विष्टकृदावृता ।
वपामादायजुहुयात्तत्र मन्त्रंसमापयेत् ॥ ३ ॥
हृज्जिव्हाक्रोडमस्थीनि यकृद्वृक्कौगुदंस्तनाः ।
श्रोणिरंस्यसटापार्श्वं पश्वङ्गानिम्रचक्षते ॥ ४ ॥
एकादशानामङ्गानामवदाना निसंख्यया ।
पार्श्वस्यवृक्कसक्थ्नोश्च द्वित्वाहादुश्चतुर्दश ॥ ५ ॥
चरितार्थाश्रुतिःकार्या यस्मादप्यनुकल्पशः ।
अतोऽष्टर्च्चनहोमःस्याच्छागपक्षेचरावपि ॥ ६ ॥
अवदानानियावन्ति क्रियेरन्प्रस्तरेपशोः ।
तावन्तःपायसान्पिण्डान्पश्वभावेपिकारयेत् ॥ ७ ॥
यज्ञ सम्बन्धी पशु के इन्द्रिय वा छिद्रों का दाभ के कूंसे से अपनी इच्छानुकूल क्रम से (तूष्णीं) बिना मन्त्र पढ़े प्रक्षालन करे। और वपाश्रपणी नामक यज्ञपात्र [जिस पर रख के वपा पकाई जाती है] ढांक के पत्तों की वा काष्ठ की होनी चाहिये गौ के शरीर में चौदह छिद्र होते हैं सात तो ऊपर, शिर में चार ४ थन, नाभी, (डोंडी) योनी और गुदा ॥२॥ मांस के टुकड़े करने के लिये छुरा होता है । प्रधान के बाद क्रम से वपा को लेकर सब स्विष्टकृत पर्यन्त होम करे और उस समय मन्त्र को समाप्त करे अर्थात् प्रधान याग और स्विष्टकृत दोनों मन्त्रों को मिलाकर एकही वार वपा की आहुति देवे ॥ ३ ॥ हृदय, जिह्वा, गोड़, हड्डी, जिगर, वृषण, गुदा, स्तन, श्रोणी, कन्धे और सटा (ठाठे) के दोनों पार्श्व ये पशु के अंग कहाते हैं ॥ ४ ॥ इन ग्यारह अङ्गों के अवदान नाम टुकड़े लेखानुसार गिनती मे होते हैं और पार्श्व, वृषण [अण्डकोश] और सक्थी जांघ, ये दो २ होते हैं इस से पशु के चौदह अङ्ग कहे हैं ॥ ५ ॥ प्रत्येक कल्पोक्त कामों में श्रुति को चरितार्थ करना चाहिये ॥ इस से बकरा और चरूदोनों पक्षों में आठ ऋचाओं से होम करना चाहिये ॥६॥ यज्ञ पशु के अंगों के जितने अवदान नाम टुकड़े, प्रस्तर नामक कुशों पर कर के रक्खे जांय उतने ही पायस नाम खीर के पिण्ड पशु न हो, तब भी करावे ॥७॥
भाषार्थसहिता ॥ ९९
ऊहनव्यञ्जनार्थन्तु पश्वभावेऽपि पायसम् ।
सद्रवं श्रपयेत्तद्वदन्वष्टक्येऽपिकर्म्मणि ॥ ८ ॥
प्राधान्यपिण्डदानस्य केचिदाहुर्मनीषिणः ।
गयादौपिण्डमात्रस्य दीयमानत्वदर्शनात् ॥ ९ ॥
भोजनस्यप्रधानत्वं वदन्त्यन्येमहर्षयः ।
ब्राह्मणस्यपरीक्षायां महायत्नप्रदर्शनात् ॥ १० ॥
आमश्राद्धविधानस्य विनापिण्डैःक्रियाविधिः ।
तदालभ्याप्यनध्यायविधानश्रवणादपि ॥ ११ ॥
विद्वन्मतमुपादाय ममाप्येतद्धृदिस्थितम् ।
प्राधान्यमुभयोर्यस्मान्तस्मादेषसमुच्चयः ॥ १२ ॥
प्राचीनावीतिनाकार्यं पित्र्येषुप्रोक्षणंपशोः ।
दक्षिणोद्वासनान्तंच चरोर्निर्वपणादिकम् ॥ १३ ॥
सन्नयश्चावदानानां प्रधानार्थोनहीतरः ।
ऊहन और व्यञ्जन कर्म के लिये भी पशु के अभाव में पायस ही करे और अन्वष्टका श्राद्ध कर्म में उस पायस को सद्रव नाम ढीला पकावे ॥ ८ ॥ ऋषि कोई विद्वान् ऋषि श्राद्ध में पिण्डदान को ही प्रधान कहते हैं क्योंकि गया आदि तीर्थों में केवल पिण्ड ही दिया जाता है ॥ ९ ॥ और कोई ऋषि ब्राह्मणों को भोजन कराने को ही मुख्य कहते हैं क्योंकि ब्राह्मण की परीक्षा में मनु आदि धर्म शास्त्र में बहुत प्रयत्न किया देख जाता है ॥१०॥ अग्नि में न पकाये कन्द फलादि से होने वाले श्राद्ध का विधान यह है कि विना पिंड दिये ही कर्म करना श्रेष्ठ है। क्योंकि ब्राह्मण के मिलने पर भी अनध्याय की विधि शास्त्र से सुनी जाती है ॥११॥ विद्वानों के मत को स्वीकार करके हमारे भी हृदय में यही निश्चय हुआ है कि जिस कारण दोनों की प्रधानता है इससे यह समुच्चय अर्थात् पिण्डदान और श्रेष्ठ ब्राह्मण को भोजन देना ये दोनों होने चाहिये ॥१२॥ पितृ कर्मों में पशु का प्रोक्षण ( मन्त्रों से छिड़कना ) अपसव्य होकर करे और चरू के लिये चावल ग्रहण करने से लेकर पका के उतारने पर्यन्त सब कृत्य अपसव्य होकर करे ॥ १३ ॥ चरू के अवदानों का सञ्चय नाम संग्रह भी
७८ कात्यायनस्मृतिः ॥
प्रधानं हवनंचैव शेषंप्रकृतिवद्भवेत् ॥ १४ ॥
द्वीपमुन्नतमाख्यातं शादाचैवेष्टकास्मृता ।
कीलिनंसजलंरोक्तं दूरखातोदकोमरुः ॥ १५ ॥
द्वारंगवाक्षस्तम्भैः कर्द्दमभित्यन्तकोणवेधैश्च ।
नेष्टंवास्तुद्वारंविद्रुमनाक्रान्तिमार्थैश्च ॥ १६ ॥
वशंगमावितिव्रीहींउंछंवश्वेतियवांस्तथा ।
असावित्यत्रनामोक्त्वा जुहुयात्क्षिप्रहोमवत् ॥ १७ ॥
साक्षतं सुमनोयुक्तमुदकंदधिसंयुतम् ।
अर्घ्यंदधिमधुभ्यांच मधुपर्कोविधीयते ॥ १८ ॥
कांस्येनैवार्हणीयस्य निनयेदर्घ्यमञ्जलौ ।
कांस्यापिधानंकांस्यस्थं मधुपर्कं समर्पयेत् ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकोनत्रिंशत्तमः खण्डः ॥ २९ ॥
इति कात्यायनविरचिते कर्मप्रदीपे तृतीयः प्रपाठकः ॥
समाप्ता चेयं कात्यायनसंहिता ॥ शुभंभूयात् ॥
प्रधान कृत्य है किन्तु अन्य कोई प्रधान नहीं । प्रधान तथा होम शेष कर्म प्रकृति यज्ञ के समान होता है ॥ १४ ॥ ऊंचे को द्वीप कहते इष्टका ईंटो को शादा, जल सहित को कीलिन और जहां दूर खोदने से जल निकले उसे मरु (मारवाड़) कहते हैं ॥ १५ ॥ ऐसा घर का द्वार इष्ट (अच्छा) नहीं होता जिस में गवाक्ष (खिड़की) या झरोखे तथा खम्भ न हों और (कर्द्दम) गारा की भीत जिस में हो, कोण का जिस में वेध हों अथवा जिस में सज्जन नहीं हैं ॥ १६ ॥ (वशंगमौ०) इस मंत्र से व्रीहि और (शंलश्व) इस मंत्र से जौ का क्षिप्रहोम के समान होम करै परन्तु जो मंत्र में असौ पद है उसके स्थान में अपेक्षित का नाम बोले ॥ १७ ॥ अक्षत, फूल, दही, जिसमें मिलाये हों ऐसा जल अर्घ्य देने के लिये अर्घ्य कहाता है और दही तथा मधु जिसमें मिलाये हों उसे मधुपर्क कहते हैं ॥ १८ ॥ जिस अपने पूजने योग्य को अर्घ्य देना हो उसकी अंजली में कांसे के पात्र से अर्घ्य छोड़े और कांसे के पात्र से ढके हुए कांसे के पात्र में रखकर मधुपर्क का समर्पण करे ॥ १९ ॥
यह २९ उन्तीसवां खण्ड पूरा हुआ ॥
और कात्यायन ऋषि के रचे कर्म प्रदीप में तीसरा प्रपाठक पूरा हुआ ॥
इति कात्यायनस्मृतिः समाप्ता ॥
श्रीगणेशायनमः । अथ बृहस्पतिस्मृतिप्रारम्भः ॥
इष्ट्वाक्रतुशतंराजा समाप्तवरदक्षिणम् ।
मघवावाग्विदांश्रेष्ठं पर्यपृच्छद्बृहस्पतिम् ॥ १ ॥
भगवन्केनदानेन सर्वतःसुखमेधते ।
यदत्तंयन्महार्घंच तन्मेब्रूहिमहत्तम? ॥ २ ॥
एवमिन्द्रेणपृष्टोऽसौ देवदेवपुरोहितः ।
वाचस्पतिर्महाप्राज्ञो बृहस्पतिरुवाचह ॥ ३ ॥
सुवर्णदानंगोदानं भूमिदानंचवासव? ।
एतत्प्रयच्छमानस्तु सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ४ ॥
सुवर्णंरजतंवस्त्रं मणिरत्नंचवासव? ।
सर्वमेवभवेद्दत्तं वसुधांयःप्रयच्छति ॥ ५ ॥
फालकृष्टांमहींदत्त्वा सबीजांसस्यशालिनीम् ।
यावत्सूर्यकरालोके तावत्स्वर्गंमहीयते ॥ ६ ॥
श्रेष्ठ दक्षिणा जिन में दी हो ऐसे सौ यज्ञों को समाप्त करके राजा इन्द्र ने विद्वानों में श्रेष्ठ बृहस्पति जी से पूछा ॥ १ ॥ कि हे भगवन् ! किस दान से मनुष्य को सब ओर से सुख बढ़ता है। और जो २ वस्तु दिया जाय और जो सर्वोपरि बहु मूल्य हो उस दान को हे बड़ों में बड़े मुझ से कहो ॥ २ ॥ इस प्रकार इन्द्र ने पूछा है जिनको ऐसे इन्द्र के पुरोहित और वाणी के पति और महान् विद्वान् बृहस्पति बोले कि ॥ ३ ॥ हे इन्द्र ! सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इन को जो देता है वह सब पापों से छूट जाता है ॥ ४ ॥ हे इन्द्र ? जो मनुष्य पृथिवी का दान देता है उसने सुवर्ण, चांदी, वस्त्र, मणि, रत्न, इन सबका दान दिया जानो ॥ ५ ॥ जो हल से जुती हो, जिसमें बीज बोया हो और जो हरे अन्न से शोभायमान हो, ऐसी पृथिवी को देनेवाला इतने काल तक स्वर्ग में वास करता है कि जब तक सूर्य का जगत् में प्रकाश है ॥ ६ ॥
२ बृहस्पतिस्मृतिः ॥
यत्किञ्चित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्षितः ।
अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
दशहस्तेनदण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्त्तनम् ।
दशतान्येवविस्तारो गोचर्मैतन्महाफलम् ॥ ८ ॥
सवृर्षंगोसहस्रन्तु यत्रतिष्ठत्यतन्द्रितम् ।
बालवत्साप्रसूतानां तद्गोचर्मेइतिस्मृतम् ॥ ९ ॥
विप्रायदद्याच्चगुणान्विताय तपोनियुक्तायजितेन्द्रियाय।
यावन्महीतिष्ठतिसागरान्ता तावत्फलंतस्यभवेदनन्तम् ॥१०॥
यथाबीजानिरोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
एवंकामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमर्जिताः ॥ ११ ॥
यथाप्सुपतितःसद्यस्तैलविन्दुःप्रसर्पति ।
एवंभूमिकृतंदानं सस्येसस्येप्ररोहति ॥ १२ ॥
अन्नदाःसुखिनोनित्यं वस्त्रदश्चैवरूपवान् ।
सनरस्सर्वदोभूप? योददातिवसुन्धराम् ॥ १३ ॥
आजीविका से दुःखी मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह गौ के चर्म की बरा-बर पृथिवी का दान देकर शुद्ध होजाता है ॥ ७ ॥ दश हाथ के दण्ड से तीस-दण्ड भर जिस की लम्बाई और चौड़ाई हो यह महान् फल का देने वाला गोचर्म का नाप कहाता है ॥ ८ ॥ जितने भूभाग में हजार गौ और हजार बैल आनन्द से ठहर सकें तथा उन गौओं में जो ब्यानी हों उन के बाल बछड़े भी जिस में आसकें उसे गोचर्म प्रमाण कहते हैं ॥ ९ ॥ जो इस पृथ्वी को ऐसे ब्राह्मण को देवे जो गुणी हो, तपस्वी हो, जितेन्द्रिय हो, उस पुरुष को, समुद्र पर्यन्त पृथ्वी जब तक रहेगी तब तक अनन्त फल होता है ॥ १० ॥ जैसे पृथ्वी पर बोये हुए बीज जमते हैं वैसे ही पृथ्वी के दान से कामनाओं की सिद्धियां बढ़ती हैं ॥११॥ हे इन्द्र ! जैसे जल में पड़ी तेल की बूंद फैलती है ऐसे ही किया हुआ भूमि का दान शस्य २ में जमता है ॥ १२ ॥ अन्न का दाता सदा सुखी, वस्त्र का दाता सुन्दर रूपवाला होता है और हे राजन् ! वह मनुष्य सब कुछ देने वाला होता है जो पृथ्वी को देता है ॥ १३ ॥
भाषाथंसहिता ॥ ३
यथागौर्भरतेवत्सं क्षीरमुत्सृज्यक्षीरिणी ।
स्वयंदत्तासहस्राक्ष ? भूमिर्भरतिभूमिदम् ॥ १४ ॥
शंखम्भद्रासनंछत्रं चरस्थावरवारणाः ।
भूमिदानस्यपुण्यानि फलंस्वर्गःपुरन्दर ! ॥ १५ ॥
आदित्योवरुणोवन्हिर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ।
शूलपाणिश्चभगवानभिनन्दतिभूमिदम् ॥ १६ ॥
आस्फोटयन्तिपितरः प्रहर्षन्तिपितामहाः ।
भूमिदाताकुलेजातः सचत्राताभविष्यति ॥ १७ ॥
त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वोसरस्वती ।
तारयन्तीहदातारं सर्वपापादसंशयम् ॥ १८ ॥
प्रावृतावस्त्रदायान्ति नग्नायान्तित्ववस्त्रदाः ।
तृप्तायान्त्यन्नदातारः क्षुधितायान्त्यनन्नदाः ॥ १६ ॥
काङ्क्षन्तिपितरःसर्वे नरकाद्भयभीरवः ।
जैसे दूध देती गौ दूध को छोड़कर बछड़े को संतुष्ट करती है हे इन्द्र ! ऐसे ही अपने हाथ से दी हुई पृथ्वी भी अपने दाता को पुष्ट सन्तुष्ट करती है ॥ १४ ॥ शंख, भद्रासन, ( राजगद्दी ) छाता, चर प्राणी, स्थावर वृक्षादि, उत्तम हाथी हे इन्द्र ! ये पृथ्वी के दान के पुण्य हैं और स्वर्ग फल है ॥ १५ ॥ सूर्य-वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, होम का अग्नि-और भगवान शिवजी ये पृथ्वी के दाता की प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥
पृथिवी दाता के पितृ पितामह लोग अच्छे प्रकार आनन्द मनाते हैं कि हमारे कुल में पृथिवी दाता सन्तान जन्मा है वही हमारी रक्षा करने वाला होगा ॥ १७ ॥ गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन सब से बड़े तथा श्रेष्ठ महादान हैं, ये तीनों दाता को निःसन्देह पापों से पार कर देते हैं ॥ १८ ॥ वस्त्र के दाता ढके हुये सुरक्षित, जिन्होंने वस्त्र नहीं दिये वे नंगे, अन्न के दाता तृप्त हुये और जिन्हों ने अन्न नहीं दिया वे भूखे जाया करते हैं ॥१९॥ नरक के भय से डरते हुये पितर यह इच्छा करते हैं कि जो पुत्र गया में जायगा
४ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥
गयांयास्यतियःपुत्रः सनस्त्राताभविष्यति ॥ २० ॥
एष्टव्याबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांब्रजेत् ।
यजेतवाश्वमेधेन नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ २१ ॥
लोहितोयस्तुवर्णेन पुच्छाग्रे यस्तुपाण्डुरः ।
श्वेतःखुरविषाणाभ्यां सनीलोवृषउच्यते ॥ २२ ॥
नीलःपाण्डुरलाङ्गूलस्तृणमुद्धरतेतुयः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि पितरस्तेनतर्पिताः ॥ २३ ॥
यस्यशृङ्गगतंपङ्कं कूलात्तिष्ठतिचोद्धृतम् ।
पितरस्तस्यचाश्नन्ति सोमलोकंमहाद्युतिम् ॥ २४ ॥
पृथोर्यदोर्दिलीपस्य नृगस्यनहुषस्यच ।
अन्येषांचनरेन्द्राणां पुनरन्योभविष्यति ॥ २५ ॥
बहुभिर्वसुधादत्ता राजभिःसगरादिभिः ।
यस्ययस्ययदाभूमिस्तस्यतस्यतथाफलम् ॥ २६ ॥
यस्तु ब्रह्मघ्नःस्त्रीघ्नोवा यस्तुवैपितृघातकः ।
वही हमारी रक्षा करने वाला होगा ॥ २० ॥ मनुष्य बहुत से पुत्रों की इच्छा करे यदि उन में से एक भी गया को जाय व अश्वमेध यज्ञ करे वा नील बैल का वृषोत्सर्ग करे ॥२१॥ नील बैल उस को कहते हैं जिस का रंग लाल हो, जो पूंछ के अग्रभाग में पीला हो और खुर तथा सींग जिस के सफेद हों ॥२२॥ नील जिसका रंग हो, पीली जिस की पूंछ हो और जो घास तृणों को उखाड़ २ के चरे, ऐसे बैल के उत्सर्ग से साठ हजार वर्ष तक पितर तृप्त होते हैं ॥ २३ ॥ नदी आदि के किनारे से उखाड़ा हुआ पंक ( कीचड़ ) जिस के सींग पर लगा हो ऐसे बैल के उत्सर्ग कर्त्ता के पितर प्रकाशमान चन्द्रमा के लोक को भोगते हैं ॥ २४ ॥ राजा पृथु, यदु, दिलीप, नृग, नहुष, और अन्य राजाओं में से कोई राजा वह वृषोत्सर्ग करने वाला मेरे पीछे फिर होता है ॥ २५ ॥ बहुत से सगर आदि राजाओं ने पृथिवी का दान किया जिस २ की जैसी २ पृथिवी दान हुई उस २ को वैसा २ ही फल हुआ ॥ २६ ॥ जो पुरुष ब्रह्म हत्यारा वा स्त्री को मारने वाला और पितृ घातक है वह पापी
भावार्थसहिता ॥ ५
गवांशतसहस्राणां हन्ताभवतिदुष्कृती ॥ २७ ॥
स्वदत्तांपरदत्तांवा योहरेतवसुन्धराम् ।
श्वविष्ठायांक्रमिर्भूत्वा पितृभिःसहपच्यते ॥ २८ ॥
आक्षेप्ताचानुमन्ताच तमेवनरकंव्रजेत् ।
भूमिदोभूमिहर्ताच नापरंपुण्यपापयोः ॥ २९ ॥
ऊर्ध्वंचाधोवतिष्ठेत यावदाभूतसंप्लवम् ।
अग्नेरपत्यंप्रथमंसुवर्णं भूर्वैष्णवीसूर्यसुताश्चगावः ॥३०॥
लोकास्त्रयस्तेनभवन्तिदत्ता यःकाञ्चनंगांचमहींचदद्यात् ।
षडशीतिसहस्राणां योजनानांवसुन्धरा ॥ ३१ ॥
स्वयंदत्तातुसर्वत्र सर्वकामप्रदायिनी ।
भूमिंयःप्रतिगृह्णाति भूमिंयश्चप्रयच्छति ॥ ३२ ॥
उभौतौपुण्यकर्माणौ नियतंस्वर्गगामिनौ ।
सर्वेषामेवदानानामेकजन्मानुगंफलम् ॥ ३३ ॥
हाटकक्षितिगौरीणां सप्तजन्मानुगंफलम् ।
लक्ष गौओं को मारने वाला होता है ॥२७॥ जो पुरुष अपनी या पराई दी हुई पृथ्वी को छीन लेता है वह कुत्ते की विष्ठा में कीड़ा होकर पितरों सहित पकाया जाता है ॥ २८ ॥ आक्षेप करने और अनुमति देने वाला एक ही नरक में जाते हैं । पृथ्वी का दाता और पृथ्वी का हरने वाला अपने २ पुण्य वा पाप से ॥ २९ ॥ क्रम से स्वर्ग में वा नरक में प्रलय पर्यन्त ठहरते हैं। अग्नि का प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी विष्णु की पत्नी है और सूर्य की पुत्री गौ है॥३०॥जो पुरुष सुवर्ण गौ और पृथ्वी को दान में देता है उस ने मानो तीनों लोक दिये। छ्यासी हजार योजन पृथिवी का विस्तार है ॥३१॥ उस को जिस ने स्वयं दिया है वह पृथ्वी उसकी सब कामना पूरण करती है। पृथ्वी का दान जो लेता है और जो पृथ्वी को देता है॥३२॥ वे दोनों पुण्यात्मा निरन्तर स्वर्ग में जाते हैं। अन्य सब दानों का फल एक ही जन्म में मिलता है ॥ ३३ ॥ सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इनका फल सात जन्म तक मिलता है। जो पुरुष यह समझता हुआ
२
६ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥
यो न हिंस्यादहं ह्यात्मा भूतग्रामंश्चतुर्विधम् ॥ ३४ ॥
तस्य देहाद्वियुक्तस्य भयं नास्तिकदाचन ।
अन्यायेन हृता भूमिर्येर्नरैरपहारिता ॥ ३५ ॥
हरन्तो हारयन्तश्च हन्युस्ते सप्तमं कुलम् ।
हरते हारयेद्यस्तु मन्दबुद्धिस्तमोवृतः ॥ ३६ ॥
सबद्धो वारुणैः पाशैस्तिर्यग्योनौ पुजायते ।
अश्रुभिः पतितैस्तेषां दानानामपकीर्तनम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणस्य हृते क्षेत्रे हन्ति त्रिपुरुषंकुलम् ।
वापीकूपसहस्रेण अश्वमेधशतेन च ॥ ३८ ॥
गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ।
गामेकां स्वर्णमेकं वा भूमेरप्यर्द्धमंगुलम् ॥ ३६ ॥
हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् ।
हुतं दत्तं तपोऽधीतं यत्किंचिद्धर्मसंचितम् ॥ ४० ॥
अर्द्धांगुलस्य सीमायां हरणेन प्रणश्यति ।
कि चार प्रकार के भूत समुदाय में मैं एक ही आत्मा विद्यमान हूं ऐसे विचार से चार प्रकार (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज) के भूतों को दुःख नहीं देता ॥३४॥ देह से जुदे होने पर उस जीवात्मा को कभी भी भय नहीं है। जिन मनुष्यों ने अन्याय से पृथ्वी छीनी वा छिनवाई है ॥ ३५ ॥ वे दोनों छीनने और छिनवाने वाले अपने सात कुलों को नष्ट करते हैं। जो मन्द बुद्धि और अज्ञानी पृथिवी छीनते हुए की प्रेरणा करता है ॥ ३६ ॥ वह वरुण के फांसों में बंधा हुआ पशु आदि तिर्यग्योनि में पैदा होता है। जिनकी भूमि आदि छीनी गयी उनके आंसू पड़ने से दाता का दान भी नष्ट हो जाता है ॥ ३७ ॥ ब्राह्मण के खेत को जो छीन लेता है उसकी तीन पीढ़ी नष्ट होती हैं। हजार बावड़ी तथा कूपों के बनाने से, सौ अश्वमेध यज्ञ करने से ॥ ३८ ॥ तथा एक करोड़ गौओं के देने से भी पृथ्वी को हरने वाला शुद्ध नहीं होता। एक गौ एक सोना (असरफी) और पृथ्वी का आध अंगुल इनके ॥ ३९ ॥ हरनेने से प्रलय तक नरक में जाता है। होम, दान, तप, वेद का पढ़ना और जो कुछ पुण्य धर्म से संचित किया है वह सब ॥ ४० ॥ आधा
भाषार्थसंहिता ॥ ७
गोवीथींग्रामरथ्यांच श्मशानंगोपितंतथा ॥ ४१ ॥ संपीड्यनरकंयाति यावदाभूतसंप्लवम् । ऊषरेनिर्जलेस्थाने प्रास्तंसस्यंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥ जलाधारञ्चकर्त्तव्यो व्यासस्यवचनंयथा । पञ्चकन्यान्नृतेहन्ति दशहन्तिगवानृते ॥ ४३ ॥ शतमश्वान्नृतेहन्ति सहस्रंपुरुषानृते । हन्तिजातानजानांश्च हिरण्यार्थेनृतंवदन् ॥ ४४ ॥ सर्वंभूम्यनृतेहन्ति मास्मभूम्यनृतंवदीः । ब्रह्मस्वेनरतिंकुर्यात्प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥ ४५ ॥ अनौपयमभैषज्यं विषमेतद्धलाहलम् । नविषंविषमित्याहुर्ब्रह्मस्वंविषमुच्यते ॥ ४६ ॥ विषमेकाकिनंहन्ति ब्रह्मस्वंपुत्रपौत्रकम् ।
अंगुल भूमि की सीमा हरने से नष्ट हो जाता है-गोओं का मार्ग, ग्राम की गली, श्मशान और गोषित (रखाया हुआ खेत) ॥ ४१ ॥ इनके बिगाड़ने से प्रलय तक नरक में जाता है। ऊपर और जहां जल न हो वहां खेत न वोवे ॥४२॥ व्यास जी के वचन के अनुसार कृपादि जलाशय खेत भरने आदि के लिये क-रना चाहिये। कन्या के निमित्त झूठ बोलने में पांच को, गौ के निमित्त झूठ बोलने में दश को ॥ ४३ ॥ घोड़े के निमित्त मिथ्या बोलने में सौ को, पुरुष के निमित्त झूठ बोलने में हज़ार को, सुवर्ण के निमित्त झूठ बोलने में जो पैदा हुए हैं तथा जो पैदा होंगे उन सब को ॥ ४४ ॥ और पृथ्वी के निमित्त झूठ बोलने में सब को मारता है इससे पृथ्वी के निमित्त झूठ मत बोलो। चाहें प्राण कंठ में आजायं, तो भी ब्राह्मण के धन से प्रीति न करै अर्थात् लेने की इच्छा न करे ॥ ४५ ॥ यह ब्राह्मण का धन लेलेना हलाहल विष है, जिसकी औषधि वा चिकित्सा नहीं है। क्योंकि बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि विष, विष नहीं है किन्तु ब्राह्मण का धन मारलेना सर्वोपरि विष है ॥४६॥
क्योंकि विष एकको ही मारता है परन्तु ब्राह्मण का धन छीन लेना पुत्र पौत्रों को भी मारता है। लोहे तथा पत्थर का चूर्ण और विष इन को
८ बृहस्पतिस्मृतिः ॥
लोहचूर्णाश्मचूर्णंच विषञ्चजरयेन्नरः ॥ ४७ ॥
ब्रह्मस्वं त्रिषुलोकेषु कःपुमान्जरयिष्यति ।
मन्युप्रहरणाविप्रा राजानःशस्त्रपाणयः ॥ ४८ ॥
शस्त्रमेकाकिनंहन्ति ब्रह्ममन्युःकुलत्रयम् ।
मन्युप्रहरणाविप्राश्चक्रप्रहरणोहरिः ॥ ४९ ॥
चक्रात्तीव्रतरोमन्युस्तस्माद्विप्रन्नकोपयेत् ।
अग्निदग्धाःप्ररोहन्ति सूर्यदग्धास्तथैवच ॥ ५० ॥
मन्युदग्धस्यविप्राणामङ्कुरोनप्ररोहति ।
तेजसाग्निश्चदहति सूर्योदहतिरश्मिना ॥ ५१ ॥
राजादहतिदण्डेन विप्रोदहतिमन्युना ।
ब्रह्मस्वेनतुयत्सौख्यं देवस्वेनतुयारतिः ॥ ५२ ॥
तद्धनंकुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् ।
ब्रह्मस्वंब्रह्महत्याच दरिद्रस्यचयद्धनम् ॥ ५३ ॥
गुरुमित्रहिरण्यंच स्वर्गस्थमपिपीड़येत् ।
भी मनुष्य पचा सकता है ॥४७॥ पर तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो ब्राह्मण के धन को पचा सके। ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है, राजाओं के हाथ में शस्त्र है ॥ ४ ॥ यह हाथ का शस्त्र एक को ही मारता है और ब्राह्मण का शोक तीन कुल को नष्ट करता है । ब्राह्मणों का प्रहार (शस्त्र) क्रोध और विष्णु का प्रहार चक्र है ॥ ४९ ॥ चक्र से क्रोध बड़ा पैना है, इससे ब्राह्मण को कुपित न करे वा न करावे अग्नि और सूर्य के जले भी जम आते हैं ॥ ५० ॥ और ब्राह्मणों के क्रोध से. दग्ध हुओं का अङ्कुर भी नहीं जमता, अग्नि अपने तेज से और सूर्य अपनी किरणों से दग्ध करते हैं ॥ ५१ ॥ राजा दण्ड से और ब्राह्मण क्रोध से दग्ध करता है। ब्राह्मण के धन से जो सुख भोग होता, देवता के धन से जो रति (क्रीड़ा) होती है ॥ ५२ ॥ वह धन, कुल और आत्मा को नष्ट करता है । ब्राह्मण का धन ब्राह्मण की हत्या और दरिद्र का जो धन ॥५३॥ गुरु और मित्र का सुवर्ण, ये स्वर्ग में रहने वाले को भी पीड़ित करते हैं ।
भाषाअर्थसहिता ॥
ब्रह्मस्वेनतुयच्छिद्रं तच्छिद्रंनप्ररोहति ॥ ५४ ॥ प्रच्छादयतितच्छिद्रमन्यत्रतुविसर्पति । ब्रह्मस्वेनतुपुष्टानिसाधनानिबलानिच ॥ ५५ ॥ संग्रामेतानिल्लीयन्ते सिकतासुयथोदकम् । श्रोत्रियायकुलीनाय दरिद्रायचवासव ! ॥ ५६ ॥ संतुष्टायविनीताय सर्वभूतहितायच । वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियाणांचसंयमः ॥ ५७ ॥ ईदृशायसुरश्रेष्ठ ! यद्दत्तंहितदक्षयम् । आमपात्रेयथान्न्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ॥ ५८ ॥ विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंविनश्यति । एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमन्नंमहींतिलान् ॥ ५९ ॥ अविद्वान्प्रतिगृह्णाति भस्मीभवतिकाष्ठवत् । यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिवहुश्रुतः ॥ ६० ॥ बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ।
और ब्राह्मण के धन को मार लेने से जो छिद्र नाम दोष लगता है वह नहीं मिटता ॥ ५४॥ यदि कोई उस छिद्र को छिपाता है तो भी वह छिपता नहीं । ब्राह्मण के धन से पुष्ट हुए अङ्गरूप साधन और सेना ॥५५॥ संग्राम में ऐसे लीन होजाते हैं जैसे रेत (वालू) में जल । हे इन्द्र ! कुलीन और दरिद्री वेद पाठी ब्राह्मण को ॥५६॥ जो सन्तोषी, नम्र, और सब प्राणियों का हितकारी हो, जो वेद का अभ्यासी हो, तपस्वी हो और इन्द्रियों का जीतने वाला हो ॥ ५७ ॥ हे देवताओं में उत्तम इन्द्र ! जो ऐसे ब्राह्मण को दिया जाय वह दान अक्षय पुण्यवाला होता है । कच्चे मट्टी के पात्र में रक्खा दूध, दही, घी सहत ॥५८॥ जैसे पात्र की दुर्बलता से नष्ट होता है और वह पात्र भी नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार गौ, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, पृथिवी, तिल इन को ॥ ५९ ॥ जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेता है वह काष्ठ के समान भस्म होता है। जिस पुरुष के घर में मूर्ख ब्राह्मण हो और बहुश्रुत (पण्डित) दूर हो ॥६०॥ तो पण्डितको दान देवे किन्तु मूर्ख का उल्लंघन न माने। क्योंकि पण्डित को देने से हे इन्द्र !
१७ बृहस्पतिस्मृतिः ॥
कुलंतारयतेधीरः सप्तसप्तचवासव ! ॥ ६१ ॥ यस्तडागंनवं कुर्यात्पुराणंवापिखानयेत् । ससर्वंकुलमुद्धृत्य स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ६२ ॥ वापीकूपतडागानि उद्यानोपवनानिच । पुनःसंस्कारकर्ताच लभतेमौलिकंफलम् ॥ ६३ ॥ निदाघकालेपानीयं यस्यतिष्ठतिवासव ! । सदुर्गंविषमंकृत्स्नं नकदाचिदवाप्नुयात् ॥ ६४ ॥ एकाहंतुस्थितंतोयं पृथिव्यांराजसत्तम ! । कुलानितारयेत्तस्य सप्तसप्तपराण्यपि ॥ ६५ ॥ दीपालोकप्रदानेन वपुष्मान्सभवेन्नरः । प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिंमेधांचविन्दति ॥ ६६ ॥ कृत्वापिपापकर्माणि योदद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणायविशेषेण नसपापेनलिप्यते ॥ ६७ ॥ भूमिर्गावस्तथादाराः प्रसह्यह्रियतेयदा । नचावेदयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६८ ॥
वह अपने इक्कीस कुलों को तारता है ॥ ६१ ॥ जो पुरुष नया तालाब बनवावे वा पुराने को खुदवावे, वह सब कुल का उद्धार करके स्वर्ग में पूजा जाता है ॥६२॥ वावड़ी, कूप, तड़ाग, बाग, और उपवन ( छोटा बगीचा ) इन का जो फिर संस्कार ( मरम्मत ) करता कराता है वह नये बनाने के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ ग्रीष्म ऋतुकाल में जिस के यहां जल रहता है वह कठोर विषम दुःख को कभी नहीं भोगता है ॥ ६४ ॥ जिस की खोदी हुई पृथिवी में एक दिन भी जल ठहरता है, हे राजाओं में उत्तम इन्द्र ! उस के अगले पिछले सात २ कुलों को तारता है ॥ ६५ ॥ दीपक के देने से सुन्दर शरीर वाला मनुष्य होता है और दर्शनीय वस्तु दान से स्मृति और बुद्धि को प्राप्त होता है॥६६॥
निन्दित पाप कर्म करके भी जो अभ्यागत वा भिक्षुक को और विशेष कर ब्राह्मण को अन्न देता है, वह पाप से दूषित नहीं होता ॥ ६७ ॥ जो पुरुष बल पूर्वक पृथिवी, गो और स्त्री इन को बिन कहे हर लेता है उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६८ ॥