भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

भाषाअर्थसहिता ॥

ब्रह्मस्वेनतुयच्छिद्रं तच्छिद्रंनप्ररोहति ॥ ५४ ॥ प्रच्छादयतितच्छिद्रमन्यत्रतुविसर्पति । ब्रह्मस्वेनतुपुष्टानिसाधनानिबलानिच ॥ ५५ ॥ संग्रामेतानिल्लीयन्ते सिकतासुयथोदकम् । श्रोत्रियायकुलीनाय दरिद्रायचवासव ! ॥ ५६ ॥ संतुष्टायविनीताय सर्वभूतहितायच । वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियाणांचसंयमः ॥ ५७ ॥ ईदृशायसुरश्रेष्ठ ! यद्दत्तंहितदक्षयम् । आमपात्रेयथान्न्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ॥ ५८ ॥ विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंविनश्यति । एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमन्नंमहींतिलान् ॥ ५९ ॥ अविद्वान्प्रतिगृह्णाति भस्मीभवतिकाष्ठवत् । यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिवहुश्रुतः ॥ ६० ॥ बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ।


और ब्राह्मण के धन को मार लेने से जो छिद्र नाम दोष लगता है वह नहीं मिटता ॥ ५४॥ यदि कोई उस छिद्र को छिपाता है तो भी वह छिपता नहीं । ब्राह्मण के धन से पुष्ट हुए अङ्गरूप साधन और सेना ॥५५॥ संग्राम में ऐसे लीन होजाते हैं जैसे रेत (वालू) में जल । हे इन्द्र ! कुलीन और दरिद्री वेद पाठी ब्राह्मण को ॥५६॥ जो सन्तोषी, नम्र, और सब प्राणियों का हितकारी हो, जो वेद का अभ्यासी हो, तपस्वी हो और इन्द्रियों का जीतने वाला हो ॥ ५७ ॥ हे देवताओं में उत्तम इन्द्र ! जो ऐसे ब्राह्मण को दिया जाय वह दान अक्षय पुण्यवाला होता है । कच्चे मट्टी के पात्र में रक्खा दूध, दही, घी सहत ॥५८॥ जैसे पात्र की दुर्बलता से नष्ट होता है और वह पात्र भी नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार गौ, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, पृथिवी, तिल इन को ॥ ५९ ॥ जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेता है वह काष्ठ के समान भस्म होता है। जिस पुरुष के घर में मूर्ख ब्राह्मण हो और बहुश्रुत (पण्डित) दूर हो ॥६०॥ तो पण्डितको दान देवे किन्तु मूर्ख का उल्लंघन न माने। क्योंकि पण्डित को देने से हे इन्द्र !