भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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८ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

लोहचूर्णाश्मचूर्णंच विषञ्चजरयेन्नरः ॥ ४७ ॥
ब्रह्मस्वं त्रिषुलोकेषु कःपुमान्जरयिष्यति ।
मन्युप्रहरणाविप्रा राजानःशस्त्रपाणयः ॥ ४८ ॥
शस्त्रमेकाकिनंहन्ति ब्रह्ममन्युःकुलत्रयम् ।
मन्युप्रहरणाविप्राश्चक्रप्रहरणोहरिः ॥ ४९ ॥
चक्रात्तीव्रतरोमन्युस्तस्माद्विप्रन्नकोपयेत् ।
अग्निदग्धाःप्ररोहन्ति सूर्यदग्धास्तथैवच ॥ ५० ॥
मन्युदग्धस्यविप्राणामङ्कुरोनप्ररोहति ।
तेजसाग्निश्चदहति सूर्योदहतिरश्मिना ॥ ५१ ॥
राजादहतिदण्डेन विप्रोदहतिमन्युना ।
ब्रह्मस्वेनतुयत्सौख्यं देवस्वेनतुयारतिः ॥ ५२ ॥
तद्धनंकुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् ।
ब्रह्मस्वंब्रह्महत्याच दरिद्रस्यचयद्धनम् ॥ ५३ ॥
गुरुमित्रहिरण्यंच स्वर्गस्थमपिपीड़येत् ।


भी मनुष्य पचा सकता है ॥४७॥ पर तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो ब्राह्मण के धन को पचा सके। ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है, राजाओं के हाथ में शस्त्र है ॥ ४ ॥ यह हाथ का शस्त्र एक को ही मारता है और ब्राह्मण का शोक तीन कुल को नष्ट करता है । ब्राह्मणों का प्रहार (शस्त्र) क्रोध और विष्णु का प्रहार चक्र है ॥ ४९ ॥ चक्र से क्रोध बड़ा पैना है, इससे ब्राह्मण को कुपित न करे वा न करावे अग्नि और सूर्य के जले भी जम आते हैं ॥ ५० ॥ और ब्राह्मणों के क्रोध से. दग्ध हुओं का अङ्कुर भी नहीं जमता, अग्नि अपने तेज से और सूर्य अपनी किरणों से दग्ध करते हैं ॥ ५१ ॥ राजा दण्ड से और ब्राह्मण क्रोध से दग्ध करता है। ब्राह्मण के धन से जो सुख भोग होता, देवता के धन से जो रति (क्रीड़ा) होती है ॥ ५२ ॥ वह धन, कुल और आत्मा को नष्ट करता है । ब्राह्मण का धन ब्राह्मण की हत्या और दरिद्र का जो धन ॥५३॥ गुरु और मित्र का सुवर्ण, ये स्वर्ग में रहने वाले को भी पीड़ित करते हैं ।