भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥ ७

गोवीथींग्रामरथ्यांच श्मशानंगोपितंतथा ॥ ४१ ॥ संपीड्यनरकंयाति यावदाभूतसंप्लवम् । ऊषरेनिर्जलेस्थाने प्रास्तंसस्यंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥ जलाधारञ्चकर्त्तव्यो व्यासस्यवचनंयथा । पञ्चकन्यान्नृतेहन्ति दशहन्तिगवानृते ॥ ४३ ॥ शतमश्वान्नृतेहन्ति सहस्रंपुरुषानृते । हन्तिजातानजानांश्च हिरण्यार्थेनृतंवदन् ॥ ४४ ॥ सर्वंभूम्यनृतेहन्ति मास्मभूम्यनृतंवदीः । ब्रह्मस्वेनरतिंकुर्यात्प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥ ४५ ॥ अनौपयमभैषज्यं विषमेतद्धलाहलम् । नविषंविषमित्याहुर्ब्रह्मस्वंविषमुच्यते ॥ ४६ ॥ विषमेकाकिनंहन्ति ब्रह्मस्वंपुत्रपौत्रकम् ।

अंगुल भूमि की सीमा हरने से नष्ट हो जाता है-गोओं का मार्ग, ग्राम की गली, श्मशान और गोषित (रखाया हुआ खेत) ॥ ४१ ॥ इनके बिगाड़ने से प्रलय तक नरक में जाता है। ऊपर और जहां जल न हो वहां खेत न वोवे ॥४२॥ व्यास जी के वचन के अनुसार कृपादि जलाशय खेत भरने आदि के लिये क-रना चाहिये। कन्या के निमित्त झूठ बोलने में पांच को, गौ के निमित्त झूठ बोलने में दश को ॥ ४३ ॥ घोड़े के निमित्त मिथ्या बोलने में सौ को, पुरुष के निमित्त झूठ बोलने में हज़ार को, सुवर्ण के निमित्त झूठ बोलने में जो पैदा हुए हैं तथा जो पैदा होंगे उन सब को ॥ ४४ ॥ और पृथ्वी के निमित्त झूठ बोलने में सब को मारता है इससे पृथ्वी के निमित्त झूठ मत बोलो। चाहें प्राण कंठ में आजायं, तो भी ब्राह्मण के धन से प्रीति न करै अर्थात् लेने की इच्छा न करे ॥ ४५ ॥ यह ब्राह्मण का धन लेलेना हलाहल विष है, जिसकी औषधि वा चिकित्सा नहीं है। क्योंकि बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि विष, विष नहीं है किन्तु ब्राह्मण का धन मारलेना सर्वोपरि विष है ॥४६॥

क्योंकि विष एकको ही मारता है परन्तु ब्राह्मण का धन छीन लेना पुत्र पौत्रों को भी मारता है। लोहे तथा पत्थर का चूर्ण और विष इन को