भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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६ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥

यो न हिंस्यादहं ह्यात्मा भूतग्रामंश्चतुर्विधम् ॥ ३४ ॥
तस्य देहाद्वियुक्तस्य भयं नास्तिकदाचन ।
अन्यायेन हृता भूमिर्येर्नरैरपहारिता ॥ ३५ ॥
हरन्तो हारयन्तश्च हन्युस्ते सप्तमं कुलम् ।
हरते हारयेद्यस्तु मन्दबुद्धिस्तमोवृतः ॥ ३६ ॥
सबद्धो वारुणैः पाशैस्तिर्यग्योनौ पुजायते ।
अश्रुभिः पतितैस्तेषां दानानामपकीर्तनम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणस्य हृते क्षेत्रे हन्ति त्रिपुरुषंकुलम् ।
वापीकूपसहस्रेण अश्वमेधशतेन च ॥ ३८ ॥
गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ।
गामेकां स्वर्णमेकं वा भूमेरप्यर्द्धमंगुलम् ॥ ३६ ॥
हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् ।
हुतं दत्तं तपोऽधीतं यत्किंचिद्धर्मसंचितम् ॥ ४० ॥
अर्द्धांगुलस्य सीमायां हरणेन प्रणश्यति ।


कि चार प्रकार के भूत समुदाय में मैं एक ही आत्मा विद्यमान हूं ऐसे विचार से चार प्रकार (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज) के भूतों को दुःख नहीं देता ॥३४॥ देह से जुदे होने पर उस जीवात्मा को कभी भी भय नहीं है। जिन मनुष्यों ने अन्याय से पृथ्वी छीनी वा छिनवाई है ॥ ३५ ॥ वे दोनों छीनने और छिनवाने वाले अपने सात कुलों को नष्ट करते हैं। जो मन्द बुद्धि और अज्ञानी पृथिवी छीनते हुए की प्रेरणा करता है ॥ ३६ ॥ वह वरुण के फांसों में बंधा हुआ पशु आदि तिर्यग्योनि में पैदा होता है। जिनकी भूमि आदि छीनी गयी उनके आंसू पड़ने से दाता का दान भी नष्ट हो जाता है ॥ ३७ ॥ ब्राह्मण के खेत को जो छीन लेता है उसकी तीन पीढ़ी नष्ट होती हैं। हजार बावड़ी तथा कूपों के बनाने से, सौ अश्वमेध यज्ञ करने से ॥ ३८ ॥ तथा एक करोड़ गौओं के देने से भी पृथ्वी को हरने वाला शुद्ध नहीं होता। एक गौ एक सोना (असरफी) और पृथ्वी का आध अंगुल इनके ॥ ३९ ॥ हरनेने से प्रलय तक नरक में जाता है। होम, दान, तप, वेद का पढ़ना और जो कुछ पुण्य धर्म से संचित किया है वह सब ॥ ४० ॥ आधा