अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावार्थसहिता ॥ ५
गवांशतसहस्राणां हन्ताभवतिदुष्कृती ॥ २७ ॥
स्वदत्तांपरदत्तांवा योहरेतवसुन्धराम् ।
श्वविष्ठायांक्रमिर्भूत्वा पितृभिःसहपच्यते ॥ २८ ॥
आक्षेप्ताचानुमन्ताच तमेवनरकंव्रजेत् ।
भूमिदोभूमिहर्ताच नापरंपुण्यपापयोः ॥ २९ ॥
ऊर्ध्वंचाधोवतिष्ठेत यावदाभूतसंप्लवम् ।
अग्नेरपत्यंप्रथमंसुवर्णं भूर्वैष्णवीसूर्यसुताश्चगावः ॥३०॥
लोकास्त्रयस्तेनभवन्तिदत्ता यःकाञ्चनंगांचमहींचदद्यात् ।
षडशीतिसहस्राणां योजनानांवसुन्धरा ॥ ३१ ॥
स्वयंदत्तातुसर्वत्र सर्वकामप्रदायिनी ।
भूमिंयःप्रतिगृह्णाति भूमिंयश्चप्रयच्छति ॥ ३२ ॥
उभौतौपुण्यकर्माणौ नियतंस्वर्गगामिनौ ।
सर्वेषामेवदानानामेकजन्मानुगंफलम् ॥ ३३ ॥
हाटकक्षितिगौरीणां सप्तजन्मानुगंफलम् ।
लक्ष गौओं को मारने वाला होता है ॥२७॥ जो पुरुष अपनी या पराई दी हुई पृथ्वी को छीन लेता है वह कुत्ते की विष्ठा में कीड़ा होकर पितरों सहित पकाया जाता है ॥ २८ ॥ आक्षेप करने और अनुमति देने वाला एक ही नरक में जाते हैं । पृथ्वी का दाता और पृथ्वी का हरने वाला अपने २ पुण्य वा पाप से ॥ २९ ॥ क्रम से स्वर्ग में वा नरक में प्रलय पर्यन्त ठहरते हैं। अग्नि का प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी विष्णु की पत्नी है और सूर्य की पुत्री गौ है॥३०॥जो पुरुष सुवर्ण गौ और पृथ्वी को दान में देता है उस ने मानो तीनों लोक दिये। छ्यासी हजार योजन पृथिवी का विस्तार है ॥३१॥ उस को जिस ने स्वयं दिया है वह पृथ्वी उसकी सब कामना पूरण करती है। पृथ्वी का दान जो लेता है और जो पृथ्वी को देता है॥३२॥ वे दोनों पुण्यात्मा निरन्तर स्वर्ग में जाते हैं। अन्य सब दानों का फल एक ही जन्म में मिलता है ॥ ३३ ॥ सुवर्ण, पृथ्वी, गौ, इनका फल सात जन्म तक मिलता है। जो पुरुष यह समझता हुआ
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