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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

६ | बृहस्पतिस्मृतिः ॥

यो न हिंस्यादहं ह्यात्मा भूतग्रामंश्चतुर्विधम् ॥ ३४ ॥
तस्य देहाद्वियुक्तस्य भयं नास्तिकदाचन ।
अन्यायेन हृता भूमिर्येर्नरैरपहारिता ॥ ३५ ॥
हरन्तो हारयन्तश्च हन्युस्ते सप्तमं कुलम् ।
हरते हारयेद्यस्तु मन्दबुद्धिस्तमोवृतः ॥ ३६ ॥
सबद्धो वारुणैः पाशैस्तिर्यग्योनौ पुजायते ।
अश्रुभिः पतितैस्तेषां दानानामपकीर्तनम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणस्य हृते क्षेत्रे हन्ति त्रिपुरुषंकुलम् ।
वापीकूपसहस्रेण अश्वमेधशतेन च ॥ ३८ ॥
गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ।
गामेकां स्वर्णमेकं वा भूमेरप्यर्द्धमंगुलम् ॥ ३६ ॥
हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् ।
हुतं दत्तं तपोऽधीतं यत्किंचिद्धर्मसंचितम् ॥ ४० ॥
अर्द्धांगुलस्य सीमायां हरणेन प्रणश्यति ।


कि चार प्रकार के भूत समुदाय में मैं एक ही आत्मा विद्यमान हूं ऐसे विचार से चार प्रकार (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज) के भूतों को दुःख नहीं देता ॥३४॥ देह से जुदे होने पर उस जीवात्मा को कभी भी भय नहीं है। जिन मनुष्यों ने अन्याय से पृथ्वी छीनी वा छिनवाई है ॥ ३५ ॥ वे दोनों छीनने और छिनवाने वाले अपने सात कुलों को नष्ट करते हैं। जो मन्द बुद्धि और अज्ञानी पृथिवी छीनते हुए की प्रेरणा करता है ॥ ३६ ॥ वह वरुण के फांसों में बंधा हुआ पशु आदि तिर्यग्योनि में पैदा होता है। जिनकी भूमि आदि छीनी गयी उनके आंसू पड़ने से दाता का दान भी नष्ट हो जाता है ॥ ३७ ॥ ब्राह्मण के खेत को जो छीन लेता है उसकी तीन पीढ़ी नष्ट होती हैं। हजार बावड़ी तथा कूपों के बनाने से, सौ अश्वमेध यज्ञ करने से ॥ ३८ ॥ तथा एक करोड़ गौओं के देने से भी पृथ्वी को हरने वाला शुद्ध नहीं होता। एक गौ एक सोना (असरफी) और पृथ्वी का आध अंगुल इनके ॥ ३९ ॥ हरनेने से प्रलय तक नरक में जाता है। होम, दान, तप, वेद का पढ़ना और जो कुछ पुण्य धर्म से संचित किया है वह सब ॥ ४० ॥ आधा

भाषार्थसंहिता ॥ ७

गोवीथींग्रामरथ्यांच श्मशानंगोपितंतथा ॥ ४१ ॥ संपीड्यनरकंयाति यावदाभूतसंप्लवम् । ऊषरेनिर्जलेस्थाने प्रास्तंसस्यंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥ जलाधारञ्चकर्त्तव्यो व्यासस्यवचनंयथा । पञ्चकन्यान्नृतेहन्ति दशहन्तिगवानृते ॥ ४३ ॥ शतमश्वान्नृतेहन्ति सहस्रंपुरुषानृते । हन्तिजातानजानांश्च हिरण्यार्थेनृतंवदन् ॥ ४४ ॥ सर्वंभूम्यनृतेहन्ति मास्मभूम्यनृतंवदीः । ब्रह्मस्वेनरतिंकुर्यात्प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥ ४५ ॥ अनौपयमभैषज्यं विषमेतद्धलाहलम् । नविषंविषमित्याहुर्ब्रह्मस्वंविषमुच्यते ॥ ४६ ॥ विषमेकाकिनंहन्ति ब्रह्मस्वंपुत्रपौत्रकम् ।

अंगुल भूमि की सीमा हरने से नष्ट हो जाता है-गोओं का मार्ग, ग्राम की गली, श्मशान और गोषित (रखाया हुआ खेत) ॥ ४१ ॥ इनके बिगाड़ने से प्रलय तक नरक में जाता है। ऊपर और जहां जल न हो वहां खेत न वोवे ॥४२॥ व्यास जी के वचन के अनुसार कृपादि जलाशय खेत भरने आदि के लिये क-रना चाहिये। कन्या के निमित्त झूठ बोलने में पांच को, गौ के निमित्त झूठ बोलने में दश को ॥ ४३ ॥ घोड़े के निमित्त मिथ्या बोलने में सौ को, पुरुष के निमित्त झूठ बोलने में हज़ार को, सुवर्ण के निमित्त झूठ बोलने में जो पैदा हुए हैं तथा जो पैदा होंगे उन सब को ॥ ४४ ॥ और पृथ्वी के निमित्त झूठ बोलने में सब को मारता है इससे पृथ्वी के निमित्त झूठ मत बोलो। चाहें प्राण कंठ में आजायं, तो भी ब्राह्मण के धन से प्रीति न करै अर्थात् लेने की इच्छा न करे ॥ ४५ ॥ यह ब्राह्मण का धन लेलेना हलाहल विष है, जिसकी औषधि वा चिकित्सा नहीं है। क्योंकि बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि विष, विष नहीं है किन्तु ब्राह्मण का धन मारलेना सर्वोपरि विष है ॥४६॥

क्योंकि विष एकको ही मारता है परन्तु ब्राह्मण का धन छीन लेना पुत्र पौत्रों को भी मारता है। लोहे तथा पत्थर का चूर्ण और विष इन को

८ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

लोहचूर्णाश्मचूर्णंच विषञ्चजरयेन्नरः ॥ ४७ ॥
ब्रह्मस्वं त्रिषुलोकेषु कःपुमान्जरयिष्यति ।
मन्युप्रहरणाविप्रा राजानःशस्त्रपाणयः ॥ ४८ ॥
शस्त्रमेकाकिनंहन्ति ब्रह्ममन्युःकुलत्रयम् ।
मन्युप्रहरणाविप्राश्चक्रप्रहरणोहरिः ॥ ४९ ॥
चक्रात्तीव्रतरोमन्युस्तस्माद्विप्रन्नकोपयेत् ।
अग्निदग्धाःप्ररोहन्ति सूर्यदग्धास्तथैवच ॥ ५० ॥
मन्युदग्धस्यविप्राणामङ्कुरोनप्ररोहति ।
तेजसाग्निश्चदहति सूर्योदहतिरश्मिना ॥ ५१ ॥
राजादहतिदण्डेन विप्रोदहतिमन्युना ।
ब्रह्मस्वेनतुयत्सौख्यं देवस्वेनतुयारतिः ॥ ५२ ॥
तद्धनंकुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् ।
ब्रह्मस्वंब्रह्महत्याच दरिद्रस्यचयद्धनम् ॥ ५३ ॥
गुरुमित्रहिरण्यंच स्वर्गस्थमपिपीड़येत् ।


भी मनुष्य पचा सकता है ॥४७॥ पर तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो ब्राह्मण के धन को पचा सके। ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है, राजाओं के हाथ में शस्त्र है ॥ ४ ॥ यह हाथ का शस्त्र एक को ही मारता है और ब्राह्मण का शोक तीन कुल को नष्ट करता है । ब्राह्मणों का प्रहार (शस्त्र) क्रोध और विष्णु का प्रहार चक्र है ॥ ४९ ॥ चक्र से क्रोध बड़ा पैना है, इससे ब्राह्मण को कुपित न करे वा न करावे अग्नि और सूर्य के जले भी जम आते हैं ॥ ५० ॥ और ब्राह्मणों के क्रोध से. दग्ध हुओं का अङ्कुर भी नहीं जमता, अग्नि अपने तेज से और सूर्य अपनी किरणों से दग्ध करते हैं ॥ ५१ ॥ राजा दण्ड से और ब्राह्मण क्रोध से दग्ध करता है। ब्राह्मण के धन से जो सुख भोग होता, देवता के धन से जो रति (क्रीड़ा) होती है ॥ ५२ ॥ वह धन, कुल और आत्मा को नष्ट करता है । ब्राह्मण का धन ब्राह्मण की हत्या और दरिद्र का जो धन ॥५३॥ गुरु और मित्र का सुवर्ण, ये स्वर्ग में रहने वाले को भी पीड़ित करते हैं ।

भाषाअर्थसहिता ॥

ब्रह्मस्वेनतुयच्छिद्रं तच्छिद्रंनप्ररोहति ॥ ५४ ॥ प्रच्छादयतितच्छिद्रमन्यत्रतुविसर्पति । ब्रह्मस्वेनतुपुष्टानिसाधनानिबलानिच ॥ ५५ ॥ संग्रामेतानिल्लीयन्ते सिकतासुयथोदकम् । श्रोत्रियायकुलीनाय दरिद्रायचवासव ! ॥ ५६ ॥ संतुष्टायविनीताय सर्वभूतहितायच । वेदाभ्यासस्तपोज्ञानमिन्द्रियाणांचसंयमः ॥ ५७ ॥ ईदृशायसुरश्रेष्ठ ! यद्दत्तंहितदक्षयम् । आमपात्रेयथान्न्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ॥ ५८ ॥ विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंविनश्यति । एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमन्नंमहींतिलान् ॥ ५९ ॥ अविद्वान्प्रतिगृह्णाति भस्मीभवतिकाष्ठवत् । यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिवहुश्रुतः ॥ ६० ॥ बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ।


और ब्राह्मण के धन को मार लेने से जो छिद्र नाम दोष लगता है वह नहीं मिटता ॥ ५४॥ यदि कोई उस छिद्र को छिपाता है तो भी वह छिपता नहीं । ब्राह्मण के धन से पुष्ट हुए अङ्गरूप साधन और सेना ॥५५॥ संग्राम में ऐसे लीन होजाते हैं जैसे रेत (वालू) में जल । हे इन्द्र ! कुलीन और दरिद्री वेद पाठी ब्राह्मण को ॥५६॥ जो सन्तोषी, नम्र, और सब प्राणियों का हितकारी हो, जो वेद का अभ्यासी हो, तपस्वी हो और इन्द्रियों का जीतने वाला हो ॥ ५७ ॥ हे देवताओं में उत्तम इन्द्र ! जो ऐसे ब्राह्मण को दिया जाय वह दान अक्षय पुण्यवाला होता है । कच्चे मट्टी के पात्र में रक्खा दूध, दही, घी सहत ॥५८॥ जैसे पात्र की दुर्बलता से नष्ट होता है और वह पात्र भी नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार गौ, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, पृथिवी, तिल इन को ॥ ५९ ॥ जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेता है वह काष्ठ के समान भस्म होता है। जिस पुरुष के घर में मूर्ख ब्राह्मण हो और बहुश्रुत (पण्डित) दूर हो ॥६०॥ तो पण्डितको दान देवे किन्तु मूर्ख का उल्लंघन न माने। क्योंकि पण्डित को देने से हे इन्द्र !

१७ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

कुलंतारयतेधीरः सप्तसप्तचवासव ! ॥ ६१ ॥ यस्तडागंनवं कुर्यात्पुराणंवापिखानयेत् । ससर्वंकुलमुद्धृत्य स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ६२ ॥ वापीकूपतडागानि उद्यानोपवनानिच । पुनःसंस्कारकर्ताच लभतेमौलिकंफलम् ॥ ६३ ॥ निदाघकालेपानीयं यस्यतिष्ठतिवासव ! । सदुर्गंविषमंकृत्स्नं नकदाचिदवाप्नुयात् ॥ ६४ ॥ एकाहंतुस्थितंतोयं पृथिव्यांराजसत्तम ! । कुलानितारयेत्तस्य सप्तसप्तपराण्यपि ॥ ६५ ॥ दीपालोकप्रदानेन वपुष्मान्सभवेन्नरः । प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिंमेधांचविन्दति ॥ ६६ ॥ कृत्वापिपापकर्माणि योदद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणायविशेषेण नसपापेनलिप्यते ॥ ६७ ॥ भूमिर्गावस्तथादाराः प्रसह्यह्रियतेयदा । नचावेदयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६८ ॥


वह अपने इक्कीस कुलों को तारता है ॥ ६१ ॥ जो पुरुष नया तालाब बनवावे वा पुराने को खुदवावे, वह सब कुल का उद्धार करके स्वर्ग में पूजा जाता है ॥६२॥ वावड़ी, कूप, तड़ाग, बाग, और उपवन ( छोटा बगीचा ) इन का जो फिर संस्कार ( मरम्मत ) करता कराता है वह नये बनाने के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ ग्रीष्म ऋतुकाल में जिस के यहां जल रहता है वह कठोर विषम दुःख को कभी नहीं भोगता है ॥ ६४ ॥ जिस की खोदी हुई पृथिवी में एक दिन भी जल ठहरता है, हे राजाओं में उत्तम इन्द्र ! उस के अगले पिछले सात २ कुलों को तारता है ॥ ६५ ॥ दीपक के देने से सुन्दर शरीर वाला मनुष्य होता है और दर्शनीय वस्तु दान से स्मृति और बुद्धि को प्राप्त होता है॥६६॥

निन्दित पाप कर्म करके भी जो अभ्यागत वा भिक्षुक को और विशेष कर ब्राह्मण को अन्न देता है, वह पाप से दूषित नहीं होता ॥ ६७ ॥ जो पुरुष बल पूर्वक पृथिवी, गो और स्त्री इन को बिन कहे हर लेता है उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६८ ॥

भाषार्थसहिता ॥ १९

निवेदितञ्चराजानै ब्राह्मणैर्मन्युपीडितैः ।
ननिवारयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६९ ॥
उपस्थितेविवाहेच यज्ञेदानेचवासव ! ।
मोहात्करोतिविघ्नंयः समृतोजायतेकृमिः ॥ ७० ॥
धनंफलतिदानेन जीवितंजीवरक्षणात् ।
रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते ॥ ७१ ॥
फलमूलाresource/शनात्पूजां स्वर्गस्सत्येनलभ्यते ।
प्रायोपवेशनाद्राज्यं सर्वंचसुखमश्नुते ॥ ७२ ॥
गवाढ्यःशक्रदीक्षायाः स्वर्गगामीतृणाशनः ।
स्त्रियस्त्रिपवणस्नायी वायुंपीत्वाक्रतुंलभेत् ॥ ७३ ॥
नित्यस्नायीभवेदर्कं संध्येद्वेचजपन्द्विजः ।
नवं साधयतेराज्यं नाकपृष्ठमनाशके ॥ ७४ ॥
अग्निप्रवेशेनियतं ब्रह्मलोकेमहीयते ।


क्रोध से दुःखित पीड़ित ब्राह्मणों की प्रार्थना करने पर भी जो राजा उस हरने वाले को नहीं रोकता उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६९ ॥ हे इन्द्र ! विवाह, दान, यज्ञ इन के समय में जो मोह से विघ्न करता है वह मरने के अनन्तर कीड़ा होता है ॥ ७० ॥ दान से धन और जीवों की रक्षा करने से जीवन फलता (बढ़ता) है। और रूप, आरोग्य, ऐश्वर्य, ये जो हिंसा न करने के फल हैं, इन को भोगता है ॥ ७१ ॥ फल और मूल खाने से मनुष्य पूजा प्रतिष्ठा को और सत्य से स्वर्ग को प्राप्त होता है। और मरण के निमित्त तीर्थ आदि पर बैठने से राज्य और संपूर्ण सुखों को भोगता है ॥ ७२ ॥ हे इन्द्र ! दीक्षा का उपदेश लेने से मनुष्य गौओं से युक्त होता और जो तृणों को खाता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है। तीन काल में जो स्नान करता है वह स्त्रियों को प्राप्त होता है। और वायु भक्षण करता हुआ तप करने वाला यज्ञों के फल को प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥ जो मनुष्य नित्य स्नान करता और दोनों संध्याओं में सूर्य नारायण को जपता है वह नये राज्य और सदैव स्वर्गवास को प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ जो अग्नि में प्रवेश करता है वह ब्रह्मलोक में पूजा

१२ बृहस्पतिस्मृतिः ॥

रसनाप्रतिसंहारे पशून्पुत्रांश्चविन्दति ॥ ७५ ॥
नाकेचिरंसवसते उपवासीचयोभवेत् ।
सततंचैकशायी यः सलभेदीप्सितांगतिम् ॥ ७६ ॥
वीरासनंवीरशय्यां वीरस्थानमुपाश्रितः ।
अक्षय्यास्तस्यलोकाः स्युः सर्वकामा गमास्तथा ॥ ७७ ॥
उपवासंचदीक्षांच अभिषेकंचवासव ! ।
कृत्वाद्वानदशवर्षाणि वीरस्थानाद्विशिष्यते ॥ ७८ ॥
अधीत्यसर्ववेदान्वै सद्योदुःखात्प्रमुच्यते ।
पावनंचरतेधर्मं स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७९ ॥
बृहस्पतिमतंपुण्यं येपठन्तिद्विजातयः ।
चत्वारितेषांवर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम् ॥ ८० ॥
इति श्रीबृहस्पतिप्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥


जाता है, जो अपनी जिह्वा को वश में रखता है वह पशु और पुत्रों को प्राप्त होता है ॥ ७५ ॥ जो उपवास व्रत करता है वह चिरकाल तक स्वर्ग में वसता जो निरन्तर एक शय्या पर सोता अर्थात् एक ही स्त्री को भोगता है वह जिस गति को चाहता उसी को प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ जो वीरासन, वीर शय्या, और वीरस्थान का आश्रय लेता है उसके लिये सब लोक और सब काम अक्षय प्राप्त होते हैं ॥ ७७ ॥ उपवास, दीक्षा, और अभिषेक इनको जो बारह १२ वर्ष तक निरन्तर करता है वह वीरस्थान के फल से अधिक उत्तम फल पाता है ॥ ७८ ॥ सब वेदों को पढ़कर शीघ्र ही दुःख से छूटता, पवित्र धर्म करता और स्वर्ग लोक में पुजता है ॥ ७९ ॥ बृहस्पति के पवित्र मत को जो द्विजाती लोग पढ़ते हैं उनकी अवस्था, विद्या, यश, और बल, ये चारों बढ़ते हैं॥८०॥
यह बृहस्पति का रचा धर्मशास्त्र समाप्त हुआ ॥ १० ॥


श्रीगणेशायनमः ॥

अथ पाराशरस्मृतिप्रारम्भः

अथातोहिमशैलाग्रे देवदारुवनालये ।
व्यासमेकाग्रमासीनमपृच्छन्नृषयःपुरा ॥ १ ॥
मानुषाणां हितंधर्मं वर्तमानेकलौयुगे ।
शौचाचारंयथावच्च वदसत्यवतीसुत ! ॥ २ ॥
तच्छ्रुत्वाऋषिवाक्यंतु सशिष्योऽग्न्यर्कसन्निभः ।
प्रत्युवाचमहातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः ॥ ३ ॥
नचाहंसर्वतत्वज्ञः कथंधर्मंवदाम्यहम् ।
अस्मत्पितैवप्रष्टव्य इतिव्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥
ततस्तेऋषयःसर्वे धर्मतत्त्वार्थकाङ्क्षिणः ।
ऋषिंव्यासं पुरस्कृत्य गतावदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥
नानापुष्पलताकीर्णं फलपुष्पैरलङ्कृतम् ।


देवदारु वृक्षों के वन में हिमालय पर्वत के ऊपर एकाग्र बैठे हुए व्यास जी से पूर्वकाल में ऋषियों ने पूछा ॥ १ ॥ हे सत्यवती के पुत्र व्यासजी ! वर्तमान कलियुग में मनुष्यों का हितकारी धर्म शौच और आचार हमसे कहो ॥२॥
उक्त ऋषियों के वाक्य को सुनकर शिष्यों सहित अग्नि और सूर्य के तुल्य बड़े तेज वाले श्रुति और स्मृति में चतुर व्यासजी ऋषियों के प्रति बोले ॥ ३ ॥ कि हम सब तत्वों को नहीं जानते तब कैसे धर्म को कहें । हमारे पिता को ही यह विषय पूछौ यह पराशर के पुत्र व्यास ने कहा ॥४॥ तिसके अनन्तर धर्म के तत्त्व को चाहते हुए वे सब ऋषि लोग व्यास ऋषि को आगे लेकर बदरिकाश्रम ( बद्रीनारायण ) को गये ॥ ५ ॥ जो अनेक प्रकार के पुष्प लताओं

२ पाराशरस्मृतिः ॥

नदीप्रस्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥ ६ ॥
मृगपक्षिनिनादाढ्यं देवतायतनावृतम् ।
यक्षगन्धर्वसिद्धैश्च नृत्यगीतैरलंस्कृतम् ॥ ७ ॥
तस्मिन्नृषिसभामध्ये शक्तिपुत्रंपराशरम् ।
सुखासीनंमहातेजामुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८ ॥
कृताञ्जलिपुटोभूत्वा व्यासस्तुऋषिभिःसह ।
प्रदक्षिणाभिवादैश्च स्तुतिभिःसमपूजयत् ॥ ९ ॥
अथसन्तुष्टहृदयः पराशरमहामुनिः ।
आहसुस्वागतंब्रूहीत्यासीनोमुनिपुंगवः ॥ १० ॥
व्यासःसुस्वागतंयेच ऋषयश्चसमन्ततः ।
कुशलंसम्यगित्युक्त्वा व्यासःपृच्छत्यनन्तरम् ॥
यदिजानासिमेभक्तिं स्नेहाद्वाभक्तवत्सल ! ॥ ११ ॥
धर्मंकथयमेतात ! अनुग्राह्योह्यहंतव ।
श्रुतामेमानवाधर्मा वासिष्ठाःकाश्यपास्तथा ॥ १२ ॥
गार्गीयागौतमीयाश्च तथाचौशनसाःस्मृताः ॥


के युक्त, फल फूलों के शोभायमान नदियों तथा झरनों से युक्त, पवित्र तीर्थों से जिस की शोभा है ॥ ६ ॥ मृग तथा पक्षियों के सुहावने शब्दों से युक्त, जिस में देवालय विद्यमान हैं, और जो यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, तथा अप्सरादि के नृत्य और गीतों से शोभा है ॥ ७ ॥ ऐसे बदरिकाश्रम में ऋषियों की सभा के बीच सुखपूर्वक बैठे तथा बड़े २ नामी अनेक मुनीश्वर जिन के चारों ओर बैठे हैं ऐसे शक्ति के पुत्र पाराशर का ॥८॥ ऋषियों सहित बड़े तेजस्वी व्यास जी ने हाथ जोड़ कर परिक्रमा अभिवादन और स्तुतियों से पूजन किया॥९॥ इस के अनन्तर मन से संतुष्ट हुए मुनियों में उत्तम पराशर महामुनि व्यास जी से बोले कि तुम भली प्रकार स्वागत ( आनन्द से आना ) कहो ॥ १० ॥ तब व्यास जी तथा अन्य ऋषियों ने कुशल पूर्वक आना कह कर पीछे व्यास जी ने यह पूछा कि हे भक्तवत्सल ! जो आप मेरी भक्ति को जानते हो कृपा से वा स्नेह से ॥ ११ ॥ हे पितः मुझ से धर्म कहिये क्योंकि मैं आप के अनुग्रह करने योग्य हूं—मैंने मनु, वशिष्ठ, कश्यप, ॥ १२ ॥ गर्ग, गौतम, उशना,

भाषार्थसंहिता ॥ ३

अत्रेर्विष्णोश्चसांवर्ता दाक्षादाङ्गिरसास्तथा ॥ १३ ॥ शातातपाञ्चहारीता याज्ञवल्क्यकृताश्चये । आपस्तम्बकृताधर्माः शंखस्यलिखितस्यच ॥ १४ ॥ कात्यायनकृताश्चैव तथाप्राचेतसान्मुनेः । श्रुताह्येतेभवत्प्रोक्ताः श्रौतार्थामेनविस्मृताः ॥ १५ ॥ अस्मिन्मन्वन्तरेधर्माः कृतत्रेतादिकेयुगे । सर्वेधर्माःकृतेजाताः सर्वेनष्टाःकलौयुगे ॥ १६ ॥ चातुर्वर्ण्यसमाचारं किंचित्साधारणंवद । चतुर्णामपिवर्णानां कर्त्तव्यंधर्मकोविदैः ॥ १७ ॥ ब्रूहिधर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्मंस्थूलञ्चविस्तरात् । व्यासवाक्यावसानेतु मुनिमुख्यःपराशरः ॥ १८ ॥ धर्मस्यनिर्णयंप्राह सूक्ष्मंस्थूलञ्चविस्तरात् । शृणुपुत्रप्रवक्ष्यामि शृण्वन्तुमुनयस्तथा । कल्पेकल्पे क्षयोत्पत्तौ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ २० ॥ श्रुतिस्मृतिसदाचार निर्णेतारश्चसर्वदा ।


अत्रि, विष्णु, संवर्त, दक्ष, अंगिरा, ॥ १३ ॥ शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, ॥ १४ ॥ कात्यायन प्रचेता इन सब ऋषि मुनियों के कहे बनाये धर्मशास्त्र मैंने सुने हैं तथा आप के कहे वेद के अर्थ भी हम ने सुने और उन को हम भूले भी नहीं हैं ॥ १५ ॥ इस मन्वन्तर तथा कृत त्रेता आदि युगों में जो धर्म किये गये थे वे सब कलियुग में नष्ट हो गये ॥ १६ ॥ धर्म का मर्म जानने वालों को जो चारो वर्णों को कर्त्तव्य है वह चारों वर्णों का किंचित्साधारण आचार कहिये ॥ १७ ॥ हे धर्म के स्वरूप को जानने वाले ! सूक्ष्म और स्थूल आचार को विस्तार से कहिये । इस प्रकार व्यास जी के वचनों के पूर्ण होने पर मुनियों में मुख्य पराशर जी ने ॥ १८ ॥ सूक्ष्म और स्थूल धर्म का निर्णय विस्तार से कहा ॥ १९ ॥ हे पुत्र ! व्यास जी तथा अन्य मुनियो ! तुम सुनो कल्प २ में प्रलय तथा सृष्टि होने पर ब्रह्मा विष्णु और शिव ये तीनों ॥ २० ॥ श्रुति, स्मृति, और सदाचार के निर्णय करने वाले

४ | पाराशरस्मृतिः ॥

न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदस्मर्त्ता चतुर्मुखः ॥ २१ ॥
तथैव धर्मान्स्मरति मनुः कल्पान्तरान्तरे ।
अन्ये कृतयुगे धर्मा स्त्रेतायां द्वापरे परे ॥ २२ ॥
अन्ये कलियुगे नॄणां युगरूपाऽनुसारतः ।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ॥ २३
द्वापरे यज्ञमेवाहु र्दानमेकं कलौ युगे ।
कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः ॥ २४ ॥
द्वापरे शंखलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ।
त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् ॥ २५ ॥
द्वापरे कुलमेकन्तु कर्त्तारं तु कलौ युगे ।
कृते संभाषणादेव त्रेतायां चैव दर्शनात् ॥ २६ ॥
द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ।
कृते तात्क्षणिकः शापस्त्रेतायां दशभिर्दिनैः ॥ २७ ॥


हैं। परन्तु वेद का बनाने वाला कोई नहीं है (इसी से वेद अपौरुषेय कहाता है) किन्तु चतुर्मुख ब्रह्मा जी पूर्व कल्प के अभ्यास किये वेद का सर्गारम्भ में स्मरण करने वाले हैं ॥२१॥ उसी प्रकार मनु जी कल्प २ में तथा प्रत्येक मन्वन्तर में धर्मों का स्मरण करते हैं। सतयुग, त्रेता, और द्वापर में मनुष्यों का धर्म भिन्न २ हो जाता बदलता रहता है ॥२२॥ युग के अनुसार कलियुग में अन्य धर्म हो जाता है। सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, ॥२३॥ द्वापर में यज्ञ और कलियुग में एक दान को ही मुख्य कहते हैं (इसी बात को चाहे यों कहो वा मानो कि तप ज्ञान यज्ञ और दान ये धर्म के चार पग हैं उन में से सत्युगी तप को, त्रेतायुगी ज्ञान को, द्वापरयुगी यज्ञ को और कलियुगी धर्मात्मा दान को मुख्य कर्त्तव्य मानते हैं) सतयुग में मनु के कहे त्रेता में गौतम के कहे धर्म विशेष कर चल सकते हैं ॥२४॥ द्वापर में शंख और लिखित के तथा कलियुग में पराशर के कहे धर्म मानने उचित हैं। सतयुग में धर्महीन देश को और त्रेता में धर्मविरोधी ग्राम को ॥२५॥ द्वापर में धर्म विरोधी कुल को और कलियुग में अधर्म करने वाले को त्याग दो और सतयुग में अधर्मी के साथ संभाषण करने से, त्रेता में उस के देखने से ॥२६॥ द्वापर में अन्न लेकर और कलियुग में कर्म करने से पतित होता है। सतयुग में उसी समय और त्रेता में दशदिन में शाप लगता ॥२७॥

भाषार्थसहिता ॥ ५

द्वापरेचैकमासेन कलौसंवत्सरेणतु ।
अभिगम्यकृतेदानं त्रेतास्वाहूयदीयते ॥ २८ ॥
द्वापरेयाचमानाय सेवयादीयतेकलौ ।
अभिगम्योत्तमंदानमाहूयैवतुमध्यमम् ॥ २९ ॥
अधमंयाच्यमानंस्यात् सेवादानन्तुनिष्फलम् ।
जितोधर्मोह्यधर्मेणसत्यंचैवानृतेनच ॥ ३० ॥
जिताश्चोरैश्चराजानः स्त्रीभिश्चपुरुषाजिताः ।
सीदन्तिचाऽग्निहोत्राणि गुरुपूजाप्रणश्यति ॥३१॥
कुमार्य्यश्चप्रसूयन्तेतस्मिन्कलियुगेसदा ।
कृतेत्वस्थिगताःप्राणास्त्रेतायांमांसमाश्रिताः ॥ ३२ ॥
द्वापरेरुधिरंयावत्कलौत्वन्नादिपुस्थिताः ।
युगेयुगेचयेधर्मास्तत्रतत्रचयेद्विजाः ॥ ३३ ॥
तेषांनिन्दानकर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः ।
युगेयुगेतुसामर्थ्यंशेषंमुनिविभाषितम् ॥ ३४ ॥

द्वापर में एक महीने में और कलियुग में एक वर्ष में शाप लगता है सतयुग में ब्राह्मण के समीप जाकर त्रेता में ब्राह्मण को अपने घर पर बुलाकर ॥२८॥ द्वापर में मांगने पर और कलियुग में जो सेवा करै उसे दान देते हैं अर्थात् दान के ये चार दर्जे हैं । ब्राह्मण के समीप जाकर दान देना सद्युगी सर्वो-त्तम है । समीप जाकर दिया जो दान है वह उत्तम और बुलाकर जो दिया वह मध्यम ॥ २९ ॥ मांगने वाले को जो दिया वह अधम और सेवक को जो दिया वह निष्फल है । कलियुग में अधर्म से धर्म, झूठ से सत्य ॥ ३० ॥ चोरों से राजा और स्त्रियों से पुरुष जीत लिये जाते अर्थात् दब जाते हैं । अग्निहोत्र बन्द हो जाते गुरु पूजा नष्ट हो जाती है ॥ ३१ ॥ कुमारी कन्याओं के सन्तान होते यह काम सदैव प्रत्येक कलियुग में होते हैं । सतयुग में प्राण हाड़ों में रहते त्रेता में मांस में ॥ ३२ ॥ द्वापर में रुधिर में और कलियुग में अन्न आदि में रहते हैं जिस २ युग में जो २ धर्म होते हैं और उस २ युग में जो द्विज हैं ॥३३॥ उनकी निन्दा न करनी चाहिये क्योंकि वे युग के अनुसारी हैं । और युग २ में जो सामर्थ्य मुनियों ने कहा है ॥ ३४ ॥

६ पराशरस्मृतिः ॥

पराशरेणचाप्युक्तं प्रायश्चित्तंविधीयते ।
अहमद्यैवतत्सर्वमनुस्मृत्यब्रवीमिवः ॥ ३५ ॥
चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वन्तुऋषिपुङ्गवाः ।
पराशरमतंपुण्यं पवित्रंपापनाशनम् ॥ ३६ ॥
चिन्तितंब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनायच ।
चतुर्णामपिवर्णाना माचारोधर्मपालकः ॥ ३७ ॥
आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मःपराङ्मुखः ।
षट्कर्माभिरतोनित्यं देवतातिथिपूजकः ।
हुतशेषन्तुभुञ्जानो ब्राह्मणोनावसीदति ॥ ३८ ॥
सन्ध्यास्नानंजपोहोमः स्वाध्यायोदेवतार्चनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच षट्कर्माणिदिनेदिने ॥ ३९ ॥
प्रियोवायदिवाद्द्वेष्यो मूर्खःपण्डितएववा ।
संप्राप्तोवैश्वदेवान्ते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥ ४० ॥
दूराञ्चोपगतंश्रान्तं वैश्वदेवउपस्थितम् ॥


पराशर जी ने भी जो कहा है उसके अनुसार प्रायश्चित्त का विधान किया जाता है । उस सब को अभी स्मरण करके हम कहते हैं ॥ ३५ ॥ हे ऋषियों में उत्तम पुरुषो चारो वर्णों का आचरण सुनो क्योंकि पराशर का मत पुण्य का उत्पादक पवित्र तथा पापों का नाशक है ॥ ३६ ॥ जो मत ब्राह्मणों के लिये तथा धर्म की स्थिति के लिये विचारा है-चारो वर्णों का जो आचार है वही धर्म का रक्षक जानो ॥ ३७ ॥ जिन का देह आचार से भ्रष्ट है उन से धर्म भी पराङ्मुख होता पीठ फेर लेता है । जो छः कर्मों में नित्य तत्पर है तथा देवता और अतिथि का पूजन करता है और जो होम करके शेष बचे अन्न को खाता है वह ब्राह्मण दुःखी नहीं होता ॥३८॥ सन्ध्या स्नान जप होम विधि पूर्वक वेदाध्ययन और देवताओं का पूजन अतिथि की सेवा तथा वैश्वदेव–ये छः कर्म प्रति दिन करे । सन्ध्या स्नान जप ये तीनों अङ्गाङ्गिरूप से एक हैं ॥ ३९ ॥ पियारा हो वा शत्रु हो मूर्ख हो वा पण्डित हो जो वैश्वदेव के अन्त में प्राप्त हो वह अतिथि स्वर्ग में पहुंचाने वाला है ॥४०॥ जो दूर से आया हो थक गया हो वैश्वदेव के समय उपस्थित हो उस को

भाषार्थसहिता ॥

अतिथिंतंविजानीयान्नातिथिःपूर्वमागतः ॥ ४१ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसाङ्गमिकंतथा ।
अनित्यंह्यागतोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ४२ ॥
अतिथिंतत्रसंप्राप्तं पूजयेत्स्वागतादिना ।
तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेनच ॥ ४३ ॥
श्रद्धयाचान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेणच ।
गच्छतंश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद्गृही ॥ ४४ ॥
अतिथिर्यस्यभग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्त्तते ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच ॥४५ ॥
काष्ठभारसहस्रेण घृतकुंभशतेनच ।
अतिथिर्यस्यभग्नाशस्तस्यहोमोनिरर्थकः ॥ ४६ ॥
सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेनिःक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रेचसुपात्रेच ह्युप्तंदत्तंननश्यति ॥ ४७ ॥
नपृच्छेद्गोत्रचरणे नस्वाध्यायंश्रुतंतथा ।
हृदयेकल्पयेद्देवं सर्वदेवमयोहिसः ॥ ४८ ॥


अतिथि जाने वैश्वदेव से पहिले आये ठहरे हुए को नहीं ॥ ४१ ॥ एक गांव में रहने वाले ब्राह्मण को तथा मेली ब्राह्मण को अतिथि कभी न माने जिस से नित्य जो न आवे उसे ही अतिथि कहा जाता है ॥४२॥ उस समय (वैश्वदेव में) आये अतिथि का (स्वागत) आदि से पूजन करे । तथा वैसे ही आसन देने-पग धोने ॥४३॥ श्रद्धा से अन्न देने प्रिय तथा मधुर प्रश्न और उत्तरों से जाते के पीछे चलने से गृहस्थी पुरुष अतिथिको प्रसन्न करै ॥४४॥ जिस के घर से निराश हो कर अतिथि चला जाता है उस के यहां पितर पन्द्रह वर्ष तक नहीं खाते ॥४५॥ काष्ठ के हजार बोझों से सौ घी के घड़ों से भी उसका होम वृथा है जिस के यहां से अतिथि निराश होकर लौट जाता है ॥४६॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे क्योंकि अच्छे खेत में बोया बीज और सुपात्र को दिया दान नष्ट नहीं होता ॥ ४७ ॥ गोत्र वा चरण ( नाम कठ कौथुमादि ) अक्षमज्ञ और वेदाध्ययन इनको भी न पूछे अपने हृदय में अतिथि को देवता समझे क्योंकि अतिथि सब देवताओं का रूप है ॥ ४८ ॥

८ पराशरस्मृतिः ॥

अपूर्वः सुव्रतो विप्रो ह्यपूर्वश्चातिथिस्तथा ।
वेदाभ्यासरतो नित्यं त्रयोऽपूर्वा दिनेदिने ॥ ४९ ॥

वैश्वदेवे तु संप्राप्ते भिक्षुके गृहमागते ।
उद्धृत्य वैश्वदेवार्थं भिक्षां दत्वा विसर्जयेत् ॥ ५० ॥

यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनावुभौ ।
तयोरन्नमदत्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ ५१ ॥

दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् ।
इच्छया च ततो दद्याद्विभवे सत्यवारितम् ॥ ५२ ॥

यतिहस्ते जलं दद्याद्भैक्षं दद्यात्पुनर्जलम् ।
तद्भैक्षं मेरुणातुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥ ५३ ॥

यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुंजरारोहमृद्धिमत् ।
ऐंद्रस्थानमुपासीत तस्मात्तं न विचारयेत् ॥ ५४ ॥

वैश्वदेवकृतं पापं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् ।
न हि भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥ ५५ ॥


अच्छे व्रत नियम वाला ब्राह्मण और ऐसा ही अतिथि और नित्य २ वेद का पढ़ने वाला ये तीनों प्रति दिन भी अपूर्व (नवीन) ही समझे जाते हैं ॥ ४९ ॥ वैश्वदेव के समय यदि भिक्षुक घर में आवे तो वैश्वदेव के लिये पृथक् अन्न निकाल कर भिक्षा देके विदा करे ॥ ५० ॥ यति संन्यासी और ब्रह्मचारी ये दोनों पक्के अन्न के अधिकारी हैं उन दोनों को बिना अन्न दिये जो भोजन करै वह चांद्रायण व्रत का प्रायश्चित्ती होता है ॥ ५१ ॥ संन्यासी और ब्रह्मचारियों को तीन खुराक तक भिक्षा देवे यदि धन होय तो अपनी इच्छा से और भी देवे ॥ ५२ ॥ पहिले संन्यासी के हाथ में जल दे फिर अन्न दे पीछे भोजनान्त में फिर जल देवे वह भिक्षा मेरु पर्वत के और वह जल समुद्र के समान दान है ॥ ५३ ॥ जिसके छत्र-घोड़ा और चढ़ने के लिये उत्तम हाथी है वह धनी इन्द्र के स्थान का भोग करता है तिससे संन्यासी के देने में वह भी विचार न करै ॥ ५४ ॥ संन्यासी का सत्कार अवश्य करै वैश्व देव के भूल जाने के दोष को भिक्षु दूर कर सकता है पर भिक्षु के लौट जाने से हुए पाप को वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता ॥ ५५ ॥

भाषार्थसहिता ॥

अकृत्वावैश्वदेवंतु भुञ्जतेयेद्विजाधमाः ।
सर्व्वतेनिष्फलाज्ञेयाः पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ ५६ ॥

वैश्वदेवविहीनाये आतिथ्येनबहिष्कृताः ।
सर्व्वतेनरकंयान्ति काकयोनिंव्रजन्तिच ॥ ५७ ॥

शिरोवेष्ट्यतुयोभुङ्क्ते दक्षिणाभिमुखस्तुयः ।
वामपादेकरंन्यस्य तद्वैरक्षांसिभुञ्जते ॥ ५८ ॥

यतयेकाञ्चनंदत्त्वा ताम्बूलंब्रह्मचारिणे ।
चोरेभ्योप्यभयंदत्त्वा दातापिनरकंव्रजेत् ॥ ५९ ॥

शुक्लवस्त्रंचयानंच ताम्बूलंधातुमेवच ।
प्रतिगृह्यकुलंहन्यात्प्रतिगृह्णातिर्यस्यच ॥ ६० ॥

चोरोवायदिचाण्डालः शत्रुर्व्वापिपितृघातकः ।
वैश्वदेवेतुसंप्राप्ते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥ ६१ ॥

नगृह्णाति॒तुयोविप्रो ह्यतिथिंवेदपारगम् ।
अददन्नान्नमात्रंतु भुक्त्वाभुङ्क्तेतुकिल्विषम् ॥ ६२ ॥


जो द्विजों में नीच पुरुष वैश्वदेव कर्म किये बिना भोजन करते हैं उनका सब जीवन निष्फल है और वे अशुद्ध नरक में पड़ते हैं ॥ ५६ ॥ जो वैश्वदेव से रहित हुए अतिथि का सत्कार नहीं करते वे सब नरक में जाते हैं तदनन्तर कौंवे की योनि को प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥ जो मनुष्य शिर में पगड़ी आदि बांध कर वा दक्षिण को मुख करके भोजन करता है तथा बांये पग पर हाथ रख कर खाता है उस अन्न को राक्षस खा जाते हैं ॥ ५८ ॥ संन्यासी को सुवर्ण ब्रह्मचारियों को पान और चोरों को अभय दान देकर दाता भी नरक में जाता है ॥ ५९ ॥ सफेद वस्त्र, सवारी, पान, और धातु इनका दान लेने वाला और देने वाला अपने कुल का नाश करता है ॥ ६० ॥ चोर हो वा चाण्डाल हो और चाहे पिता को मारने वाला शत्रु भी हो परन्तु वैश्वदेव के समय आया हो तो वह अतिथि स्वर्ग में ले जाने वाला है ॥ ६१ ॥ जो ब्राह्मण वेद का पार जानने वाले अतिथि का नहीं ग्रहण करता अर्थात् ऐसे अतिथि का पूजन नहीं करता वह अतिथि को नहीं दिये अन्न जल को खाकर पाप का भागी होता है ॥ ६२ ॥

१०

पराशरस्मृतिः ॥

ब्राह्मणस्यमुखंक्षेत्रं निरुदकमकण्टकम् ।
वापयेत्सर्वबीजानि साकृषिःसर्वकामिका ॥ ६३ ॥
सुक्षेत्रेवापयेद्बीजं सुपात्रेनिःक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रेचसुपात्रेच ह्युप्तंदत्तन्ननश्यति ॥ ६४ ॥
अव्रताह्यनधीयाना यत्रभैक्षचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ६५ ॥
क्षत्रियोहिप्रजारक्षन् शस्त्रपाणिःप्रचण्डवत् ।
निर्जित्यपरसैन्यानि क्षितिंधर्मेणपालयेत् ॥ ६६ ॥
नस्त्रीःकुलक्रमायाता भूषणोल्लिखिताऽपिवा ।
खङ्गेनाक्रम्यभुञ्जीत वीरभोग्यावसुन्धरा ॥ ६७ ॥
पुष्पं पुष्पंविचिन्वीत मूलच्छेदंनकारयेत् ।
मालाकारइवारामे नयथाङ्गारकारकः ॥ ६८ ॥
लाभकर्मतथारत्नं गवां च परिपालनम् ।


ब्राह्मण का मुख कांटे रहित और जल विहीन सर्वोत्तम खेत है उसी में सब बीज बोवे क्योंकि यही खेती सब कामनाओं को देने वाली है ॥६३॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे। अच्छे खेत में बोया अन्न और सुपात्र को दिया धन नष्ट नहीं होता॥६४॥ जिस ग्राम में व्रतों को न करते और वेद को न पढ़े हुए ब्राह्मण भिक्षा मांगते हैं उस ग्राम को राजा दण्ड दे क्योंकि वह ग्राम चोरों को भाग देता है ॥६५॥ क्रोधी के तुल्य शस्त्र को हाथ में लिये प्रजा की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय शत्रुओं की सेनाओं को जीत कर धर्मानुकूल प्रजा की पालना करे ॥६६॥ कदापि लक्ष्मी कुछ कुल परम्परा से नहीं आती और भूषणों से भी नहीं जानी जाती किन्तु अपने शस्त्रबल से शत्रुओं को दबा कर पृथ्वी को भोगे क्योंकि पृथ्वी शूरवीरों के भोगने योग्य है ॥ ६७ ॥ राजा को चाहिये कि जैसे माली बगीचे के वृक्षों की रक्षा रखता हुआ फूल २ तोड़ लेता है वैसे ही प्रजा की रक्षा करता हुआ राजा उस से धनादि लिया करे किन्तु कोयला बनाने वाला जैसे जड़ से वृक्षों को काट डालता है वैसे प्रजा की जड़ न बिगाड़े ॥ ६८ ॥ लाभ का काम, रत्नादि की परीक्षा तथा बेंचना, गौओं की अच्छी रक्षा, खेती क-

भावार्थसहित ॥ ११

कृषिकर्मचवाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥ ६९ ॥
शूद्राणांद्विजशुश्रूषा परमोधर्मउच्यते ।
अन्यथाकुरुतेकिंचित्तद्भवेत्तस्यनिष्फलम् ॥ ७० ॥
लवणंमधुतैलंच दधितक्रंघृतंपयः ।
नदुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात्सर्वेषुविक्रयम् ॥ ७१ ॥
विक्रीणन्मद्यमांसानि ह्यभक्ष्यस्यचभक्षणम् ।
कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रःपततितत्क्षणात् ॥ ७२ ॥
कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेनच ।
वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्यनरकंध्रुवम् ॥ ७३ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अतःपरंगृहस्थस्य धर्माचारंकलौयुगे ।
धर्मसाधारणंशक्यं चातुर्वर्ण्याश्रमागतम् ॥ १ ॥
संप्रवक्ष्याम्यहंपूर्वं पराशरवचोयथा ।
षट्कर्मसहितोविप्रः कृषिकर्माणिकारयेत् ॥२॥


रना व्यापार ये वैश्य की वृत्ति (जीविका) कही हैं ॥ ६९ ॥ और शूद्रों का परम धर्म द्विजों की सेवा करना कहा है । इस से भिन्न जो कुछ धर्मसम्बन्धी कृत्य शूद्र करता है वह उस का निष्फल है ॥ ७० ॥ लवण, सहत, तेल, दही, मठा, घी, और दूध ये शूद्रों के दूषित नहीं हैं इन को शूद्र सब जातियों में बेंचे ॥ ७१ ॥ मदिरा और मांस की बेचता, अभक्ष्य का भक्षण करता और गमन करने के अयोग्य ब्राह्मणी आदि स्त्री के संग गमन करके शूद्र उसी क्षण में पतित हो जाता है ॥ ७२ ॥ कपिला गौ का दूध पीने, ब्राह्मणी के संग गमन करने, और वेद के अक्षरों का विचार करने से शूद्र को निश्चय नरक होता है ॥ ७३ ॥

इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे १ अध्यायः ॥

इस के अनन्तर कलियुग में गृहस्थ का धर्म आचार और चारों वर्णों तथा आश्रमों का यथाशक्ति साधारण धर्म जो है ॥ १ ॥ उस को हम पहिले पराशर के वचनानुसार कहेंगे । छः कर्मों सहित ब्राह्मण खेती के काम भी करावे ॥२॥

१२ पराशरस्मृतिः ॥

क्षुधितंतृषितंश्रान्तं बलीवर्दंनयोजयेत् । हीनाङ्गंव्याधितंक्लीबं वृषंविप्रोनवाहयेत् ॥३॥ स्थिराङ्गंनीरुजंदृप्तं सुनर्दंषण्ढवर्जितम् । वाहयेद्दिवसस्यार्द्धं पश्चात्स्नानंसमाचरेत् ॥४॥ जपंदेवार्चनंहोमं स्वाध्यायंसाङ्गमभ्यसेत् । एकद्वित्रिचतुर्विप्रान् भोजयेत्स्नातकान्द्विजः ॥५॥ स्वयंकृष्टेनचाक्षेत्रेधान्यैश्चस्वयमर्जितैः । निर्वपेत्पञ्चयज्ञांश्च क्रतुदीक्षांचकारयेत् ॥६॥ तिलां रसान्नविक्रेया विक्रेयाधान्यतत्ससाः । विप्रस्यैवंविधावृत्तिस्तृणकाष्ठादिविक्रयः ॥७॥ ब्राह्मणस्तुकृषिंकृत्वामहादोषमवाप्नुयात् । अष्टागवंधर्म्यहलं षड्गवंवृत्तिलक्षणम् ॥८॥ चतुर्गवंनृशंसानां द्विगवंगोजिघांसिनाम् । द्विगवंवाहयेत्पादं मध्यान्हंतुचतुर्गवम् ॥६॥


ऐसे बैल को न जुतवावे जो भूखा प्यासा थका किसी अंग से हीन रोगी-और नपुंसक हो ॥३॥ जो स्थिरांग (जिस के अंग सब पुष्ट हों) रोग रहित-दृप्त खूब शब्द करता हो-जो बधिया न किया गया हो-ऐसे बैल को आधे दिन जुतवावे और पीछे स्नान करे ॥४॥ जप देवताओं की पूजा होम और छः अङ्गों सहित वेद का पाठ इन का अभ्यास करे और एक, दो, तीन, वा चार ब्राह्मणों (जो ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहाश्रम में आये हों उन्हें) को भोजन करावे ॥५॥ आप जोते खेत में और आप ही पैदा किये अन्नों से पंच यज्ञ करे और यज्ञ की दीक्षा भी करावे ॥६॥ तिल तथा छः रसों को न बेंचे। अन्न और जो अन्न के समान हैं उन को, और तृण, काठ आदि को बेचे। ब्राह्मण की यह जीविका वैश्यवृत्तियों में है ॥७॥ जो ब्राह्मण खेती करे तो महादोष को प्राप्त हो-आठ जिसमें बैल हों वह हल धर्म का है छः जिस में हों वह मध्यम जीविका के लिये है ॥८॥ चार जिस में बैल हों वह हिंसकों का है और जिस में दो बैल हों वह हल गोहत्यारे के समान है। दो बैल वाले हल को चौथाई दिन जोते चार बैल के हल को मध्यान्ह तक जोते॥९॥

भाषाधर्मसंहिता ॥ १३

षड्गवंतंत्रियामाहेऽष्टभिःपूर्णतुवाहयेत् । नयातिनरकेष्वेवं वर्त्तमानस्तुवैद्विजः ॥१०॥ दानंदद्याच्चवैतेषां प्रशस्तंस्वर्गसाधनम् । संवत्सरेणयत्पापं मत्स्यघातीसमाप्नुयात् ॥११॥ अयोमुखेनकाष्ठेन तदेकाहेनलाङ्गली । पाशकोमत्स्यघातीच व्याधःशाकुनिकस्तथा ॥ १२ ॥ अदाताकर्षकश्चैव पञ्चैतेसमभागिनः । कण्डनीपेषणीचुल्ही उदकुम्भीचमार्जनी ॥ १३ ॥ पञ्चसूनागृहस्थस्य अहून्यहन्निवर्तते । वैश्वदेवोवलिर्भिक्षा गोग्रासोहन्तकारकः ॥ १४ ॥ गृहस्थःप्रत्यहंकुर्यात्सूनादोषैर्नलिप्यते । वृक्षान्छित्वामहींभित्त्वा हत्वाचकृमिकोटकान् ॥ १५ ॥ कर्षकःखलुयज्ञेन सर्वपापैःप्रमुच्यते ।

छः बैलों के हल को दिन के तीन पहर और आठ बैल के हल को सब दिन जोते ऐसे बर्तता हुआ द्विज नरक में नहीं जाता ॥१०॥ स्वर्ग का उत्तम साधन दान ब्राह्मणों को ही देवे। मच्छियों को मारने वाला एक वर्ष में जिस पाप का भागी होता है ॥११॥ लोहा है मुख में जिसके ऐसे काठ (हल) से हल वाला ब्राह्मण एक दिन में उस पापका भोगने वाला होता है । १-पाशक ( फांसी देके मारने वाला) २-मच्छियों का मारने वाला, ३-हरिणादि को मारने वाला बधिक ४-पक्षियों को पकड़ने वाला ॥ १२ ॥ तथा पांचवां जो दान न देवे और खेती करने वाला हो-ये पांचो एकही प्रकार के समान पाप भागी हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जल के घड़े, मार्जनी (बुहारी) ॥१३॥ ये पांच हत्या गृहस्थ पुरुष को नित्य २ लगती हैं। वैश्वदेव (देवयज्ञ) बलि (भूतयज्ञ) भिक्षा देना, गोग्रास, और हंतकार नाम अतिथियज्ञ ॥ १४ ॥ इन पांचों को जो गृहस्थी प्रति दिन करता है वह पूर्वोक्त पांच हत्याओं के दोष से लिप्त नहीं होता। वृक्षों को काटने, पृथ्वी के खोदने, कृमि और कीड़ों के मारने से जो पाप खेती में लगता है ॥ १५ ॥ खेती करने वाला यज्ञ करने से उन सब पापों से