अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७ बृहस्पतिस्मृतिः ॥
कुलंतारयतेधीरः सप्तसप्तचवासव ! ॥ ६१ ॥ यस्तडागंनवं कुर्यात्पुराणंवापिखानयेत् । ससर्वंकुलमुद्धृत्य स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ६२ ॥ वापीकूपतडागानि उद्यानोपवनानिच । पुनःसंस्कारकर्ताच लभतेमौलिकंफलम् ॥ ६३ ॥ निदाघकालेपानीयं यस्यतिष्ठतिवासव ! । सदुर्गंविषमंकृत्स्नं नकदाचिदवाप्नुयात् ॥ ६४ ॥ एकाहंतुस्थितंतोयं पृथिव्यांराजसत्तम ! । कुलानितारयेत्तस्य सप्तसप्तपराण्यपि ॥ ६५ ॥ दीपालोकप्रदानेन वपुष्मान्सभवेन्नरः । प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिंमेधांचविन्दति ॥ ६६ ॥ कृत्वापिपापकर्माणि योदद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणायविशेषेण नसपापेनलिप्यते ॥ ६७ ॥ भूमिर्गावस्तथादाराः प्रसह्यह्रियतेयदा । नचावेदयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६८ ॥
वह अपने इक्कीस कुलों को तारता है ॥ ६१ ॥ जो पुरुष नया तालाब बनवावे वा पुराने को खुदवावे, वह सब कुल का उद्धार करके स्वर्ग में पूजा जाता है ॥६२॥ वावड़ी, कूप, तड़ाग, बाग, और उपवन ( छोटा बगीचा ) इन का जो फिर संस्कार ( मरम्मत ) करता कराता है वह नये बनाने के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ ग्रीष्म ऋतुकाल में जिस के यहां जल रहता है वह कठोर विषम दुःख को कभी नहीं भोगता है ॥ ६४ ॥ जिस की खोदी हुई पृथिवी में एक दिन भी जल ठहरता है, हे राजाओं में उत्तम इन्द्र ! उस के अगले पिछले सात २ कुलों को तारता है ॥ ६५ ॥ दीपक के देने से सुन्दर शरीर वाला मनुष्य होता है और दर्शनीय वस्तु दान से स्मृति और बुद्धि को प्राप्त होता है॥६६॥
निन्दित पाप कर्म करके भी जो अभ्यागत वा भिक्षुक को और विशेष कर ब्राह्मण को अन्न देता है, वह पाप से दूषित नहीं होता ॥ ६७ ॥ जो पुरुष बल पूर्वक पृथिवी, गो और स्त्री इन को बिन कहे हर लेता है उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६८ ॥