अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १९
निवेदितञ्चराजानै ब्राह्मणैर्मन्युपीडितैः ।
ननिवारयतेयस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ६९ ॥
उपस्थितेविवाहेच यज्ञेदानेचवासव ! ।
मोहात्करोतिविघ्नंयः समृतोजायतेकृमिः ॥ ७० ॥
धनंफलतिदानेन जीवितंजीवरक्षणात् ।
रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते ॥ ७१ ॥
फलमूलाresource/शनात्पूजां स्वर्गस्सत्येनलभ्यते ।
प्रायोपवेशनाद्राज्यं सर्वंचसुखमश्नुते ॥ ७२ ॥
गवाढ्यःशक्रदीक्षायाः स्वर्गगामीतृणाशनः ।
स्त्रियस्त्रिपवणस्नायी वायुंपीत्वाक्रतुंलभेत् ॥ ७३ ॥
नित्यस्नायीभवेदर्कं संध्येद्वेचजपन्द्विजः ।
नवं साधयतेराज्यं नाकपृष्ठमनाशके ॥ ७४ ॥
अग्निप्रवेशेनियतं ब्रह्मलोकेमहीयते ।
क्रोध से दुःखित पीड़ित ब्राह्मणों की प्रार्थना करने पर भी जो राजा उस हरने वाले को नहीं रोकता उस को ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ६९ ॥ हे इन्द्र ! विवाह, दान, यज्ञ इन के समय में जो मोह से विघ्न करता है वह मरने के अनन्तर कीड़ा होता है ॥ ७० ॥ दान से धन और जीवों की रक्षा करने से जीवन फलता (बढ़ता) है। और रूप, आरोग्य, ऐश्वर्य, ये जो हिंसा न करने के फल हैं, इन को भोगता है ॥ ७१ ॥ फल और मूल खाने से मनुष्य पूजा प्रतिष्ठा को और सत्य से स्वर्ग को प्राप्त होता है। और मरण के निमित्त तीर्थ आदि पर बैठने से राज्य और संपूर्ण सुखों को भोगता है ॥ ७२ ॥ हे इन्द्र ! दीक्षा का उपदेश लेने से मनुष्य गौओं से युक्त होता और जो तृणों को खाता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है। तीन काल में जो स्नान करता है वह स्त्रियों को प्राप्त होता है। और वायु भक्षण करता हुआ तप करने वाला यज्ञों के फल को प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥ जो मनुष्य नित्य स्नान करता और दोनों संध्याओं में सूर्य नारायण को जपता है वह नये राज्य और सदैव स्वर्गवास को प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ जो अग्नि में प्रवेश करता है वह ब्रह्मलोक में पूजा