अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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पराशरस्मृतिः ॥
ब्राह्मणस्यमुखंक्षेत्रं निरुदकमकण्टकम् ।
वापयेत्सर्वबीजानि साकृषिःसर्वकामिका ॥ ६३ ॥
सुक्षेत्रेवापयेद्बीजं सुपात्रेनिःक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रेचसुपात्रेच ह्युप्तंदत्तन्ननश्यति ॥ ६४ ॥
अव्रताह्यनधीयाना यत्रभैक्षचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ६५ ॥
क्षत्रियोहिप्रजारक्षन् शस्त्रपाणिःप्रचण्डवत् ।
निर्जित्यपरसैन्यानि क्षितिंधर्मेणपालयेत् ॥ ६६ ॥
नस्त्रीःकुलक्रमायाता भूषणोल्लिखिताऽपिवा ।
खङ्गेनाक्रम्यभुञ्जीत वीरभोग्यावसुन्धरा ॥ ६७ ॥
पुष्पं पुष्पंविचिन्वीत मूलच्छेदंनकारयेत् ।
मालाकारइवारामे नयथाङ्गारकारकः ॥ ६८ ॥
लाभकर्मतथारत्नं गवां च परिपालनम् ।
ब्राह्मण का मुख कांटे रहित और जल विहीन सर्वोत्तम खेत है उसी में सब बीज बोवे क्योंकि यही खेती सब कामनाओं को देने वाली है ॥६३॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे। अच्छे खेत में बोया अन्न और सुपात्र को दिया धन नष्ट नहीं होता॥६४॥ जिस ग्राम में व्रतों को न करते और वेद को न पढ़े हुए ब्राह्मण भिक्षा मांगते हैं उस ग्राम को राजा दण्ड दे क्योंकि वह ग्राम चोरों को भाग देता है ॥६५॥ क्रोधी के तुल्य शस्त्र को हाथ में लिये प्रजा की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय शत्रुओं की सेनाओं को जीत कर धर्मानुकूल प्रजा की पालना करे ॥६६॥ कदापि लक्ष्मी कुछ कुल परम्परा से नहीं आती और भूषणों से भी नहीं जानी जाती किन्तु अपने शस्त्रबल से शत्रुओं को दबा कर पृथ्वी को भोगे क्योंकि पृथ्वी शूरवीरों के भोगने योग्य है ॥ ६७ ॥ राजा को चाहिये कि जैसे माली बगीचे के वृक्षों की रक्षा रखता हुआ फूल २ तोड़ लेता है वैसे ही प्रजा की रक्षा करता हुआ राजा उस से धनादि लिया करे किन्तु कोयला बनाने वाला जैसे जड़ से वृक्षों को काट डालता है वैसे प्रजा की जड़ न बिगाड़े ॥ ६८ ॥ लाभ का काम, रत्नादि की परीक्षा तथा बेंचना, गौओं की अच्छी रक्षा, खेती क-