अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥
अकृत्वावैश्वदेवंतु भुञ्जतेयेद्विजाधमाः ।
सर्व्वतेनिष्फलाज्ञेयाः पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ ५६ ॥
वैश्वदेवविहीनाये आतिथ्येनबहिष्कृताः ।
सर्व्वतेनरकंयान्ति काकयोनिंव्रजन्तिच ॥ ५७ ॥
शिरोवेष्ट्यतुयोभुङ्क्ते दक्षिणाभिमुखस्तुयः ।
वामपादेकरंन्यस्य तद्वैरक्षांसिभुञ्जते ॥ ५८ ॥
यतयेकाञ्चनंदत्त्वा ताम्बूलंब्रह्मचारिणे ।
चोरेभ्योप्यभयंदत्त्वा दातापिनरकंव्रजेत् ॥ ५९ ॥
शुक्लवस्त्रंचयानंच ताम्बूलंधातुमेवच ।
प्रतिगृह्यकुलंहन्यात्प्रतिगृह्णातिर्यस्यच ॥ ६० ॥
चोरोवायदिचाण्डालः शत्रुर्व्वापिपितृघातकः ।
वैश्वदेवेतुसंप्राप्ते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥ ६१ ॥
नगृह्णाति॒तुयोविप्रो ह्यतिथिंवेदपारगम् ।
अददन्नान्नमात्रंतु भुक्त्वाभुङ्क्तेतुकिल्विषम् ॥ ६२ ॥
जो द्विजों में नीच पुरुष वैश्वदेव कर्म किये बिना भोजन करते हैं उनका सब जीवन निष्फल है और वे अशुद्ध नरक में पड़ते हैं ॥ ५६ ॥ जो वैश्वदेव से रहित हुए अतिथि का सत्कार नहीं करते वे सब नरक में जाते हैं तदनन्तर कौंवे की योनि को प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥ जो मनुष्य शिर में पगड़ी आदि बांध कर वा दक्षिण को मुख करके भोजन करता है तथा बांये पग पर हाथ रख कर खाता है उस अन्न को राक्षस खा जाते हैं ॥ ५८ ॥ संन्यासी को सुवर्ण ब्रह्मचारियों को पान और चोरों को अभय दान देकर दाता भी नरक में जाता है ॥ ५९ ॥ सफेद वस्त्र, सवारी, पान, और धातु इनका दान लेने वाला और देने वाला अपने कुल का नाश करता है ॥ ६० ॥ चोर हो वा चाण्डाल हो और चाहे पिता को मारने वाला शत्रु भी हो परन्तु वैश्वदेव के समय आया हो तो वह अतिथि स्वर्ग में ले जाने वाला है ॥ ६१ ॥ जो ब्राह्मण वेद का पार जानने वाले अतिथि का नहीं ग्रहण करता अर्थात् ऐसे अतिथि का पूजन नहीं करता वह अतिथि को नहीं दिये अन्न जल को खाकर पाप का भागी होता है ॥ ६२ ॥
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