अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ पराशरस्मृतिः ॥
अपूर्वः सुव्रतो विप्रो ह्यपूर्वश्चातिथिस्तथा ।
वेदाभ्यासरतो नित्यं त्रयोऽपूर्वा दिनेदिने ॥ ४९ ॥
वैश्वदेवे तु संप्राप्ते भिक्षुके गृहमागते ।
उद्धृत्य वैश्वदेवार्थं भिक्षां दत्वा विसर्जयेत् ॥ ५० ॥
यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनावुभौ ।
तयोरन्नमदत्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ ५१ ॥
दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् ।
इच्छया च ततो दद्याद्विभवे सत्यवारितम् ॥ ५२ ॥
यतिहस्ते जलं दद्याद्भैक्षं दद्यात्पुनर्जलम् ।
तद्भैक्षं मेरुणातुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥ ५३ ॥
यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुंजरारोहमृद्धिमत् ।
ऐंद्रस्थानमुपासीत तस्मात्तं न विचारयेत् ॥ ५४ ॥
वैश्वदेवकृतं पापं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् ।
न हि भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥ ५५ ॥
अच्छे व्रत नियम वाला ब्राह्मण और ऐसा ही अतिथि और नित्य २ वेद का पढ़ने वाला ये तीनों प्रति दिन भी अपूर्व (नवीन) ही समझे जाते हैं ॥ ४९ ॥ वैश्वदेव के समय यदि भिक्षुक घर में आवे तो वैश्वदेव के लिये पृथक् अन्न निकाल कर भिक्षा देके विदा करे ॥ ५० ॥ यति संन्यासी और ब्रह्मचारी ये दोनों पक्के अन्न के अधिकारी हैं उन दोनों को बिना अन्न दिये जो भोजन करै वह चांद्रायण व्रत का प्रायश्चित्ती होता है ॥ ५१ ॥ संन्यासी और ब्रह्मचारियों को तीन खुराक तक भिक्षा देवे यदि धन होय तो अपनी इच्छा से और भी देवे ॥ ५२ ॥ पहिले संन्यासी के हाथ में जल दे फिर अन्न दे पीछे भोजनान्त में फिर जल देवे वह भिक्षा मेरु पर्वत के और वह जल समुद्र के समान दान है ॥ ५३ ॥ जिसके छत्र-घोड़ा और चढ़ने के लिये उत्तम हाथी है वह धनी इन्द्र के स्थान का भोग करता है तिससे संन्यासी के देने में वह भी विचार न करै ॥ ५४ ॥ संन्यासी का सत्कार अवश्य करै वैश्व देव के भूल जाने के दोष को भिक्षु दूर कर सकता है पर भिक्षु के लौट जाने से हुए पाप को वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता ॥ ५५ ॥