अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९
अतिथिंतंविजानीयान्नातिथिःपूर्वमागतः ॥ ४१ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसाङ्गमिकंतथा ।
अनित्यंह्यागतोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ४२ ॥
अतिथिंतत्रसंप्राप्तं पूजयेत्स्वागतादिना ।
तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेनच ॥ ४३ ॥
श्रद्धयाचान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेणच ।
गच्छतंश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद्गृही ॥ ४४ ॥
अतिथिर्यस्यभग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्त्तते ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच ॥४५ ॥
काष्ठभारसहस्रेण घृतकुंभशतेनच ।
अतिथिर्यस्यभग्नाशस्तस्यहोमोनिरर्थकः ॥ ४६ ॥
सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेनिःक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रेचसुपात्रेच ह्युप्तंदत्तंननश्यति ॥ ४७ ॥
नपृच्छेद्गोत्रचरणे नस्वाध्यायंश्रुतंतथा ।
हृदयेकल्पयेद्देवं सर्वदेवमयोहिसः ॥ ४८ ॥
अतिथि जाने वैश्वदेव से पहिले आये ठहरे हुए को नहीं ॥ ४१ ॥ एक गांव में रहने वाले ब्राह्मण को तथा मेली ब्राह्मण को अतिथि कभी न माने जिस से नित्य जो न आवे उसे ही अतिथि कहा जाता है ॥४२॥ उस समय (वैश्वदेव में) आये अतिथि का (स्वागत) आदि से पूजन करे । तथा वैसे ही आसन देने-पग धोने ॥४३॥ श्रद्धा से अन्न देने प्रिय तथा मधुर प्रश्न और उत्तरों से जाते के पीछे चलने से गृहस्थी पुरुष अतिथिको प्रसन्न करै ॥४४॥ जिस के घर से निराश हो कर अतिथि चला जाता है उस के यहां पितर पन्द्रह वर्ष तक नहीं खाते ॥४५॥ काष्ठ के हजार बोझों से सौ घी के घड़ों से भी उसका होम वृथा है जिस के यहां से अतिथि निराश होकर लौट जाता है ॥४६॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे क्योंकि अच्छे खेत में बोया बीज और सुपात्र को दिया दान नष्ट नहीं होता ॥ ४७ ॥ गोत्र वा चरण ( नाम कठ कौथुमादि ) अक्षमज्ञ और वेदाध्ययन इनको भी न पूछे अपने हृदय में अतिथि को देवता समझे क्योंकि अतिथि सब देवताओं का रूप है ॥ ४८ ॥