भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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६ पराशरस्मृतिः ॥

पराशरेणचाप्युक्तं प्रायश्चित्तंविधीयते ।
अहमद्यैवतत्सर्वमनुस्मृत्यब्रवीमिवः ॥ ३५ ॥
चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वन्तुऋषिपुङ्गवाः ।
पराशरमतंपुण्यं पवित्रंपापनाशनम् ॥ ३६ ॥
चिन्तितंब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनायच ।
चतुर्णामपिवर्णाना माचारोधर्मपालकः ॥ ३७ ॥
आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मःपराङ्मुखः ।
षट्कर्माभिरतोनित्यं देवतातिथिपूजकः ।
हुतशेषन्तुभुञ्जानो ब्राह्मणोनावसीदति ॥ ३८ ॥
सन्ध्यास्नानंजपोहोमः स्वाध्यायोदेवतार्चनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच षट्कर्माणिदिनेदिने ॥ ३९ ॥
प्रियोवायदिवाद्द्वेष्यो मूर्खःपण्डितएववा ।
संप्राप्तोवैश्वदेवान्ते सोऽतिथिःस्वर्गसंक्रमः ॥ ४० ॥
दूराञ्चोपगतंश्रान्तं वैश्वदेवउपस्थितम् ॥


पराशर जी ने भी जो कहा है उसके अनुसार प्रायश्चित्त का विधान किया जाता है । उस सब को अभी स्मरण करके हम कहते हैं ॥ ३५ ॥ हे ऋषियों में उत्तम पुरुषो चारो वर्णों का आचरण सुनो क्योंकि पराशर का मत पुण्य का उत्पादक पवित्र तथा पापों का नाशक है ॥ ३६ ॥ जो मत ब्राह्मणों के लिये तथा धर्म की स्थिति के लिये विचारा है-चारो वर्णों का जो आचार है वही धर्म का रक्षक जानो ॥ ३७ ॥ जिन का देह आचार से भ्रष्ट है उन से धर्म भी पराङ्मुख होता पीठ फेर लेता है । जो छः कर्मों में नित्य तत्पर है तथा देवता और अतिथि का पूजन करता है और जो होम करके शेष बचे अन्न को खाता है वह ब्राह्मण दुःखी नहीं होता ॥३८॥ सन्ध्या स्नान जप होम विधि पूर्वक वेदाध्ययन और देवताओं का पूजन अतिथि की सेवा तथा वैश्वदेव–ये छः कर्म प्रति दिन करे । सन्ध्या स्नान जप ये तीनों अङ्गाङ्गिरूप से एक हैं ॥ ३९ ॥ पियारा हो वा शत्रु हो मूर्ख हो वा पण्डित हो जो वैश्वदेव के अन्त में प्राप्त हो वह अतिथि स्वर्ग में पहुंचाने वाला है ॥४०॥ जो दूर से आया हो थक गया हो वैश्वदेव के समय उपस्थित हो उस को

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